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Bangladesh Elections: क्या शेख हसीना का सबसे बड़ा दुश्मन जीतेगा बांग्लादेश चुनाव? BNP या जमात भारत के लिए कौन होगा भरोसेमंद

Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश में चुनावों के नतीजे न सिर्फ ढाका में सत्ता का फैसला करेंगे बल्कि पूरे इलाके की डिप्लोमैटिक दिशा और स्ट्रेटेजिक बैलेंस पर भी असर डाल सकते हैं.

Bangladesh Election 2026: भारत बांग्लादेश पर नजर रखे हुए है क्योंकि आज (12 फरवरी) को वहां चुनाव होने हैं. अगस्त 2024 में शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद यह पहला नेशनल वोट होगा.बांग्लादेश में चुनावों के नतीजे न सिर्फ ढाका में सत्ता का फैसला करेंगे बल्कि पूरे इलाके की डिप्लोमैटिक दिशा और स्ट्रेटेजिक बैलेंस पर भी असर डाल सकते हैं.नई दिल्ली इन नतीजों पर खास तौर पर नजर रखे हुए है क्योंकि सत्ता में संभावित बदलाव का भारत-बांग्लादेश रिश्तों, बॉर्डर सिक्योरिटी, नॉर्थईस्ट में स्थिरता और इलाके के पावर बैलेंस पर दूरगामी असर पड़ सकता है.

BNP की संभावित वापसी चीन और अमेरिका की बढ़ती सक्रियता और भारत के आर्थिक और स्ट्रेटेजिक हितों के साथ यह चुनाव दक्षिण एशियाई राजनीति में एक नए चैप्टर की शुरुआत कर सकता है. यही वजह है कि बांग्लादेश के लोगों के साथ भारत भी  इस चुनाव के नतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रहा रहा है.

बांग्लादेशी नागरिकों को मध्यमार्गी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और इस्लामिस्ट जमात-ए-इस्लामी पार्टी के बीच चुनने का मौका मिलेगा साथ ही उनके देश की सोच संस्थाओं की भलाई और बढ़ती समस्याओं के बीच सरकार चलाने की क्षमता भी तय होगी.

BNP रच सकती है इतिहास

बांग्लादेश में अभी के चुनावी माहौल को देखते हुए एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि BNP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी. पहले जब BNP सत्ता में थी तो भारत-बांग्लादेश के रिश्ते खराब हो गए थे. क्रॉस-बॉर्डर बगावत, गैर-कानूनी इमिग्रेशन और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे झगड़े की वजह थे.

सर्वे में BNP को 52.8% वोट शेयर मिलने का अनुमान

न्यूयॉर्क एडिटोरियल ने बांग्लादेश में इनोविजन कंसल्टिंग के दो ओपिनियन पोल का एनालिसिस किया जिसमें BNP को 52.8% वोट शेयर के साथ बढ़त और जमात से लगभग 22% का अंतर बताया गया है. नैरेटिव/IILD सर्वे इस अंतर को सिर्फ़ 1.1% तक कम करता है. ज़्यादातर लोगों का मानना ​​है कि यह अंतर पुराने अवामी लीग वोटरों से आएगा. वे किस तरफ़ झुकेंगे? अगर 40 मिलियन अवामी लीग वोटरों में से ज़्यादातर अपना सपोर्ट BNP को देने का फ़ैसला करते हैं, तो इसके नेता तारिक रहमान आसानी से शपथ ग्रहण समारोह में पहुंच जाएंगे. अगर वह प्लेटफ़ॉर्म जमात को मिलता है, तो उनके विरोधी शफ़ीकुर रहमान के खेमे में खुशी होगी.

बांग्लादेश चुनाव और भारत

दशकों तक भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते चुनावी लहरों के साथ ऊपर-नीचे होते रहे. हसीना की अवामी लीग ने आम तौर पर नई दिल्ली के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखे. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और उसकी कभी सहयोगी रही जमात-ए-इस्लामी ने एक अलग रास्ता अपनाया जिसे भारतीय सत्ता के गलियारों में उनके पाकिस्तान समर्थक और इस्लामी विचारों के कारण सावधानी से देखा जाता था.

2009 से 2024 तक शेख हसीना का कार्यकाल सहयोग का दौर रहा. 2015 का लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट एक बड़ी कामयाबी थी क्योंकि 1974 का एक एग्रीमेंट दशकों तक भारत से मंजूर नहीं हुआ था. 2015 के इस समझौते से भारत से बांग्लादेश को 111 एन्क्लेव (17,160.63 एकड़) ट्रांसफर हुए जबकि भारत को बांग्लादेश से 51 एन्क्लेव (7,110.02 एकड़) मिले.

दोनों देशों के बीच व्यापार भी बढ़ा. भारत ने बांग्लादेश को अरबों डॉलर के क्रेडिट लाइन दिए और रोज़ाना 500 मेगावाट बिजली एक्सपोर्ट की. हसीना की सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ सहयोग किया और बांग्लादेश के उत्तर-पूर्वी इलाकों में सक्रिय विद्रोही ग्रुप्स पर कार्रवाई की. यह पार्टनरशिप मजबूत दिखी.

2024 में भारत के लिए बांग्लादेश में क्या बदला?

वह स्थिरता करीब दो साल पहले टूट गई थी. जुलाई 2024 में 1971 के स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम के खिलाफ स्टूडेंट प्रोटेस्ट शुरू हुए. यह जल्द ही शेख हसीना की सरकार के खिलाफ देश भर में बगावत में बदल गया. सिक्योरिटी फोर्स ने जानलेवा ताकत से जवाब दिया. अल जजीरा ने बताया कि इस कार्रवाई में करीब 1400 लोग मारे गए.

5 अगस्त 2024 को जब  उनके घर को घेरे हुए थे तो शेख हसीना मिलिट्री हेलीकॉप्टर से भारत भाग गईं. वह अभी भी वहीं हैं. उनके पिता की मूर्तियां तोड़ दी गई हैं और उनकी विरासत को तानाशाही बताया जा रहा है जबकि उन्हें कभी देश के फाउंडिंग फादर के तौर पर देखा जाता था.

बांग्लादेश में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने नवंबर में हसीना को उनकी गैरमौजूदगी में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जानलेवा ताकत इस्तेमाल करने का आदेश देने के लिए दोषी ठहराया था. बांग्लादेश ने ऑफिशियली उनके एक्सट्रैडिशन की रिक्वेस्ट की है.यह एक्सट्रैडिशन रिक्वेस्ट और भारत का अब तक लगातार मना करना बांग्लादेश में चुनाव का मुद्दा भी बन गया है. हाल ही में खालिदा जिया की मौत के बाद उनके बेटे की लीडरशिप वाली BNP अपने चुनावी प्रचार के हिस्से के तौर पर इस बारे में बात कर रही है.

तारिक रहमान के साथ काम कर सकता है भारत

भारतीय जानकारों का मानना ​​है कि बेगम खालिदा ज़िया के दो कार्यकाल के दौरान, BNP ने बांग्लादेश में एक कट्टरपंथी इस्लामी ग्रुप और पाकिस्तान के पक्ष में रुख अपनाया था, इसके बावजूद भारत तारिक रहमान के साथ काम कर सकता है. हालांकि जमात के प्रतिनिधियों ने दिल्ली और ढाका दोनों जगहों पर भारतीय डिप्लोमैट्स से मुलाकात की है, खुद को भरोसेमंद पार्टनर बताया है, और चुनावों से पहले आम तौर पर भारत विरोधी बयानों पर चुप्पी साधे रखी है, लेकिन उनके साथ पिछले अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं. हालांकि, यह समझना होगा कि जमात ने अपने 18 महीने के बिना रोक-टोक वाले शासन के दौरान राज्य में अपना असर मजबूत किया है. सुश्री हसीना को हटाने के बाद इसके शुरुआती कामों में से एक निचले लेवल के एडमिनिस्ट्रेटर्स, खासकर एजुकेशन सेक्टर में, का फेरबदल था. ऐसे देश में जहां चुनाव अक्सर स्कूल और कॉलेज के टीचर चलाते हैं, यह इंस्टीट्यूशनल फायदा चुनावी फायदे में बदल सकता है.

जयशंकर का ढाका दौरा

लेकिन BNP लीडर और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया की मौत के बाद भारत ने साफ तौर पर संकेत दिया है कि वह मौजूदा माहौल में बांग्लादेश की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी के साथ काम करने के लिए तैयार है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर का ढाका दौरा और खालिदा ज़िया की मौत पर भारतीय संसद में शोक प्रस्ताव को इस डिप्लोमैटिक फ्लेक्सिबिलिटी की निशानी के तौर पर देखा जा रहा है. ढाका में भारतीय हाई कमिश्नर BNP नेताओं के साथ लगातार संपर्क में हैं. इस चुनाव में हिस्सा ले रही दूसरी बड़ी पार्टी जमात-ए-इस्लामी है. भारतीय हाई कमीशन भी जमात नेताओं के संपर्क में है.

बांग्लादेश को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय का रुख अब साफ हो गया है: चुनाव में चाहे कोई भी सरकार आए वह बांग्लादेश के साथ रिश्ते आगे बढ़ाने के लिए उसी जोश के साथ काम करेगा, जैसा उसने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के समय में किया था.

BNP और जमात नेताओं के साथ मीटिंग के बारे में, विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अभी तक इन दोनों पार्टियों के नेताओं की तरफ से ऐसा कोई इशारा नहीं मिला है कि वे भारत के साथ रिश्तों की अहमियत को कम आंक रहे हैं.

बांग्लादेश में चीन, पाकिस्तान और अमेरिका की एक साथ गहरी दिलचस्पी को देखते हुए, भारत के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है. बांग्लादेश और भारत के बीच 4,100 किलोमीटर का बॉर्डर है,और पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम की सुरक्षा, व्यापार और सामाजिक स्थिरता सीधे तौर पर बांग्लादेश के अंदरूनी हालात से जुड़ी हुई है.

Divyanshi Singh

दिव्यांशी सिंह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और पिछले 4 सालों से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। जियो-पॉलिटिक्स और स्पोर्टस में काम करने का लंबा अनुभव है।

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