ईरान एक ऐसा इकलौता देश, जो अमेरिका के दबाव में नहीं आता और अकेले ही अमेरिका की दबदबे वाली व्यवस्था को चुनौती देता है. हालांकि जब भी ईरान का साथ देने की बात आती है, तो मुस्लिम देश आपस में बंट जाते हैं. आइए जानते हैं ऐसा क्यों होता है?
Ayatollah Ali Khamenei
Muslim Countries divided over Iran: इन दिनों ईरान और अमेरिका का विवाद चल रहा है. अमेरिका और ईरान एक दूसरे को बार-बार धमकियां दे रहे हैं. हालांकि सभी इस्लामिक देश ईरान का साथ नहीं दे रहे हैं. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर सभी इस्लामिक देश ईरान को लेकर इस्लामिक देश विभाजित क्यों हो जाते हैं? इनमें कई अहम पहलू हैं. धार्मिक संप्रदाय यानी शिया बनाम सुन्नी, नस्ल और भाषा यानी फारसी बनाम अरब, इस्लामी गणतंत्र, विदेश नीति समेत कई अहम पहलू हैं.
2010 में तत्कालीन विदेश मंत्री ने दिया था बयान
साल 2010 इस्लामिक देशों में विभाजन को देखते हुए ईरान के तत्कालीन विदेश मंत्री मनूचेहर मुत्तकी ने एक सम्मेलन में कहा था कि मुस्लिम देशों को बाहर वालों के दबाव में नहीं आना चाहिए, जो उन्हें आपस में लड़ाते हैं और बांटते हैं. बाहर वालों से उनका तात्पर्य अमेरिका से था. उन्होंने आगे कहा कि जब भी कोई मुस्लिम देश मजबूत बने, तो मु्स्लिमों को खुश होना चाहिए. हमारी ताकत ही आपकी ताकत है और आपकी ताकत हमारी ताकत है.
बता दें कि ईरान जब भी अमेरिका अमेरिका और इसराइल से आमने-सामने होता है, तो वो इस्लामी पहचान को हाइलाइट करता है. हालांकि अब तक ये पहचान इतनी बड़ी नहीं बन पाई है कि इस्लामिक देश अपने हितों के सामने धार्मिक पहचान को प्राथमिकता दे सकें. 1979 की क्रांति के बाद ईरान इकलौता ऐसा इस्लामिक देश है, जो अमेरिकी दबदबे वाली व्यवस्था को चुनौती देता है. बाकी के इस्लामिक देश अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं. इसके कारण स्थिति कठिन हो जाती है.
चीन और रूस ईरान के करीबी हैं लेकिन ये दोनों देश अमेरिका के साथ सीधे सैन्य टकराव नहीं करना चाहते और ऐसा करने से बचते हैं. हालांकि तुर्की ईरान को खुलकर समर्थन करता है लेकिन तुर्की नाटो का सदस्य भी है. इसके कारण अक्सर तुर्की भी टकराव से बचता है.
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