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Missile interceptors System: इंटरसेप्टर सिस्टम क्या है जो दुश्मन की मिसाइल को हवा में ही कर सकता है खत्म, यह कैसे काम करता है?

Missile interceptors System: अमेरिका–इज़रायल–ईरान के युध्द में इन मिसाइलों से रक्षा के लिए इंटरसेप्टर सिस्टम्स का यूज किया जाता है. चलिए जानते हैं ये एयर डिफेंस सिस्टम से कैसे अलग होता है?

Missile interceptors System: अमेरिका–इज़रायल–ईरान के युध्द में मिसाइलों की बौझार देखने को मिली. कोई भी देश यह नहीं चाहेगा कि उसके ऊपर मिसाइल से हमला हो और नुकसान झेलना पड़े. इसलिए कई देशों के पास इन मिसाइलों से रक्षा के लिए इंटरसेप्टर सिस्टम्स का यूज किया जाता है. यह एयर डिफेंस सिस्टम का ही एक भाग होता है, जो हवा में ही दुश्मन देश की मिसाइल को मार गिराती हैं.

किसी भी देश के लिए यह काफी अहम चीज है, जो उसकी रक्षा करती है. यह एयर डिफेंस का वह हिस्सा होता है, जो आने वाले टारगेट को बीच में ही रोककर उसे खत्म करता है. मतलब इंटरसेप्टर को ‘मार गिराने वाला’ भाग कहा जाता है.

मिसाइल रक्षा प्रणाली क्या है?

Missile interceptors System एक बड़े सैन्य संरचना को परिभाषित करती है. यह आने वाली शत्रु मिसाइलों का पता लगाती है, उन्हें ट्रैक करने और उनके टारगेट के पहुंचने से पहले ही उसे खत्म करने के लिए डिजाइन की गई है. यह बहुत तेजी से काम करती है. आप सोच सकते हैं कि कोई मिसाइल जमीन पर गिरने से पहले ही उसके टारगेट, टाइमिंग और उसे नष्ट करने तक की प्रोसेस कितनी जल्दी होती होगी?

इसके मुख्य भाग पर डालें नजर

  • सेंसर: यह पृथ्वी की कक्षा में उपग्रह और जमीन पर रडार स्टेशन आसमान की देखरेख करते हैं जिससे कि खतरे का पहले से पता लगाया जा सके और उसकी स्पीड और डायरेक्शन को ट्रैक किया जा सके.
  • कमांड सेंटर्स: सैन्य कर्मी बेहतरीन और पावरफुल कंप्यूटर का इस्तेमाल करके सेंसर डेटा की प्रक्रिया को पूरा करते हैं, संकटग्रस्त टारगेटों की गिनती करके सबसे बेहतरीन प्रतिक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है.
  • इंटरसेप्टर्स: यह वह वास्तविक मिसाइलें हैं जो आने वाले खतरे की ओर लॉन्च की जाती हैं और उसे नीचे गिरने से पहले ही हवा में मार गिराती हैं.
    रणनीतिक खासियत: यह सिर्फ जान माल की सेफ्टी तक ही लिमिटेड नहीं हैं बल्कि दुश्मन की मिसाइलों को अप्रभावी बनाकर संघर्ष शुरू करने से पहले ही रोक देती हैं.

मिसाइल इंटरसेप्टर कैसे काम करता है?

  1. डिटेक्शन और ट्रैकिंग: एक स्टेशनरी ग्राउंड रडार आसमान में हजारों रेडियो बीम भेजता है. जब कोई बीम किसी चीज से रिफ्लेक्ट होती है, तो कंप्यूटर टारगेट की स्पीड, ऊंचाई और उड़ान के रास्ते का अंदाजा लगाने के लिए सिग्नल को एनालाइज़ करता है.
  2. लॉक हासिल करना: अगर टारगेट को खतरा माना जाता है, तो रडार अपनी एनर्जी आसमान में उस खास पॉइंट पर फोकस करता है और टारगेट की पोजीशन को लगातार अपडेट करता रहता है.
  3. लॉन्च कमांड: एंगेजमेंट कंट्रोल स्टेशन (ECS) ट्रैजेक्टरी का अंदाज़ा लगाता है और इंटरसेप्टर के रॉकेट मोटर को एक्टिवेट करने के लिए लॉन्चर को सिग्नल भेजता है.
  4. मिड-फ़्लाइट गाइडेंस: जैसे ही इंटरसेप्टर टेक ऑफ़ करता है, ग्राउंड रडार दुश्मन के टारगेट और इंटरसेप्टर दोनों को ट्रैक करता है और इंटरसेप्टर को गाइडेंस कमांड भेजता है.
  5. फ़ाइनल-स्टेज डिस्ट्रक्शन: आखिरी पलों में इंटरसेप्टर अपने ऑनबोर्ड ‘सीकर’ (एक प्रिसिजन रडार) का इस्तेमाल करके टारगेट का पता लगाता है. यह दो तरीकों में से एक से खतरे को खत्म करता है.
  6. प्रॉक्सिमिटी फ़्यूज़: एक पावरफ़ुल वॉरहेड टारगेट के पास फटता है और उसे छर्रों से नष्ट कर देता है (पुराने मॉडल में इस्तेमाल होता है).
  7. हिट-टू-किल: इंटरसेप्टर सीधे टारगेट से टकराता है और सिर्फ़ काइनेटिक एनर्जी (मॉडर्न सिस्टम में इस्तेमाल होता है) का इस्तेमाल करके उसे पूरी तरह से नष्ट कर देता है. ।

जंग में कौन से मुख्य डिफेंस सिस्टम तैनात हैं?

अमेरिका

  • THAAD अपनी ‘हिट-टू-किल’ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके कम और मीडियम रेंज की बैलिस्टिक मिसाइलों को उनके आखिरी फ़्लाइट फ़ेज़ के दौरान ज़्यादा ऊंचाई पर नष्ट करता है, जिससे मिलिट्री बेस और शहरों की सुरक्षा पक्की होती है.
  • पैट्रियट मिसाइल सिस्टम: बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज़ मिसाइलों और एयरक्राफ़्ट के ख़िलाफ़ लास्ट-लाइन डिफ़ेंस देता है और इसका इस्तेमाल ज़रूरी इंफ़्रास्ट्रक्चर और मिलिट्री बेस की सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है.
  • SM-3 और SM-6 (US नेवी): समुद्र पर आधारित इंटरसेप्टर. SM-3 उड़ान के बीच में बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट कर देता है, जबकि SM-6 फ़्लाइट के आखिरी फ़ेज़ के दौरान मिसाइलों, एयरक्राफ़्ट और ड्रोन को टारगेट करता है.
  • इनडायरेक्ट फायर प्रोटेक्शन कैपेबिलिटी (IFPC): बेस की रक्षा के लिए AIM-9X (एक फ़्लैगशिप, कम दूरी की, इंफ़्रारेड-ट्रैकिंग, हवा से हवा में और सतह से लॉन्च होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल) का इस्तेमाल करता है, जिससे महंगी पैट्रियट मिसाइलों का खर्च बचता है.

इज़राइल

  • एरो-2 और एरो-3: लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम को रोकने के लिए है. एरो-3 एटमॉस्फियर के बाहर मिसाइलों को इंटरसेप्ट करता है, जबकि एरो-2 एटमॉस्फियर के अंदर काम करता है.
  • डेविड्स स्लिंग: इसे मीडियम से लंबी दूरी के रॉकेट, क्रूज़ मिसाइल और टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो एरो और आयरन डोम के बीच के गैप को कम करता है.
  • आयरन डोम: एक शॉर्ट-रेंज डिफेंस सिस्टम जो रॉकेट, आर्टिलरी शेल और ड्रोन के खिलाफ असरदार है, और कम स्पीड वाले खतरों के खिलाफ इसका सक्सेस रेट बहुत ज़्यादा है.
  • आयरन बीम: एक डायरेक्टेड-एनर्जी लेज़र सिस्टम जो कम कीमत पर ड्रोन और छोटे प्रोजेक्टाइल को नष्ट कर देता है, जिससे महंगे इंटरसेप्टर पर निर्भरता कम हो जाती है.

यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE)

शेओंगुंग II: साउथ कोरिया का मीडियम-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम जिसमें 360° रडार और वर्टिकल लॉन्च कैपेबिलिटी है. यह कम ऊंचाई वाली क्रूज़ मिसाइलों और फारस की खाड़ी के ऊपर टैक्टिकल बैलिस्टिक खतरों के खिलाफ असरदार है.

ईरान

  • बावर-373: एक लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम जिसे एयरक्राफ्ट और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है, यह एडवांस्ड सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम (SAMs) जैसा है.
  • सेवोम-ए-खोरदाद: एक मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम जो एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइलों को टारगेट कर सकता है और बचने की क्षमता बढ़ाने के लिए तेज़ी से अपनी जगह बदल सकता है.
  • टोर-M1: एक कम दूरी का सिस्टम जिसका इस्तेमाल सटीक गाइडेड हथियारों, ड्रोन और कम ऊंचाई वाली क्रूज मिसाइलों को रोकने के लिए किया जाता है.
  • मजीद और अजराखश: ये सिस्टम ड्रोन और कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों का मुकाबला करने और ज़रूरी जगहों की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किए गए हैं.

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