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Home > लाइफस्टाइल > रील्स के जाल में फंसी जेन जी की जिंदगी, नींद से फोकस तक पर पड़ रहा असर… आख़िर कैसे छूटेगी डूम्स्क्रॉलिंग की आदत

रील्स के जाल में फंसी जेन जी की जिंदगी, नींद से फोकस तक पर पड़ रहा असर… आख़िर कैसे छूटेगी डूम्स्क्रॉलिंग की आदत

Social media addiction: ऑफिस के बाद हॉबी और पैशन को समय देने की जगह रील्स स्क्रॉल करने की आदत तेजी से बढ़ी है. डूम्स्क्रॉलिंग की यह आदत समय की बर्बादी, नींद में खलल, मानसिक थकान और फोकस में कमी जैसी परेशानियों से जुड़ सकती है. फोन को बिस्तर से दूर रखना, रील्स के लिए टाइम लिमिट तय करना और खाली समय में हॉबी को प्राथमिकता देना इस आदत को नियंत्रित करने की शुरुआत हो सकती है.

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Last Updated: September 22, 2026 23:26:49 IST

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Social media addiction: कुछ साल पहले तक ऑफिस से घर लौटने के बाद दिनभर की थकान मिटाने के लिए लोग अपनी पसंद का काम करना पसंद करते थे. कोई डांस करता था, कोई गाने सुनता या गाता था, तो किसी को खाना बनाने या किताब पढ़ने में सुकून मिलता था. यानी काम के बाद का समय खुद के लिए होता था. लेकिन सोशल मीडिया और खासकर रील्स के बढ़ते चलन ने इस आदत को काफी हद तक बदल दिया है. अब फुर्सत के कुछ मिनट मिलते ही हाथ फोन की तरफ बढ़ता है और देखते ही देखते वही कुछ मिनट घंटों में बदल जाते हैं. इसी आदत का एक रूप ‘डूम्स्क्रॉलिंग’ है. इसका मतलब लगातार सोशल मीडिया या न्यूज फीड पर ऐसी नकारात्मक, परेशान करने वाली या तनाव बढ़ाने वाली खबरें और कंटेंट स्क्रॉल करते रहना है, जबकि व्यक्ति को पता होता है कि इसे देखने से उसका मूड खराब हो रहा है. कई बार हम बिना किसी खास मकसद के बस एक के बाद एक रील देखते जाते हैं और इस बात का अंदाजा ही नहीं रहता कि कितना समय बीत चुका है.

फुर्सत मिली नहीं कि हाथ में आ गया फोन

आज रील्स देखना कई लोगों के लिए खाली समय भरने का सबसे आसान तरीका बन गया है. ऑफिस से लौटने के बाद कुछ देर आराम करने के लिए फोन उठाया और एक रील के बाद दूसरी, फिर तीसरी… इस सिलसिले का कोई तय अंत नहीं होता. कब रात हो गई और सोने का समय निकल गया, इसका पता तब चलता है जब फोन में डेटा खत्म होने का मैसेज आ जाता है. इसके बाद भी कई बार नींद तुरंत नहीं आती, लेकिन घंटों फोन चलाने का पछतावा जरूर होने लगता है. रील्स देखना अपने आप में समस्या नहीं है. दिक्कत तब शुरू होती है जब यह आदत हमारे जरूरी कामों, नींद, पढ़ाई, ऑफिस के काम या उन गतिविधियों का समय खाने लगे जिन्हें हम वास्तव में पसंद करते हैं. यही वह जगह है जहां मनोरंजन धीरे-धीरे आदत और फिर समय की बड़ी खपत में बदल सकता है.

हॉबी और पैशन के लिए समय ही नहीं बचता

जरूरत से ज्यादा स्क्रॉलिंग का असर सिर्फ समय पर नहीं पड़ता. लगातार फोन पर रहने की वजह से हमारा ध्यान भी बार-बार भटकता रहता है. किसी काम पर मन लगाने के बजाय दिमाग को जल्दी-जल्दी बदलते कंटेंट की आदत पड़ जाती है. ऐसे में लंबे समय तक किसी एक काम पर फोकस करना मुश्किल महसूस हो सकता है. इसका सीधा असर हमारी हॉबीज पर भी पड़ता है. जिस समय में पहले कोई व्यक्ति डांस, सिंगिंग, कुकिंग, पढ़ने या किसी दूसरे पसंदीदा काम को देता था, वही समय अब सोशल मीडिया फीड में निकल जाता है. यानी समस्या सिर्फ यह नहीं कि हम फोन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं, बल्कि यह भी है कि फोन की वजह से हम अपनी पसंद की दूसरी चीजों के लिए समय निकालना कम कर रहे हैं.

नींद से लेकर मानसिक थकान तक, पड़ सकता है असर

रात में बिस्तर पर जाने के बाद रील्स स्क्रॉल करने की आदत नींद के रूटीन को प्रभावित कर सकती है. सोने से ठीक पहले लंबे समय तक स्क्रीन देखने से शरीर की नींद से जुड़ी प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा लगातार नकारात्मक या तनावपूर्ण कंटेंट देखने से मानसिक थकान और बेचैनी भी बढ़ सकती है. ‘सिर्फ एक और रील’ वाला पैटर्न समय की बर्बादी का बड़ा कारण बन सकता है. कुछ मिनट के ब्रेक के लिए शुरू हुई स्क्रॉलिंग कब घंटों तक पहुंच जाती है, इसका एहसास अक्सर देर से होता है. लगातार बदलते छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत की वजह से लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण लग सकता है. इसके साथ चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान जैसी परेशानियां भी महसूस हो सकती हैं.

डूम्स्क्रॉलिंग से निकलने के लिए फोन छोड़ना जरूरी नहीं

इस आदत को बदलने के लिए फोन को पूरी तरह छोड़ देना जरूरी नहीं है. शुरुआत छोटी-छोटी चीजों से की जा सकती है. सबसे पहले रात में फोन को तकिए या बिस्तर के पास रखने के बजाय उससे थोड़ी दूरी पर चार्ज करने की आदत डालें. अगर अलार्म के लिए फोन पास रखने की जरूरत पड़ती है तो अलग अलार्म क्लॉक या किसी दूसरे डिवाइस का इस्तेमाल किया जा सकता है. रील्स को पूरी तरह बंद करना मुश्किल लगता है तो उसकी जगह समय की सीमा तय करना बेहतर शुरुआत हो सकती है. उदाहरण के लिए, फोन चलाने से पहले 10 मिनट का टाइमर लगाया जा सकता है और समय पूरा होने पर स्क्रॉलिंग रोक दी जाए. इससे धीरे-धीरे बिना मकसद फोन उठाने की आदत को कम करने में मदद मिल सकती है.

खाली समय को फिर से अपनी हॉबी के नाम करें

डूम्स्क्रॉलिंग से बाहर निकलने का एक और तरीका है कि खाली समय को पहले से किसी पसंदीदा गतिविधि के लिए तय किया जाए. जैसे ही फुर्सत मिले, फोन उठाने के बजाय कुछ मिनट गाना सुनना, डांस की प्रैक्टिस करना, खाना बनाना, किताब पढ़ना या किसी दूसरे पैशन पर काम करना शुरू किया जा सकता है. असल चुनौती फोन को जिंदगी से हटाना नहीं, बल्कि उसे जिंदगी का हर खाली हिस्सा भरने से रोकना है. सोशल मीडिया मनोरंजन का जरिया हो सकता है, लेकिन जब हर खाली पल रील्स के नाम हो जाए तो हमारी हॉबी, नींद, काम और खुद के लिए मिलने वाला समय पीछे छूटने लगता है. इसलिए डूम्स्क्रॉलिंग की लूप तोड़ने के लिए फोन छोड़ने से ज्यादा जरूरी है कि अपनी जिंदगी में दूसरी चीजों के लिए भी जगह बनाई जाए.

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Last Updated: September 22, 2026 23:26:49 IST

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Social media addiction: कुछ साल पहले तक ऑफिस से घर लौटने के बाद दिनभर की थकान मिटाने के लिए लोग अपनी पसंद का काम करना पसंद करते थे. कोई डांस करता था, कोई गाने सुनता या गाता था, तो किसी को खाना बनाने या किताब पढ़ने में सुकून मिलता था. यानी काम के बाद का समय खुद के लिए होता था. लेकिन सोशल मीडिया और खासकर रील्स के बढ़ते चलन ने इस आदत को काफी हद तक बदल दिया है. अब फुर्सत के कुछ मिनट मिलते ही हाथ फोन की तरफ बढ़ता है और देखते ही देखते वही कुछ मिनट घंटों में बदल जाते हैं. इसी आदत का एक रूप ‘डूम्स्क्रॉलिंग’ है. इसका मतलब लगातार सोशल मीडिया या न्यूज फीड पर ऐसी नकारात्मक, परेशान करने वाली या तनाव बढ़ाने वाली खबरें और कंटेंट स्क्रॉल करते रहना है, जबकि व्यक्ति को पता होता है कि इसे देखने से उसका मूड खराब हो रहा है. कई बार हम बिना किसी खास मकसद के बस एक के बाद एक रील देखते जाते हैं और इस बात का अंदाजा ही नहीं रहता कि कितना समय बीत चुका है.

फुर्सत मिली नहीं कि हाथ में आ गया फोन

आज रील्स देखना कई लोगों के लिए खाली समय भरने का सबसे आसान तरीका बन गया है. ऑफिस से लौटने के बाद कुछ देर आराम करने के लिए फोन उठाया और एक रील के बाद दूसरी, फिर तीसरी… इस सिलसिले का कोई तय अंत नहीं होता. कब रात हो गई और सोने का समय निकल गया, इसका पता तब चलता है जब फोन में डेटा खत्म होने का मैसेज आ जाता है. इसके बाद भी कई बार नींद तुरंत नहीं आती, लेकिन घंटों फोन चलाने का पछतावा जरूर होने लगता है. रील्स देखना अपने आप में समस्या नहीं है. दिक्कत तब शुरू होती है जब यह आदत हमारे जरूरी कामों, नींद, पढ़ाई, ऑफिस के काम या उन गतिविधियों का समय खाने लगे जिन्हें हम वास्तव में पसंद करते हैं. यही वह जगह है जहां मनोरंजन धीरे-धीरे आदत और फिर समय की बड़ी खपत में बदल सकता है.

हॉबी और पैशन के लिए समय ही नहीं बचता

जरूरत से ज्यादा स्क्रॉलिंग का असर सिर्फ समय पर नहीं पड़ता. लगातार फोन पर रहने की वजह से हमारा ध्यान भी बार-बार भटकता रहता है. किसी काम पर मन लगाने के बजाय दिमाग को जल्दी-जल्दी बदलते कंटेंट की आदत पड़ जाती है. ऐसे में लंबे समय तक किसी एक काम पर फोकस करना मुश्किल महसूस हो सकता है. इसका सीधा असर हमारी हॉबीज पर भी पड़ता है. जिस समय में पहले कोई व्यक्ति डांस, सिंगिंग, कुकिंग, पढ़ने या किसी दूसरे पसंदीदा काम को देता था, वही समय अब सोशल मीडिया फीड में निकल जाता है. यानी समस्या सिर्फ यह नहीं कि हम फोन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं, बल्कि यह भी है कि फोन की वजह से हम अपनी पसंद की दूसरी चीजों के लिए समय निकालना कम कर रहे हैं.

नींद से लेकर मानसिक थकान तक, पड़ सकता है असर

रात में बिस्तर पर जाने के बाद रील्स स्क्रॉल करने की आदत नींद के रूटीन को प्रभावित कर सकती है. सोने से ठीक पहले लंबे समय तक स्क्रीन देखने से शरीर की नींद से जुड़ी प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा लगातार नकारात्मक या तनावपूर्ण कंटेंट देखने से मानसिक थकान और बेचैनी भी बढ़ सकती है. ‘सिर्फ एक और रील’ वाला पैटर्न समय की बर्बादी का बड़ा कारण बन सकता है. कुछ मिनट के ब्रेक के लिए शुरू हुई स्क्रॉलिंग कब घंटों तक पहुंच जाती है, इसका एहसास अक्सर देर से होता है. लगातार बदलते छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत की वजह से लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण लग सकता है. इसके साथ चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान जैसी परेशानियां भी महसूस हो सकती हैं.

डूम्स्क्रॉलिंग से निकलने के लिए फोन छोड़ना जरूरी नहीं

इस आदत को बदलने के लिए फोन को पूरी तरह छोड़ देना जरूरी नहीं है. शुरुआत छोटी-छोटी चीजों से की जा सकती है. सबसे पहले रात में फोन को तकिए या बिस्तर के पास रखने के बजाय उससे थोड़ी दूरी पर चार्ज करने की आदत डालें. अगर अलार्म के लिए फोन पास रखने की जरूरत पड़ती है तो अलग अलार्म क्लॉक या किसी दूसरे डिवाइस का इस्तेमाल किया जा सकता है. रील्स को पूरी तरह बंद करना मुश्किल लगता है तो उसकी जगह समय की सीमा तय करना बेहतर शुरुआत हो सकती है. उदाहरण के लिए, फोन चलाने से पहले 10 मिनट का टाइमर लगाया जा सकता है और समय पूरा होने पर स्क्रॉलिंग रोक दी जाए. इससे धीरे-धीरे बिना मकसद फोन उठाने की आदत को कम करने में मदद मिल सकती है.

खाली समय को फिर से अपनी हॉबी के नाम करें

डूम्स्क्रॉलिंग से बाहर निकलने का एक और तरीका है कि खाली समय को पहले से किसी पसंदीदा गतिविधि के लिए तय किया जाए. जैसे ही फुर्सत मिले, फोन उठाने के बजाय कुछ मिनट गाना सुनना, डांस की प्रैक्टिस करना, खाना बनाना, किताब पढ़ना या किसी दूसरे पैशन पर काम करना शुरू किया जा सकता है. असल चुनौती फोन को जिंदगी से हटाना नहीं, बल्कि उसे जिंदगी का हर खाली हिस्सा भरने से रोकना है. सोशल मीडिया मनोरंजन का जरिया हो सकता है, लेकिन जब हर खाली पल रील्स के नाम हो जाए तो हमारी हॉबी, नींद, काम और खुद के लिए मिलने वाला समय पीछे छूटने लगता है. इसलिए डूम्स्क्रॉलिंग की लूप तोड़ने के लिए फोन छोड़ने से ज्यादा जरूरी है कि अपनी जिंदगी में दूसरी चीजों के लिए भी जगह बनाई जाए.

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