राजधानी दिल्ली में एक ऐसा दरवाजा है, जिसका इतिहास खून की चादर ओढ़े हुए है. उस दरवाजे का नाम है खूनी दरवाजा. कभी ये दरवाजा मौत का मैदान हुआ करता था. इसकी कहानियां आपको झकझोर कर रख सकती हैं.
खूनी दरवाजा का खौफनाक इतिहास
घरों या महलों में दरवाजे अक्सर आने-जाने के लिए और वेंटिलेशन के लिए होते हैं. लेकिन क्या आपने सोचा है कि दरवाजे का खूनी इतिहास भी होता है? दिल्ली में एक खूनी दरवाजा है, जिसका इतिहास रोंगटे खड़े करने वाला है. ये दरवाजा हिंसा का पर्याय माना जाता है. इस दरवाजे ने कई लाशें, कटे सिर देखें हैं. इतना ही नहीं कई गोलियों की दर्दनाक चीखें भी सुनी हैं. बताते हैं कि औरंगजेब ने यहीं पर अपने भाई का सिर काटकर लटका दिया था. चलिए जानते हैं वो खौफनाक इतिहास.
दिल्ली स्थित अरुण जेटली स्टेडियम (जिसे पहले फिरोज शाह कोटला स्टेडियम के नाम से जाना जाता था) के सामने बहादुर शाह जफर मार्ग पर एक ट्रैफिक आइलैंड पर मुगल काल का एक विशाल द्वार खड़ा है. इसे खूनी दरवाजा के नाम से जाना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है रक्तरंजित द्वार, और यह अपने रक्तपात और हत्याओं के इतिहास के साथ अपने नाम को दर्शाता है. 15.5 मीटर ऊंची दो मंजिला यह संरचना दिल्ली क्वार्ट्ज़ाइट पत्थर से बना है. इसकी खिड़कियों पर लाल बलुआ पत्थर की नक्काशी है.
22 सितंबर, 1857 को एक घटना घटी थी. बहादुर शाह जफ़र द्वितीय के पांचवें और नौवें पुत्र तथा पोते, तीन मुगल राजकुमारों – मिर्ज़ा मुगल, मिर्ज़ा खिज़र सुल्तान और मिर्ज़ा अबू बख्त को मेजर विलियम हॉडसन ने इस द्वार के सामने बेहद करीब से गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस घटना का उल्लेख इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल की पुस्तक ‘ द लास्ट मुगल’ में भी मिलता है. इसी कारण इसे खूनी दरवाजा कहा जाने लगा.
शेर शाह सूरी के समय में इस द्वार का उपयोग फांसी कक्ष के रूप में किया जाता था, और अपराधियों के कटे हुए शवों को आम जनता को चेतावनी देने के लिए खूनी दरवाजे पर टांग दिया जाता था.
अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक, मुगल सेनापति और कवि अब्दुल रहीम खान-ए-खानन, जहांगीर के सिंहासना रोहण के विरोधी थे. अपने पिता अकबर की मृत्यु के बाद, जहांगीर ने अब्दुल रहीम को सत्ता से बेदखल करके और उनके दो पुत्रों की हत्या करके बदला लिया. इसके बाद मुगल सम्राट ने उनके शवों को कुख्यात खूनी दरवाजे पर छोड़ दिया.
औरंगजेब ने 1659 में अपने भाई दारा शिकोह का सिर काट दिया और उसके कटे हुए सिर को द्वार पर लटका दिया.
मुगलों के शासनकाल के बहुत बाद भी, विभाजन के समय हुए दंगों के दौरान खूनी दरवाजे पर रक्तपात जारी रहा, जब पुराना किला स्थित एक शिविर की ओर जा रहे शरणार्थियों के एक समूह का द्वार के पास ही नरसंहार कर दिया गया था.
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