FIR vs Complaint: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रकरण के बाद FIR और शिकायत मामले में बहस बढ़ गई है. जानिए क्या हर शिकायत पर FIR दर्ज करना जरूरी है, क्या पुलिस बिना शिकायत के FIR दर्ज कर सकती है, और Zero FIR व e-FIR क्या हैं.य
एफआईआर और शिकायत में अंतर
FIR vs Complaint: हाल के दिनों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रकरण के बाद FIR और सामान्य शिकायत को लेकर सार्वजनिक बहस काफी बढ़ गई थी. आम जनता के मन में कई सवाल उत्पन्न होने लगे थे और सबसे बड़ा प्रश्न यही है. क्या हर शिकायत पर FIR दर्ज करना जरूरी है? और क्या पुलिस बिना किसी शिकायत के भी FIR दर्ज कर सकती है? आइए जानते हैं FIR और शिकायत में क्या अंतर है, जीरो FIR और e-FIR क्या है आदि.
क्या आपको पता हैं कि किसी व्यक्ति पर एफआईआर इतनी आसानी से और जल्दी दर्ज नहीं की जा सकती है. एफआईआर केवल गंभीर मामले के आरोप में ही दर्ज की जाती है. एफआईआर में पुलिस के पास बगैर किसी वारंट के आरोपी को आरेस्ट करने का पूरा अधिकार होता है.
आपराधिक मामले में कंप्लेंट वह है, जो किसी भी व्यक्ति द्वारा पुलिस को की जाती है. यह मौखिक और लिखित दोनों होती है.आमतौर पर कंप्लेंट किसी भी पीड़ित, प्रत्यक्षदर्शी या फिर किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा भी दी जा सकती है. लेकिन FIR कंप्लेंट के आधार पर दर्ज की जाती है. शिकायत में किसी फॉर्मेट की जरूरत नहीं होती है, जबकि FIR के लिए क्रिमिनल प्रोसिजर कोड की जरूरत होती है.
अगर आपके साथ किसी भी प्रकार का गंभीर अपराध हुआ है. जैसे मारपीट, धोखाधड़ी, छेड़छाड़, हिंसा या चोरी तो फिर पुलिस को ऐसे में तुरंत FIR दर्ज करना चाहिए. भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धाराओं के अनुसार इन मामलों को संज्ञेय अपराध माना जाता है और ऐसे अपराधों की शिकायत मिलने पर पुलिस को एक्शन लेना ही होता है. लेकिन अगर थाना आपकी शिकायत नहीं ली जा रही है. तो आप सीधे जिले के SP या डीएसपी से जाकर बात कर सकते हैं. उनके पास FIR दर्ज कराने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों होती है.
सामान्य FIR एक ऐसी एफआईआर है जो नियमित लेन-देन के संबंध में किसी पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के विरुद्ध दर्ज कराई जाती है, जिसके खिलाफ दूसरे पक्ष ने कोई गलत काम किया हो. इस तरह के एफआईआर निकटतम पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई जाती है.
जीरो FIR की अवधारणा अपेक्षाकृत नई है और इसे 2012 में निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद न्यायमूर्ति वर्मा समिति की सिफारिश पर लागू किया गया. इसका उद्देश्य पुलिस पर त्वरित कार्रवाई करने का कानूनी दायित्व डालना और उनके कार्य क्षेत्र के अभाव का बहाना बनाने से रोकना. जीरो FIR किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज की जा सकती है, चाहे अपराध उस पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में हुआ हो या नहीं हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
जब दोनों पक्ष एक ही घटना के संबंध में एक-दूसरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराते हैं, तो इसे काउंटर एफआईआर या क्रॉस एफआईआर कहते है.
ई-एफआईआर इलेक्ट्रॉनिक एफआईआर है और इसे बलात्कार, हत्या, दहेज हत्या आदि जैसे संज्ञेय अपराधों के मामलों में दर्ज किया या कराया जा सकता है. इसका मुख्य उद्देश्य उन पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा करना है जो सामाजिक दबाव, समाज का सामना करने में असमर्थता आदि कारणों से नजदीकी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराने में असमर्थ हो सकते हैं.
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