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दिन में पढ़ता था धार्मिक ग्रंथ, वीकेंड पर बन राक्षस… कैसे एक कपड़ा व्यापारी ने सुकून के लिए की 22 हत्याएं?

Weekend Killer Sadashiv Sahu: आज हम बात करेंगे उस कुख्यात सीरियल किलर की जो भले ही पेशे से कपड़ा व्यापारी था, लेकिन उसने रायबरेली और सुल्तानपुर की सीमाओं पर मौत का एक खौफ़नाक खेल खेला, एक ऐसा खेल जो इतना डरावना था कि आज भी, उसका ज़िक्र भर सुनकर वहां के बुज़ुर्गों की रूह कांप उठती है. उसका जुनून इतना विकृत था कि वह सिर्फ़ एक या दो लोगों को मारकर नहीं रुका; बल्कि, उसने 22 बेकसूर पीड़ितों की खोपड़ियों में गोली उतार दी, और उन्हें हमेशा की नींद सुला दिया.

Serial Killer Sadashiv Sahu: उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में जैसे ही सूरज डूबा, इन गांवों पर न सिर्फ़ सन्नाटा छा गया, बल्कि एक ऐसा डर भी छा गया जिसे महसूस किया जा सकता था, एक ऐसा गहरा आतंक जो हवा में भी घुला हुआ था. डर से कांपते हुए लोग अपने दरवाज़े अंदर से बंद कर लेते थे, और साँस थामकर बेसब्री से सुबह होने का इंतज़ार करते थे. यह डर भूतों या प्रेतों का नहीं था, बल्कि एक ‘इंसानी हैवान’ का था, एक ऐसा शिकारी जो अंधेरे का फ़ायदा उठाकर मौत का तांडव मचाता था.
हम बात कर रहे हैं कुख्यात सीरियल किलर सदाशिव साहू की जो भले ही पेशे से कपड़ा व्यापारी था, लेकिन उसने रायबरेली और सुल्तानपुर की सीमाओं पर मौत का एक खौफ़नाक खेल खेला, एक ऐसा खेल जो इतना डरावना था कि आज भी, उसका ज़िक्र भर सुनकर वहां के बुज़ुर्गों की रूह कांप उठती है. उसका जुनून इतना विकृत था कि वह सिर्फ़ एक या दो लोगों को मारकर नहीं रुका; बल्कि, उसने 22 बेकसूर पीड़ितों की खोपड़ियों में गोली उतार दी, और उन्हें हमेशा की नींद सुला दिया.

कड़ाके की रात कैसे सदाशिव साहू ने बना दी खौफनाक?

सदाशिव साहू के मारने का तरीका इतना सटीक और रूह कंपा देने वाला था कि उसके पीड़ितों को न तो कोई प्रतिक्रिया देने का मौका मिलता था और न ही खुद का बचाव करने का. एक कड़ाके की ठंड वाली रात, विषम साहू अपने घर के बाहर अलाव के पास बैठकर खुद को सेंक रहा था, उसके साथ कुछ और साथी भी थे. हंसी-मज़ाक के बीच, अचानक एक ज़ोरदार धमाका हुआ धड़ाम! जिसने सन्नाटे को तोड़ दिया. पलक झपकते ही, आग की एक लकीर विषम के सीने को चीरती हुई निकल गई, और वह ज़मीन पर गिर पड़ा, उसकी मौत हो चुकी थी. पास बैठे लोग यह भी नहीं समझ पाए कि हमला कहाँ से हुआ था. न कोई हमलावर दिखाई दिया, और न ही किसी के आने की आहट सुनाई दी. बस एक गोली, और सब कुछ खत्म.

चक्की के अंदर खून से लथपथ मंज़र: गांव वाले अंदर तक हिल गए

एक सुबह, जब गांव वाले जगदीश की आटा चक्की पर पहुंचे, तो वहां का नज़ारा देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गए. अंदर, जगदीश की लाश उसके बिस्तर पर पड़ी थी. कातिल ने उसके सिर के पिछले हिस्से में इतनी बेरहमी से गोली मारी थी कि उसकी खोपड़ी के परखच्चे उड़ गए थे. खून से लथपथ बिस्तर और उसके चारों ओर भिनभिनाती मक्खियां, हत्यारे की क्रूरता का भयानक सबूत थीं. जगदीश के छोटे भाई राजेश और उसकी पत्नी की चीखों और विलाप से पूरा गाँव अंदर तक हिल गया था. यह किसी ऐसे सीरियल किलर (क्रमिक हत्यारे) का काम लग रहा था जो हमेशा सोते हुए लोगों को ही अपना निशाना बनाता था.

दिन में भक्त, रात में मौत का देवता बन जाता था सदाशिव

सदाशिव साहू की सबसे हैरान करने वाली बात उसका दोहरा व्यक्तित्व था. दिन के उजाले में, वह किसी भी आम इंसान की तरह रहता था, रोज़ाना पूजा-पाठ करता, लोगों से घुलता-मिलता और मंदिर जाता था. लेकिन जैसे ही सूरज ढलता, उसके अंदर का शैतान जाग उठता था. वह अपनी पुरानी, ​​आगे से भरी जाने वाली बंदूक उठाता और इंसानों के शिकार पर निकल पड़ता था. उसके अंदर खून की ऐसी प्यास थी कि वह सिर्फ़ रोमांच के लिए लोगों की जान ले लेता था; उसके मन में अपने शिकारों के प्रति कोई निजी दुश्मनी नहीं होती थी.

खौफज़दा लोगों ने बाहर सोना बंद कर दिया

जगदीश की हत्या के बाद भी हत्याओं का सिलसिला नहीं रुका. एक साल के अंदर ही तीन-चार और हत्याएं हो गईं. हर बार हत्या का तरीका एक जैसा ही होता था: आधी रात को गोली चलने की आवाज आती, और उसके बाद दो साये जैसी आकृतियां अंधेरे में गायब होती हुई दिखाई देतीं. गांव वालों ने बताया कि उन्होंने एक लंबे और एक छोटे कद के आदमी को, जिन्होंने काले कपड़े या बुर्के जैसे लिबास पहने हुए थे मौके से भागते हुए देखा था.
दहशत इतनी बढ़ गई कि फुरसतगंज इलाके के कई गांवों के लोगों ने घरों के बाहर सोना पूरी तरह से बंद कर दिया. जैसे ही रात होती, दरवाज़ों पर कुंडी लगा दी जाती. बुज़ुर्ग लोग भी शाम ढलने के बाद घरों से बाहर निकलने से डरते थे. हालात इतने बिगड़ गए थे कि पुलिस की टीमें बस आतीं, अपनी रजिस्टर में तारीख और समय दर्ज करतीं, और फिर चली जातीं. चूहे-बिल्ली का यह जानलेवा खेल सालों तक चलता रहा.

जब पुलिस ने खोली पुराने केस की फाइल

साल 2003 में, ऐसे ही एक मामले की जांच की ज़िम्मेदारी असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (ASP) वी.पी. श्रीवास्तव को सौंपी गई, जो बाद में सीनियर सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ Police (SSP) के पद से रिटायर हुए। वी.पी. श्रीवास्तव ने पुराने केस की फाइलें निकलवाईं और सुरागों को जोड़कर मामले की कड़ियां सुलझाने लगे.
तारीखें एक क्रम में सामने आने लगीं: 1998, 1999, 2000, 2001, 2002… हर दो या तीन महीने में खून-खराबे का एक नया मामला सामने आ जाता. जब अपराध वाली जगहों को दिखाने के लिए नक्शे पर पिन लगाए गए, तो यह साफ हो गया कि यह दहशत रायबरेली-सुल्तानपुर सड़क के किनारे बसे पांच-छह गांवों तक ही सीमित थी.

वीकेंड पर करता था लोगों की हत्या

पीड़ितों की कुल संख्या लगभग 35 हत्याओं तक पहुंच गई थी. एक खास पैटर्न सामने आया: पीड़ित ज़्यादातर 50 से 70 साल की उम्र के पुरुष थे, जो अपने घरों के बाहर सोते थे. सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि ये हत्याएं सिर्फ शनिवार, रविवार या सोमवार की रातों को ही होती थीं.
जांच की रणनीति में बदलाव किया गया. गांव के प्राइमरी स्कूल के अंदर एक अस्थायी पुलिस चौकी बनाई गई. इलाके में सात अलग-अलग पुलिस थानों से पुलिस बल तैनात किया गया. गांव की गलियों में हर जगह तेज़ रोशनी वाली ड्रैगन लाइट्स लगाई गईं. पुलिस को पूरा यकीन था कि कातिल या कातिल ज़्यादा समय तक चुपचाप नहीं बैठ पाएंगे.

कैसे खुला सदाशिव का राज़?

8 नवंबर, 2004 की शाम को, समसी गाँव में, विश्राम साहू नाम का एक आदमी अलाव के पास बैठकर खुद को सेंक रहा था. अचानक, गोली चलने की आवाज़ आई, और वह वहीं ज़मीन पर गिर पड़ा. कातिल नहर की तरफ भागा और पानी में कूद गया. तलाशी के दौरान, पुलिस को घटनास्थल पर गीली मिट्टी में पैरों के निशान और घास में एक जूता मिला.
पूछताछ के दौरान, एक गांववाले ने बताया कि उसने उसी रात अपने पड़ोसी, सदाशिव साहू को गीले कपड़े पहने हुए अपने घर में घुसते देखा था. पुलिस ने सदाशिव को हिरासत में ले लिया. वह एक आम दुकानदार था एक धार्मिक आदमी जो अपनी दुनिया में ही मस्त रहता था. जब पुलिस ने उसके घर की तलाशी ली, तो उन्हें एक नकली दाढ़ी और मूँछ, नाटक के कपड़े, और एक लाइसेंसी बंदूक मिली जो पानी में डूबी हुई थी.

खून देख सुकून मिलता था

जब ASP ने पुलिस स्टेशन में सदाशिव से पूछताछ की, तो उसके कबूलनामे ने सबको हैरान कर दिया। उसने 22 हत्याएँ करने की बात कबूल की. ​​उसने कहा कि मुझे खून देखने की एक ज़बरदस्त चाहत महसूस होती है. अगर मैं एक-दो महीने तक किसी को न मारूं, तो मैं सो नहीं पाता. उसे तभी शांति मिलती थी जब वह ज़मीन पर खून बहते हुए देखता था. उसका बेटा, जयकरण भी इस मामले में एक संदिग्ध के तौर पर सामने आया, क्योंकि सदाशिव अक्सर उसे ज़बरदस्ती अपने साथ ले जाता था.

कैसे हुआ सदाशिव साहू का अंत?

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, सदाशिव ने अपने कबूलनामे से मुकरने की कोशिश की, लेकिन सबूतों ने सच्चाई को पूरी तरह से साबित कर दिया. 18 साल तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 2022 में उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई. हालांकि, 2023 में जेल के अंदर ही उसकी मौत हो गई. इस बीच, सबूतों की कमी के कारण उसके बेटे को बरी कर दिया गया.
Shristi S

Shristi S has been working in India News as Content Writer since August 2025, She's Working ITV Network Since 1 year first as internship and after completing 3 months intership Shristi Joined Inkhabar Haryana of ITV Group on November 2024. She Worked in Inkhabar Haryana 9 months there she cover full Haryana news. Currently In India News her speciality is hard news, lifestyle, entertainment, Business.

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