UP Elections: बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने भतीजे आकाश आनंद को सौंप दी है. हालांकि आकाश आनंद के सामने इस समय BSP को फिर से मज़बूत बनाने की एक बड़ी चुनौती है. लेकिन, इस पार्टी का संघर्षों से भरा एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है. यह वही पार्टी है जिसने देश की दलित राजनीति पर एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों को भी दलित समुदाय की ताकत को स्वीकार करना पड़ा. BSP ने यह साबित कर दिखाया कि दलित-मुस्लिम गठबंधन की ताकत से राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है और एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी पाया जा सकता है. यह बहुजन समाज पार्टी ही थी जिसने गठबंधन की राजनीति के दांव-पेचों के साथ बड़े पैमाने पर प्रयोग किए. चाहे कांग्रेस हो, BJP हो, या फिर उसकी कट्टर विरोधी समाजवादी पार्टी, BSP ने सभी के साथ गठबंधन किया और बाद में उन्हें तोड़ भी दिया. कांशीराम के मार्गदर्शन में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाली मायावती ने BSP को उसके स्वर्णिम युग तक पहुंचाया. उनकी राजनीतिक यात्रा में कई अहम मोड़ आए. यह एक ऐसी गाथा है जो भरोसे और धोखे, संघर्ष के ज़बरदस्त जुनून, अपमान के पलों और फिर से उठ खड़े होने के अदम्य साहस से भरी हुई है. तो चलिए, शुरुआत करते हैं.
मायावती का राजनीतिक सफर
UP Elections: बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने भतीजे आकाश आनंद को सौंप दी है. हालांकि आकाश आनंद के सामने इस समय BSP को फिर से मज़बूत बनाने की एक बड़ी चुनौती है. लेकिन, इस पार्टी का संघर्षों से भरा एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है. यह वही पार्टी है जिसने देश की दलित राजनीति पर एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों को भी दलित समुदाय की ताकत को स्वीकार करना पड़ा. BSP ने यह साबित कर दिखाया कि दलित-मुस्लिम गठबंधन की ताकत से राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है और एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी पाया जा सकता है. यह बहुजन समाज पार्टी ही थी जिसने गठबंधन की राजनीति के दांव-पेचों के साथ बड़े पैमाने पर प्रयोग किए.
चाहे कांग्रेस हो, BJP हो, या फिर उसकी कट्टर विरोधी समाजवादी पार्टी, BSP ने सभी के साथ गठबंधन किया और बाद में उन्हें तोड़ भी दिया. कांशीराम के मार्गदर्शन में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाली मायावती ने BSP को उसके स्वर्णिम युग तक पहुंचाया. उनकी राजनीतिक यात्रा में कई अहम मोड़ आए. यह एक ऐसी गाथा है जो भरोसे और धोखे, संघर्ष के ज़बरदस्त जुनून, अपमान के पलों और फिर से उठ खड़े होने के अदम्य साहस से भरी हुई है. तो चलिए, शुरुआत करते हैं.
निस्संदेह, आजादी के बाद कई दलित नेता हुए लेकिन कांशीराम उन सबसे अलग थे. उन्होंने दलित राजनीति को एक जन-आंदोलन में बदलने का प्रयास किया. कांशीराम ने पुणे में DRDO में लैब असिस्टेंट के तौर पर काम किया. उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए खुद को पूरी तरह से समाज सेवा में समर्पित करने हेतु अपनी नौकरी छोड़ दी. 1973 में उन्होंने ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड (और) माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ एम्प्लॉईज़ फेडरेशन’यानी BAMCEF की स्थापना की. इस संगठन के माध्यम से कांशीराम ने दलितों को राजनीतिक सत्ता हासिल करने की आकांक्षा रखने के लिए प्रेरित किया. वे कहा करते थे कि जब तक अन्य राजनीतिक दल दलितों के मन पर अपना वर्चस्व बनाए रखेंगे. तब तक उनके घरों में केवल खेतिहर मज़दूर ही पैदा होंगे. उनका संगठन तेजी से बढ़ रहा था.
वहीं, दूसरी ओर मायावती का जन्म 15 जनवरी, 1956 को दिल्ली के सुचेता कृपलानी अस्पताल में हुआ था. वे 1975 में दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से अपनी BA की डिग्री प्राप्त की थी. उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से अपनी B.Ed. पूरी की और उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी LLB की पढ़ाई पूरी की.
पढ़ाने की अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ मायावती UPSC परीक्षाओं की भी तैयारी कर रही थीं. इसी बीच 1977 में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, जहां मायावती को बोलने का अवसर मिला. उस समय के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण भी वहां मौजूद थे. वे दलितों को हरिजन कहकर संबोधित कर रहे थे. जब मायावती मंच पर आईं तो उन्होंने राज नारायण से साफ-साफ शब्दों में कहा कि उन्हें हरिजन कहकर संबोधित करके वे उनका अपमान कर रहे हैं. सम्मेलन में मायावती अपने भाषण के ज़रिए पहले ही अपनी एक अलग पहचान बना चुकी थीं. जब यह खबर कांशीराम तक पहुंची, तो वे स्वयं मायावती के घर गए. वहां कांशी राम ने मायावती के पिता प्रभुदयाल को बताया कि वे ‘बामसेफ़’ (BAMCEF) के अध्यक्ष हैं और मायावती को पुणे में भाषण देने के लिए आमंत्रित करने आए हैं.
यह किस्सा राजनीतिक गलियारों में काफी मशहूर है. यह कुछ इस तरह है: ‘जब कांशीराम ने मायावती से पूछा कि वह भविष्य में क्या बनना चाहती हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि वह अपने समुदाय की सेवा करने के लिए IAS में शामिल होना चाहती हैं. इस पर कांशीराम ने कहा कि IAS अधिकारी बनकर तुम क्या हासिल करोगी? मैं तुम्हें एक ऐसा नेता बना सकता हूं जिसके पीछे सिर्फ़ एक जिला कलेक्टर ही नहीं बल्कि दर्जनों कलेक्टर लाइन में खड़े होंगे. तभी तुम सचमुच अपने समुदाय की सेवा कर पाओगी. इसके बाद मायावती कांशीराम के साथ जुड़ गईं और इस आंदोलन का एक अहम हिस्सा बन गईं.’
राजनीति में मायावती के आने का असर उनके घर पर साफ़ दिखाई दे रहा था. उनके पिता ने उन पर दबाव डाला और मांग की कि वे सब कुछ छोड़कर IAS परीक्षा की तैयारी फिर से शुरू करें नहीं तो घर छोड़ दें. इसके जवाब में मायावती ने अपनी टीचिंग की नौकरी से बचाए हुए पैसे जमा किए अपने कपड़े एक सूटकेस में पैक किए और घर छोड़ दिया. चूंकि उनके पास कमरा किराए पर लेने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, इसलिए वे पार्टी ऑफ़िस में चली गईं और वहीं रहने लगीं.
इसके बाद मायवती ने कांशीराम के साथ मिलकर कई सम्मेलनों और आंदोलनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. 1984 में जब BSP की स्थापना हुई तब वह कांशीराम की मुख्य टीम की सदस्य थीं. बाद में उन्होंने उपचुनाव लड़े. 1985 में बिजनौर से और 1987 में हरिद्वार से. हालांकि, मायावती को अपनी पहली जीत के लिए 1989 तक इंतज़ार करना पड़ा. उस चुनाव में बिजनौर का प्रतिनिधित्व करते हुए वह पहली बार संसद सदस्य बनीं.
दरअसल, मायावती ने 1984 में लोकसभा चुनाव मुजफ्फरनगर की कैराना सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था. इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के अख्तर हसन विजयी रहे थे. हालांकि, अपने पहले ही चुनावी मुकाबले में मायावती तीसरे स्थान पर रहीं. अकेले दम पर 44,000 से ज़्यादा वोट हासिल करके उन्होंने अपनी दमदार मौजूदगी का एहसास कराया. फिर भी उस दौर में जीत उनसे काफी दूर थी. इसके बाद 1985 में मायावती ने बिजनौर उपचुनाव में अपनी किस्मत आजमाई. इस मुकाबले में वह जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार और राम विलास पासवान को चुनौती दे रही थीं, जिन्हें दलितों के बीच एक कद्दावर नेता माना जाता था. बिजनौर का यह उपचुनाव उस दौर की सबसे हाई-प्रोफाइल चुनावी जंग साबित हुआ.
मीरा कुमार ने विदेश सेवा में अपने पद से इस्तीफा देने के बाद खास तौर पर यह चुनाव लड़ने के लिए वापसी की थी. उनके समर्थन में भीड़ जुटाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने बिजनौर में प्रचारकों की पूरी फौज उतार दी थी. वहीं दूसरी ओर राम विलास पासवान के लिए जो बिहार की हाजीपुर सीट पहले ही रिकॉर्ड अंतर से जीत चुके थे. मुलायम सिंह यादव और शरद यादव समेत कई बड़े राजनीतिक दिग्गज उनकी तरफ से प्रचार करने के लिए कई दिनों से उस क्षेत्र में डेरा डाले हुए थे.
मायावती BSP की सदस्य थीं. फिर भी चुनाव आयोग ने उन्हें एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर पंजीकृत किया क्योंकि BSP को अभी तक आधिकारिक मान्यता नहीं मिली थी. पूरी तरह से अपनी ही ताकत पर चुनाव प्रचार करते हुए मायावती अपनी जबरदस्त दृढ़ता के दम पर चुनाव के राजनीतिक दिग्गजों के बीच चर्चा का मुख्य केंद्र बन गईं. वह अपना चुनाव प्रचार साइकिल के कैरियर पर बैठकर करती थीं. वह सड़क किनारे गरीबों के साथ भोजन करती थीं और दलित बस्तियों में काफी समय बिताती थीं. उनके भाषण इतने आक्रामक होते थे कि वे हमेशा सुर्खियों में छा जाते थे. हालांकि, अंततः मीरा कुमार ने 5,000 से कुछ ज़्यादा वोटों के अंतर से चुनाव जीत लिया और राम विलास पासवान दूसरे स्थान पर रहे. लेकिन मायावती ने इस मुकाबले में 61,000 से ज़्यादा वोट हासिल करके राजनीति के क्षेत्र में अपने लिए एक मज़बूत राह बनाना पहले ही शुरू कर दिया था.
हरिद्वार में 1987 के चुनाव में मायावती को 125,000 से ज़्यादा वोट मिले फिर भी वह जीत से चूक गईं और दूसरे स्थान पर रहीं. इस चुनाव की एक खास बात यह थी कि जनता दल की ओर से चुनाव लड़ रहे राम विलास पासवान अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए. लगातार हार के बावजूद मायावती का हौसला नहीं टूटा क्योंकि उनका जनाधार लगातार बढ़ रहा था. आखिरकार, 1989 में उन्हें सफलता मिली. यह वह दौर था जब पूरे देश में बदलाव की बयार बह रही थी और गैर-कांग्रेसी पार्टियों का देश की राजनीति पर दबदबा था. इसी माहौल में कांशीराम के नेतृत्व में BSP ने लोकसभा की तीन सीटें जीतीं. बिजनौर से ही मायावती ने पहली बार जीत का स्वाद चखा. इसके अलावा इसी दौरान BSP ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी 13 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की.
हालांकि, 1991 में देश एक बार फिर मध्यावधि चुनावों की ओर बढ़ गया. पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के बाद BSP 1991 के लोकसभा चुनावों में केवल दो सीटें ही जीत पाई. मायावती उन दोनों ही सीटों बिजनौर और हरिद्वार से चुनाव हार गईं, जहां से उन्होंने चुनाव लड़ा था. फिर 1992 में उन्होंने होशियारपुर उपचुनाव में अपनी किस्मत आजमाई लेकिन वहां भी जीत उनके हाथ नहीं लगी.
साल 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव BSP और मायावती दोनों के लिए ही एक निर्णायक मोड़ साबित हुए. इस चुनाव में कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और BSP 67 सीटें जीतने में सफल रही. मुलायम की समाजवादी पार्टी ने 109 सीटें हासिल कीं. UP में SP और BSP की गठबंधन सरकार बनी. ठीक अगले ही साल मायावती को राज्यसभा भेज दिया गया. हालांकि, UP में राजनीतिक हालात बिगड़ने लगे. आखिरकार 1995 में BSP ने SP से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी.
साल 1995 में BJP के समर्थन से मायावती पहली बार UP की मुख्यमंत्री बनीं. हालांकि, इससे ठीक पहले मायावती को एक अपमानजनक अनुभव से गुज़रना पड़ा. एक ऐसी घटना जिसकी यादें आज भी लखनऊ के सत्ता के गलियारों में ताज़ा हैं. दरअसल, 1995 में जिस पल BSP ने SP के साथ गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की, लखनऊ में SP समर्थक हिंसक हो उठे. 2 जून 1995 को मायावती लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में ठहरी हुई थीं. वहां, लगभग 200 SP समर्थकों की भीड़ ने हमला बोल दिया. उन्होंने न केवल मायावती को अपमानित किया बल्कि उनके समर्थकों के साथ मारपीट भी की. मायावती रात लगभग 1:00 बजे तक अपने कमरे में ही फंसी रहीं. राजनीतिक विश्लेषक इस घटना को एक ऐसे निर्णायक कारक के रूप में देखते हैं, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति की भावी दिशा तय की. SP और BSP एक-दूसरे की कट्टर राजनीतिक विरोधी बन गईं. यह कटुता दो दशकों से भी अधिक समय तक बनी रही.
हालांकि, BSP द्वारा समर्थन वापस ले लिए जाने के कारण मुलायम को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर होना पड़ा. इसके बाद BJP के समर्थन से मायावती राज्य की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं. बाद में 1997 में उन्होंने दूसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया. हालांकि यह कार्यकाल बहुत छोटा था. 2001 में कांशी राम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. इस घोषणा के बाद 3 मई 2002 को मायावती ने तीसरी बार मुख्यमंत्री का पदभार संभाला. यह BJP और BSP द्वारा बनाई गई एक गठबंधन सरकार थी. इस कार्यकाल के दौरान मायावती द्वारा वरिष्ठ BJP नेता लालजी टंडन को राखी बांधने की घटना ने मीडिया में काफ़ी सुर्खियां बटोरीं. हालांकि, इस बार भी उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं चला. अगस्त 2003 तक BJP ने अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए.
चूंकि उस समय तक मायावती BSP की निर्विवाद सर्वोच्च नेता बन गई थीं और कांशीराम की सेहत खराब रहने लगी थी. इसलिए आम तौर पर यह माना जाता था कि उनकी अनुपस्थिति में उनके लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा. हालांकि, 2007 में ठीक इसका उल्टा हुआ. पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाते हुए BSP ने पहली बार बहुमत हासिल किया और मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं. यह उनका पहला कार्यकाल था जिसके दौरान उन्होंने पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया.
हालांकि, 2012 आते-आते मायावती का राजनीतिक ग्राफ नीचे गिरने लगा. सबसे पहले उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी SP ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया और उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार बनाई. फिर 2014 के लोकसभा चुनाव आए, जिसमें BSP एक भी सीट जीतने में नाकाम रही. 2017 तक BJP ने राज्य की राजनीति में ज़ोरदार वापसी की और एकतरफ़ा प्रदर्शन करते हुए सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. इस बीच BSP का ग्राफ और भी तेजी से नीचे गिरा. जिस पार्टी ने महज़ दस साल पहले सरकार बनाई थी, वह अब राज्य में तीसरे स्थान पर खिसक गई थी.
मायावती ने अपनी कोशिशें जारी रखीं और 2019 में स्टेट गेस्ट हाउस घटना की कड़वी यादों को भुलाकर उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन भी कर लिया. राजनीतिक विश्लेषकों को इस गठबंधन से काफी उम्मीदें थीं. हालांकि, इस गठबंधन का फ़ायदा जमीन पर ज़्यादा दिखाई नहीं दिया. हालांकि BSP को निश्चित रूप से बढ़त मिली शून्य से बढ़कर 10 सांसद हो गए. लेकिन चुनावों के बाद यह गठबंधन टूट गया. इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनावों में BSP ने किसी के साथ गठबंधन नहीं किया और अकेले ही चुनावी मैदान में उतरी. फिर भी इस बार पार्टी विधानसभा में सिर्फ़ एक सीट ही जीत पाई.
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