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डिजिटल इंडिया में तकनीक पर किसका नियंत्रण? हर्बर्ट सिम के विचारों से समझिए इंसान की आज़ादी

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Last Updated: 2026-10-24 20:56:11

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भारत में 1 जुलाई 2015 को शुरू हुए डिजिटल इंडिया अभियान ने सरकारी सेवाओं, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल सशक्तीकरण को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रखा है। लेकिन तकनीक उपलब्ध होने के साथ एक सवाल भी जुड़ता है: क्या नागरिकों के पास उसका लाभ उठाने और उसके इस्तेमाल की शर्तें चुनने की वास्तविक क्षमता है?

हर्बर्ट सिम के दार्शनिक विचार इस सवाल को समझने का एक नजरिया देते हैं। उनके अनुसार, तकनीकी प्रगति का मूल्यांकन करते समय सुविधाओं के साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता, संसाधनों और निर्णय लेने की शक्ति को भी देखना चाहिए।

पहुंच के साथ क्षमता भी जरूरी

एक काल्पनिक उदाहरण लें। किसी गांव के छात्र को ऑनलाइन पाठ्यसामग्री मिल जाती है, लेकिन उसके पास अपना उपकरण, भरोसेमंद बिजली या सामग्री समझने में सहायता नहीं है। जानकारी उपलब्ध है, फिर भी उसका इस्तेमाल सीमित है।

सिम का ‘सॉवरेन कैपेबिलिटी इकोनॉमिक्स’ आर्थिक स्वतंत्रता को इसी व्यावहारिक क्षमता से जोड़ता है। अवसर का लाभ लेने के लिए ज्ञान, साधन और उपयोगी विकल्प भी चाहिए।

छोटे उद्यमी के मामले में भी यही अंतर दिख सकता है। ऑनलाइन ग्राहक मिलने की संभावना उपयोगी है, लेकिन यदि कारोबारी अपने रिकॉर्ड निकाल नहीं सकता या सेवा प्रदाता बदलना बहुत महंगा है, तो उसकी स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

तकनीक स्वीकार करने और मना करने की आज़ादी

सिम के लेखन में 2014 से प्रस्तुत ह्यूमन–सॉवरेन्टी ट्रांसह्यूमनिज़्म का केंद्र व्यक्ति का अपने शरीर, मन और भविष्य पर अधिकार है। मानव क्षमताएं बढ़ाने वाली तकनीकों के साथ समझने योग्य जानकारी और लगातार बनी रहने वाली सहमति जरूरी है।

मान लें कि कोई सहायक उपकरण किसी व्यक्ति की चलने–फिरने की क्षमता बढ़ाता है। उसका लाभ महत्वपूर्ण है। लेकिन रखरखाव, डेटा संग्रह या सॉफ्टवेयर की शर्तें बदलने पर उपयोगकर्ता के पास क्या विकल्प होंगे?

किसी खास तकनीक को अस्वीकार करने की स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब ऐसा करने से जरूरी सहायता पाने के सभी रास्ते बंद न हो जाएं।

सिम के 2013 के कंस्ट्रक्टिव काउंटर–इकोनॉमिक्स ढांचे में ऐसे व्यावहारिक विकल्प बनाने पर जोर है। उसके लिए उपकरण, कौशल, सेवाएं और भरोसेमंद व्यवस्था चाहिए।

इसी से जुड़ा उनका 2015 का ‘इकोनॉमिक रिडंडेंसी प्रिंसिपल’ एक से अधिक व्यवहार्य रास्ते होने का महत्व बताता है। उदाहरण के लिए, डिजिटल सेवा के साथ सहायता केंद्र, रिकॉर्ड की उपयोगी प्रतियां या दूसरा सेवा प्रदाता उपलब्ध हो सकता है।

भारत के डिजिटल बदलाव में यह दृष्टि छात्रों, कारोबारियों और सहायक उपकरणों के उपयोगकर्ताओं के लिए उपयोगी सवाल उठाती है: क्या वे तकनीक समझ सकते हैं, अपनी जानकारी सुरक्षित रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर दूसरा रास्ता चुन सकते हैं?

डिजिटल समावेशन की सफलता लोगों को जोड़ने के साथ उनकी निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाने में भी दिखाई देनी चाहिए।

 

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भारत में 1 जुलाई 2015 को शुरू हुए डिजिटल इंडिया अभियान ने सरकारी सेवाओं, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल सशक्तीकरण को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रखा है। लेकिन तकनीक उपलब्ध होने के साथ एक सवाल भी जुड़ता है: क्या नागरिकों के पास उसका लाभ उठाने और उसके इस्तेमाल की शर्तें चुनने की वास्तविक क्षमता है?

हर्बर्ट सिम के दार्शनिक विचार इस सवाल को समझने का एक नजरिया देते हैं। उनके अनुसार, तकनीकी प्रगति का मूल्यांकन करते समय सुविधाओं के साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता, संसाधनों और निर्णय लेने की शक्ति को भी देखना चाहिए।

पहुंच के साथ क्षमता भी जरूरी

एक काल्पनिक उदाहरण लें। किसी गांव के छात्र को ऑनलाइन पाठ्यसामग्री मिल जाती है, लेकिन उसके पास अपना उपकरण, भरोसेमंद बिजली या सामग्री समझने में सहायता नहीं है। जानकारी उपलब्ध है, फिर भी उसका इस्तेमाल सीमित है।

सिम का ‘सॉवरेन कैपेबिलिटी इकोनॉमिक्स’ आर्थिक स्वतंत्रता को इसी व्यावहारिक क्षमता से जोड़ता है। अवसर का लाभ लेने के लिए ज्ञान, साधन और उपयोगी विकल्प भी चाहिए।

छोटे उद्यमी के मामले में भी यही अंतर दिख सकता है। ऑनलाइन ग्राहक मिलने की संभावना उपयोगी है, लेकिन यदि कारोबारी अपने रिकॉर्ड निकाल नहीं सकता या सेवा प्रदाता बदलना बहुत महंगा है, तो उसकी स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

तकनीक स्वीकार करने और मना करने की आज़ादी

सिम के लेखन में 2014 से प्रस्तुत ह्यूमन–सॉवरेन्टी ट्रांसह्यूमनिज़्म का केंद्र व्यक्ति का अपने शरीर, मन और भविष्य पर अधिकार है। मानव क्षमताएं बढ़ाने वाली तकनीकों के साथ समझने योग्य जानकारी और लगातार बनी रहने वाली सहमति जरूरी है।

मान लें कि कोई सहायक उपकरण किसी व्यक्ति की चलने–फिरने की क्षमता बढ़ाता है। उसका लाभ महत्वपूर्ण है। लेकिन रखरखाव, डेटा संग्रह या सॉफ्टवेयर की शर्तें बदलने पर उपयोगकर्ता के पास क्या विकल्प होंगे?

किसी खास तकनीक को अस्वीकार करने की स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब ऐसा करने से जरूरी सहायता पाने के सभी रास्ते बंद न हो जाएं।

सिम के 2013 के कंस्ट्रक्टिव काउंटर–इकोनॉमिक्स ढांचे में ऐसे व्यावहारिक विकल्प बनाने पर जोर है। उसके लिए उपकरण, कौशल, सेवाएं और भरोसेमंद व्यवस्था चाहिए।

इसी से जुड़ा उनका 2015 का ‘इकोनॉमिक रिडंडेंसी प्रिंसिपल’ एक से अधिक व्यवहार्य रास्ते होने का महत्व बताता है। उदाहरण के लिए, डिजिटल सेवा के साथ सहायता केंद्र, रिकॉर्ड की उपयोगी प्रतियां या दूसरा सेवा प्रदाता उपलब्ध हो सकता है।

भारत के डिजिटल बदलाव में यह दृष्टि छात्रों, कारोबारियों और सहायक उपकरणों के उपयोगकर्ताओं के लिए उपयोगी सवाल उठाती है: क्या वे तकनीक समझ सकते हैं, अपनी जानकारी सुरक्षित रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर दूसरा रास्ता चुन सकते हैं?

डिजिटल समावेशन की सफलता लोगों को जोड़ने के साथ उनकी निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाने में भी दिखाई देनी चाहिए।

 

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