Bhishma Dwadashi 2026: इस बार भीष्म द्वादशी 30 जनवरी दिन शुक्रवार को है. ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री बताते हैं कि, माघ मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी का आगमन होता है. इस दिन अपने पितरों और पूर्वजों को तर्पण, पिंडदान, तिलांजलि आदि देने से पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं.
जानिए, भीष्म द्वादशी पर जानिए पितृ दोष से मुक्ति का उपाय और मुहूर्त. (Canva)
Bhishma Dwadashi 2026: हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व होता है. ये त्योहार सुख, समृद्धि और खुशहाली के लिए विशेष दिन होते हैं, जिन्हें शास्त्रों में बताई गई विधि से करने पर चमत्कारी लाभ होते हैं. धर्म ग्रंथों में कुछ ऐसी भी तिथियों का जिक्र हैं, जो पितरों के तर्पण के लिए शुभ मानी गई हैं. बता दें कि, वैसे तो पितरों को समर्पित कई स्थितियां आती रहती हैं, जिन पर पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान, कर्मकांड, तर्पण आदि करने का विधान होता है. लेकिन, माघ मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पितरों को विशेष रूप से समर्पित होती है. इस बार भीष्म द्वादशी 30 जनवरी दिन शुक्रवार को है.
उन्नाव के ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री बताते हैं कि, माघ मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी का आगमन होता है. इस दिन अपने पितरों और पूर्वजों को तर्पण, पिंडदान, तिलांजलि आदि देने से पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं. हिंदू धर्म में भीष्म द्वादशी का विशेष महत्व बताया गया है. यह तिथि भीष्म पितामह से जुड़ा हुआ है. अब सवाल है कि, भीष्म द्वादशी का व्रत क्यों किया जाता है? भीष्म द्वादशी का शुभ मुहूर्त क्या है? भीष्म द्वादशी की पौराणिक कथा क्या है? आइए जानते हैं इस बारे में-
पौराणिक कथा के अनुसार, भीष्म पितामह महाभारत के सबसे प्रमुख पात्रों में से एक थे. ये देवनदी गंगा और राजा शांतनु की संतान थे. राजा शांतनु ने ही उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया था. कुरुक्षेत्र में हुए युद्ध के दौरान अर्जुन ने भीष्म पितामह को घायल कर दिया था. इसके बाद भीष्म 58 दिनों तक बाणों की शय्या पर रहे. जब उन्होंने हस्तिनापुर को सुरक्षित हाथों में देखा तो माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर अपने प्राणों का त्याग किया. इसके बाद पांडवों ने द्वादशी तिथि पर उनका तर्पण और पिंडदान किया. इसी तिथि पर भीष्म द्वादशी का व्रत किया जाता है.
सिर्फ फलाहार खाएं: 30 जनवरी, शुक्रवार की सुबह जल्दी उठें और स्नान आदि करने के बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें. दिन भर कुछ भी खाएं-पीएं नहीं. अगर ऐसा करना संभव न हो तो फलाहार कर सकते हैं.
भगवान विष्णु-लक्ष्मी की पूजा: इस दिन शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करें. साफ स्थान पर चित्र स्थापित कर उस पर फूलों की माला पहनाएं. कुमकुम से तिलक करें और शुद्ध घी का दीपक जलाएं.
ये चीजें अर्पित करें: इसके बाद फल, पंचामृत, सुपारी, पान, दूर्वा आदि चीजें अर्पित करें. इच्छा अनुसार भोग लगाएं. ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दें. किसी पवित्र नदी में स्नान कर जरूरतमंदों को दान भी करें.
तर्पण करें: किसी ब्राह्मण के माध्यम से भीष्म पितामाह के निमित्त तर्पण-पिंडदान आदि करें. इससे भीष्म पितामह के साथ-साथ पूर्वजों की आत्मा को भी शांति मिलती है. पितृ दोष भी शांत होता है.
ये उपाय करें: भीष्म द्वादशी पर गाय को हरा चारा खिलाएं, मछलियों के लिए तालाब में आटे की गोलियां डालें. पक्षियों के लिए छत पर दाना रखें.
इस मंत्र का करें जप: ऊं नमो नारायणाय नम: मंत्र का जाप भी भीष्म द्वादशी पर करना चाहिए. इससे आपके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं.
इन चीजों का करें दान: भीष्म द्वादशी के दिन जरूरतमंदों को भोजन, कपड़ा आदि चीजों का दान करें. इससे भी आपको शुभ फल प्राप्त होंगे.
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