Kartik month: हिंदू धर्म में कार्तिक मास को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और आराधना के लिए विशेष माना जाता है. इस महीने में भगवान के दामोदर स्वरूप की पूजा, दीपदान और हरिनाम संकीर्तन की परंपरा निभाई जाती है. दामोदर स्वरूप का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की उस बाल लीला से है, जिसमें माता यशोदा ने उन्हें रस्सी से ओखल के साथ बांध दिया था. इस प्रसंग में भगवान की शक्ति के सामने माता के प्रेम और वात्सल्य की महिमा दिखाई देती है.
दीपावली और भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी
त्रेतायुग की मान्यता के अनुसार, दीपावली का संबंध भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटने से जुड़ा है. उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर पूरी नगरी को रोशन किया था. वहीं, द्वापर युग में कार्तिक मास का विशेष संबंध भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और दामोदर लीला से माना जाता है. इस तरह कार्तिक मास में दीप जलाने की परंपरा भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का माध्यम बनती है.
जब माता यशोदा के प्रेम के आगे बंध गए भगवान कृष्ण
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण की दामोदर लीला का वर्णन मिलता है. बालकृष्ण की शरारतों से परेशान होकर एक दिन माता यशोदा ने उन्हें बांधने का प्रयास किया. उन्होंने रस्सी से भगवान को ओखल के साथ बांधना चाहा, लेकिन हर बार रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ जाती थी. माता यशोदा ने कई रस्सियां जोड़कर भी कोशिश की, मगर हर बार वही स्थिति रही. आखिरकार माता की मेहनत, थकान और निष्कपट प्रेम को देखकर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं बंधने के लिए तैयार हो गए. इस लीला में भगवान का वह स्वरूप सामने आता है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता रखते हुए भी माता के वात्सल्य के आगे स्वयं को बंधने देते हैं. इसी प्रसंग के कारण उन्हें दामोदर नाम मिला. ‘दाम’ का अर्थ रस्सी और ‘उदर’ का अर्थ पेट होता है.
कार्तिक मास में दीपदान का क्या है महत्व?
कार्तिक मास में भगवान श्रीकृष्ण के दामोदर स्वरूप की पूजा और दीपदान की परंपरा निभाई जाती है. भक्त मंदिरों में दीप जलाकर भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं. इस दौरान हरिनाम संकीर्तन और भजन भी किए जाते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस महीने में श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा मन में प्रेम, समर्पण और ईश्वर के प्रति आत्मीयता का भाव जगाती है.
गोवर्धन पूजा से महारास तक
कार्तिक मास में भगवान श्रीकृष्ण की कई लीलाओं का स्मरण किया जाता है. गोवर्धन पूजा के अवसर पर उस प्रसंग को याद किया जाता है, जब भगवान ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था. इस लीला के माध्यम से इंद्र के अभिमान का दमन और भगवान के भक्तों के प्रति उनके संरक्षण भाव का संदेश मिलता है. इसी महीने गोपाष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की गौचारण लीला का स्मरण करते हुए गौमाता की पूजा की जाती है. इसके अलावा कालिया नाग मर्दन और ब्रज की महारास लीला भी कृष्णभक्ति की परंपरा में विशेष महत्व रखती हैं. इन सभी प्रसंगों के माध्यम से भक्त भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम, करुणा और भक्तों के प्रति उनके स्नेह का स्मरण करते हैं.