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लयारी का सबसे प्रसिद्ध चील चौक, बाज़, शाहीन या चील? यहां जानें फिल्म धुरंधर में दिखाए इस रोचक सीन के बारे का क्या है इतिहास?

Lyari Cheel Chawk: फिल्म धुरंधर तो आप सभी ने देखे होगी. कराची का लयारी इलाका अपनी जीवंत संस्कृति, फुटबॉल के प्रति जुनून और अपने ऐतिहासिक चौकों के विश्वभर…

Lyari Cheel Chawk: फिल्म धुरंधर तो आप सभी ने देखे होगी. कराची का लयारी इलाका अपनी जीवंत संस्कृति, फुटबॉल के प्रति जुनून और अपने ऐतिहासिक चौकों के विश्वभर में सबसे ज्यादा मशहूर है. इस फिल्म में दिखाए गए एक सीन में सबसे ज्यादा चर्चित स्थान है तो वह ‘चील चौक’. इसके अलावा लयारी के धुरंधर प्रशंसकों और स्थानीय निवासियों के लिए यह केवल एक चौराहा नहीं, बल्कि इलाके की पहचान और गौरव का प्रतीक माना जा रहा है. लेकिन हैरान की बात यह है कि क्या आप जानते हैं कि जिस पक्षी की मूर्ति के नाम पर इसे ‘चील चौक’ कहा जाता है, वह वास्तव में एक बाज़ (Falcon) है. 

‘इब्राहिम चौक’ से ‘चील चौक’ तक का सफर

देखा जाए तो, इतिहास के पन्नों को पलटने पर यह पता चलता है कि इस चौक का आधिकारिक या फिर पुराना नाम इब्राहिम चौक था. तो वहीं, साल 1980 के दशक के बाद, जब यहां एक ऊंचे स्तंभ पर पक्षी की विशाल मूर्ति स्थापित की गई, तो धीरे-धीरे लोग इसे इसके स्वरूप की वजह से  ‘चील चौक’ कहकर बुलाने लगे. तभी से इसका नाम चील चौक पड़ गया. 

क्या है मूर्ति का असली सच: शाहीन या बाज़?

मूर्तिकला और इसके पीछे की सोच के बारे में जानकारी जुटाने पर पता चला कि मूर्ति अल्लामा इकबाल के ‘शाहीन’ (Shaheen) यानी बाज़ से प्रेरित . जह शाहीन को उसकी ऊंची उड़ान, स्वाभिमान और पैनी नज़र की वजह से सबसे ज्यादा जाने लगा. इसके अलावा बलूच संस्कृति में बाज़ (Falcon) का बहुत महत्व भी देखने को मिलता है. 

क्योंकि आम आम बोलचाल की भाषा में लोग बड़े शिकारी पक्षियों के बीच अंतर नहीं कर पाते हैं. इसलिए स्थानीय लोगों ने इसे ‘चील’ (Eagle) कहना शुरू कर दिया है. तो वहीं, दूसरी तरफ समय के साथ यह नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि ‘इब्राहिम चौक’ इतिहास में कहीं दब गया और ‘चील चौक’ लयारी का लैंडमार्क भी बन गया. 

लयारी की पहचान और यह प्रतीक

दरअसल, जानकारी के मुताबिक यह मूर्ति सिर्फ और सिर्फ  ईंट और कंक्रीट का ढांचा नहीं है, बल्कि लयारी के इतिहास में यह चौक कई राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का गवाह भी रह चुकी है. तो वहीं, दूसरी तरफ क्रेन की मदद से रखी गई यह लगभग 100 किलो से ज्यादा वजनी मूर्ति कई बार गोलियों और संघर्षों का शिकार भी हुई, लेकिन आज भी यह मजबूती के साथ खड़ी है, जिससे देखने के लिए दूर-दूर से लाखों लोग आते हैं. 

Darshna Deep

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