करीना कपूर खान और शाहिद कपूर की फिल्म 'जब वी मेट' बॉलीवुड की सबसे पसंदीदा रोमांटिक फिल्मों में से एक है. हालांकि, खबरों के मुताबिक, शुरुआती दौर में कास्टिंग प्रक्रिया काफी अलग थी, जिसमें गीत और आदित्य के किरदारों के लिए अन्य अभिनेताओं पर विचार किया गया था.
करीना कपूर
2007 में रिलीज़ हुई इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘जब वी मेट’ करीना कपूर और शाहिद कपूर दोनों के करियर के लिए एक निर्णायक फ़िल्म साबित हुई. निर्देशक ने शुरू में मुख्य भूमिकाओं के लिए एक अलग जोड़ी पर विचार किया था।
हिंदुस्तान टाइम्स की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इम्तियाज अली ने खुलासा किया कि बॉबी देओल और आयशा टाकिया को शुरू में इन भूमिकाओं के लिए चुना गया था.
बॉबी देओल ने बाद में इस प्रोजेक्ट के शुरुआती दौर के बारे में खुद बताया. इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ‘सोचा ना था’ देखने के बाद उन्होंने इम्तियाज अली से संपर्क किया और उनके साथ काम करने की इच्छा जताई थी. अभिनेता ने बताया कि उन्होंने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में मदद की और गीत के किरदार के लिए करीना कपूर का नाम सुझाया था. हालांकि, खबरों के मुताबिक फिल्म के निर्माण में कई मुश्किलें आईं और आखिरकार बॉबी देओल की जगह शाहिद कपूर को ले लिया गया.
2025 में हुई एक बातचीत में, बॉबी ने इस भूमिका को खोने को अपने पेशेवर जीवन में एक गहरा आघात बताया. उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि यह भूमिका उन्हीं की है, खासकर ऐसे समय में जब उन्हें उद्योग में सार्थक काम ढूंढने में कठिनाई हो रही थी.
एक और कम ज्ञात तथ्य यह है कि करीना कथित तौर पर इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए तुरंत उत्सुक नहीं थीं. इंडिया टुडे ने बताया कि फिल्म जब वी मेट में गीत के रोल के लिए करीना कपूर शुरुआत में काफी हिचकिचा रही थीं.
इम्तियाज़ अली की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही हालात बदल गए और आखिरकार करीना और शाहिद को मुख्य भूमिका में लेकर यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ा. उस समय उनके वास्तविक जीवन के रिश्ते ने फिल्म की विरासत में एक और आयाम जोड़ दिया, खासकर इसलिए क्योंकि ‘जब वी मेट’ उनके अलग होने से पहले उनकी आखिरी फिल्म थी.
फिल्म की कास्टिंग और प्रोडक्शन को लेकर अनिश्चितताओं के बावजूद, ‘जब वी मेट’ करीना के करियर का एक अहम मोड़ साबित हुई. गीत के आत्मविश्वास, सहजता, हास्य और भावनात्मक कोमलता ने उन्हें बॉलीवुड की पारंपरिक नायिका की छवि से परे ले जाने में अहम भूमिका निभाई. इस फिल्म ने शाहिद कपूर को शांत और जटिल भावनात्मक किरदारों को बखूबी निभाने वाले अभिनेता के रूप में स्थापित किया. इन दोनों की जोड़ी को फिल्म रिलीज होने के लगभग दो दशक बाद भी याद किया जाता है.
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