Memories of Nana Patekar: फिल्मी दुनिया में अपनी दमदार अदाकारी से पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर की जिंदगी का एक ऐसा पहलू भी था, जिसे उनके पुराने पड़ोसी आज तक याद करते हैं. मुंबई के माहिम स्थित नव सहयोग सोसायटी में रहने वाले लोगों के लिए नाना सिर्फ बड़े पर्दे के मशहूर अभिनेता नहीं थे, बल्कि उनके अपने मोहल्ले का हिस्सा थे. गणेशोत्सव में फूलों की सजावट में हाथ बंटाना हो या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की मदद करना, पड़ोसियों के मुताबिक, नाना का जुड़ाव हमेशा अपनी जड़ों से बना रहा. 8 अक्टूबर 2026 को पुणे के पास उनके फार्महाउस पर अंतिम संस्कार के बाद अब उनके पुराने मोहल्ले में उनसे जुड़ी यादें और किस्से चर्चा में हैं.
स्टार बनने के बाद भी नहीं बदला व्यवहार
नाना पाटेकर के पड़ोसी चंद्रेश शाह के मुताबिक, वह अभिनेता को करीब 1970 से जानते थे. उन्होंने बताया कि नाना लोगों को हमेशा मिल जुलकर रहने की सलाह देते थे. थिएटर से अपने सफर की शुरुआत करने वाले नाना जब फिल्मी दुनिया में बड़े स्टार बने, तब भी उनके व्यवहार में खास बदलाव नहीं आया. यही वजह है कि माहिम की नव सहयोग सोसायटी के लोग उन्हें सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर नहीं, बल्कि अपने बीच रहने वाले एक सहज इंसान के रूप में याद करते हैं.
गणेशोत्सव में खुद सजावट करते थे नाना पाटेकर
नाना का अपने पुराने घर और मोहल्ले से जुड़ाव गणेशोत्सव के दौरान खास तौर पर दिखाई देता था. पड़ोसियों के मुताबिक, वह त्योहार के समय अपने पुराने घर आते थे और गणपति उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाते थे. इस दौरान वह खुद फूलों की सजावट में भी हिस्सा लेते थे. फिल्मी दुनिया में नाम और शोहरत हासिल करने के बाद भी अपने मोहल्ले के त्योहार में हाथ बंटाने का उनका यह अंदाज लोगों के मन में बस गया. पड़ोसियों के लिए ये यादें उनके सरल स्वभाव और पुरानी जड़ों से जुड़े रहने की कहानी कहती हैं.
‘अंकुश’ के गाने को लेकर भी सुनने को मिलता है एक किस्सा
नाना पाटेकर की फिल्म ‘अंकुश’ से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी इसी सोसायटी में सुनने को मिलता है. सोसायटी के एक निवासी के मुताबिक, फिल्म का लोकप्रिय गीत ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ नाना के इसी घर में रिकॉर्ड किया गया था. हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है. ‘अंकुश’ नाना के करियर की खास फिल्मों में शामिल रही और इससे जुड़ी यादें उनके पुराने पड़ोस में आज भी सुनाई देती हैं.
35 साल तक घर में काम करने वाली महिला को देते थे मां जैसा सम्मान
नाना पाटेकर की दरियादिली से जुड़ी एक और कहानी उनके पुराने मोहल्ले से सामने आती है. शालूबाई ससाने करीब 35 साल तक उनके घर में काम करती थीं. कुछ साल पहले उनका निधन हो गया. उनके बेटे दिलीप ससाने के मुताबिक, नाना उनकी मां को सिर्फ घर में काम करने वाली महिला नहीं मानते थे, बल्कि उन्हें अपनी मां की तरह सम्मान देते थे. दिलीप ने बताया कि उनका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और नाना ने कई मौकों पर उनकी मदद की थी. दिलीप ससाने के मुताबिक, नाना अपने घर के सामने रहने वाले गरीब लोगों के पास जाकर बैठते थे और उनसे बातचीत करते थे. उनके लिए लोगों से जुड़ाव केवल औपचारिक मुलाकात तक सीमित नहीं था. यही वजह थी कि मोहल्ले के लोग उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानते थे. नाना की पहचान फिल्मों में निभाए गए गंभीर और प्रभावशाली किरदारों से जरूर बनी, लेकिन उनके पुराने पड़ोसियों की यादों में उनकी जगह एक ऐसे व्यक्ति की है, जो लोगों के सुख दुख में शामिल होता था.
पुणे चले गए थे, लेकिन माहिम से नहीं टूटा रिश्ता
कुछ साल पहले नाना पाटेकर पुणे स्थित अपने फार्महाउस पर रहने लगे थे. इसके बावजूद माहिम का पुराना घर और वहां के लोगों से उनका रिश्ता बना रहा. पड़ोसियों के मुताबिक, वह समय समय पर अपने पुराने घर आते थे और गणेशोत्सव जैसे मौकों पर लोगों के बीच नजर आते थे. उनका यह जुड़ाव बताता है कि कामयाबी और शोहरत के बावजूद उन्होंने अपने पुराने परिचितों और मोहल्ले को भुलाया नहीं.