कई दशकों तक ओडिया सिनेमा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले छायाकार दिलीप रे का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया है. उनके परिवार ने शनिवार को पीटीआई को बताया कि रे का शुक्रवार रात भुवनेश्वर के एक निजी अस्पताल में संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया. इस खबर से सिनेमा जगत में शोक की लहर छा गई है.
ओडिशा के मुख्यमंत्री ने जताया शोक
ओडिया और बंगाली फिल्म जगत में एक प्रतिष्ठित नाम रहे रे के निधन पर फिल्म जगत और राजनीतिक नेताओं ने समान रूप से श्रद्धांजलि अर्पित की है. उनके परिवार में उनकी पत्नी और तीन बेटियां हैं. ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी ने उनके निधन को राज्य के कलात्मक और सांस्कृतिक परिदृश्य के लिए अपूरणीय क्षति बताया और कहा कि ओडिया फिल्म उद्योग को समृद्ध बनाने में रे के योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा.
कौन थे दिलीप रे?
27 जुलाई, 1954 को कटक में जन्मे दिलीप रे ने फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआई), बेंगलुरु से छायांकन का प्रशिक्षण प्राप्त किया और फिर कई दशकों तक चलने वाले अपने करियर की शुरुआत की. अपनी तकनीकी कुशलता और दृश्यात्मक कहानी कहने की कला के लिए जाने जाने वाले दिलीप रे क्षेत्रीय सिनेमा के सबसे सम्मानित छायांककों में से एक बन गए.
अपने करियर के दौरान, रे ने 80 से अधिक ओडिया फीचर फिल्मों, लगभग 15 बंगाली फिल्मों और कई छत्तीसगढ़ी फिल्मों में काम किया. उनके कार्यों में वृत्तचित्र और टेलीविजन धारावाहिक भी शामिल थे, जो विभिन्न प्रारूपों में उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाते हैं.
इन पुरस्कारों से किए गए सम्मानित
दिलीप रे को सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी के लिए पांच बार ओडिशा राज्य फिल्म पुरस्कार मिला, जिससे उद्योग के बेहतरीन दृश्य कलाकारों में से एक के रूप में उनकी प्रतिष्ठा मजबूत हुई. उनकी कुछ सर्वाधिक पहचानी जाने वाली उड़िया फिल्मों में तिसंध्या, बाजे बैंसी नाचे घुंगुरा, चाका भौंरी, ई ता दुनिया, ममता रा डोरा, माझी पहाचा और बिधिरा बिधाना शामिल हैं.