Wisdom Tooth Myth vs Reality: अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि 'अक्ल दाढ़ आ रही है, मतलब अब इंसान में समझदारी आएगी'. हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है, इसे लेकर डेंटल एक्सपर्ट ने कुछ चीजें रिवील की हैं. उन्होंने बताया कि ये अक्ल दाढ़ क्यों आती है? क्या इसे निकालना सही है? और अक्ल दाढ़ यानी Wisdom Tooth का अक्ल से क्या कोई कनेक्शन है? जानें-
अक्ल डाढ़ और अक्ल आने के बीच क्या कनेक्शन है? क्या इसे निकालवाना सच में समझदारी है?
Wisdom Tooth Myth vs Reality: आज के आधुनिक दौर में भी कई लोग छोटी-छोटी घटनाओं के पीछे पुरानी कहावतों के लॉजिक लगाते हैं, हालांकि ये लॉजिक कितना फिट बैठते हैं, इस बारे में साइंस ने एक फैक्ट रिवील किया है. जैसे- अक्सर अक्ल दाढ़ आने पर लोगों को कहते सुना होगा कि ‘अब आई अक्ल..या अब समझदारी आएगी’, लेकिन आपको बता दें कि अक्ल दाढ़ का अक्ल आने या समझदार होने से कोई कनेक्शन नहीं है. और इस दांत को निकलवाने से अक्ल भी कम नहीं होती. हालांकि अक्ल दाढ़ से जुड़े कुछ बातें ऐसी हैं, जो आपको पता होनी चाहिए-
हर इंसान के मुंह में अधिकतम 32 दांत होते हैं, जिसमें से 28 दांत टीनेज तक मसूढ़ों में अच्छे से फिट हो जाते हैं. कुछ लोगों को 17 साल से 21 साल के बीच 4 दांत एक्स्ट्रा आते हैं, जिसे आम भाषा में अक्ल दाढ़ कहा जाता है, जबकि मेडिकल साइंस में इसे विसडम टीथ या मोलर दांत कहते हैं. ये दांत मसूढ़ों के लास्ट वाले दाढ़-दांत के पीछे आते हैं. इनके निकलने की प्रोसेस काफी धीमी और पेनफुल होती है.
डेटल हेल्थ पर ऐसी कई रिसर्च सामने आई हैं जिसमें अक्ल दाढ़ के विकसित होने के कारण और प्रोसेस को समझाया गया है. हालांकि ज्यादातर रिसर्च का एक ही मत है कि जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो जबड़ों में 32 दातों की जगह बन जाती है, जिसमें से 20 दांत बचपन में ही विकसित हो जाते हैं और बाकी के दांत 25 साल तक बड़े हो जाते हैं, लेकिन कुछ लोगों में 25 से 53 साल के बीच विसडम टूथ निकलते हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के विशेषज्ञों ने द कन्वर्सेशन में छपे एक आर्टिकल में बताया कि आज से कुछ लाख साल पहले इंसान के पूर्वजों का जबड़ा काफी लंबा होता था, जिसके कारण दांत भी बड़े होते थे. उस समय भी अक्ल दाढ़ निकलती थी, लेकिन बड़े जबड़ों में बिना किसी दिक्कत के आसानी से समा जाती है. रिसर्च ने रिवील किया है कि लोगों के चबाने की क्षमता इतनी गजब होती की वो पेड़-पौधों से लेकर कच्चा मांस आसानी से चाब जाते थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बदलता गया, इंसान के मस्तिष्क की संरचना में भी बदलाव आए. ऐसे में खोपड़ी का साइज बढ़ता गया और मसूढ़े सिमटते चले गए.
इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि हर व्यक्ति में अक्ल दाढ़ या मोलर दांत नहीं आता. इसके मसूढ़ों में विकसित होने की प्रोसेस माता-पिता से मिले जीन्स पर निर्भर करती है. हालांकि एक्टपर्ट्स ने क्यीलर किया है कि आधुनिक दौर में अक्ल दाढ़ का न निकलना ही फायदेमंद हैं, क्योंकि छोटे मसूढ़े में कम ही दांत फिट हो सकते हैं. यही वजह है कि जब अक्ल दाढ़ निकलती है तो छोटे मसूढ़ों में जगह नहीं होती, इसलिए टेढ़ी हो जाती है और जबड़े के अंदर फंसी रहती है. इसलिए दांतों में दर्द भी होता है,
अक्ल निकलवाने या न निकलवाने के पीछे अलग-अलग विचार रहते हैं. हालांकि ज्यादातर डेंटल एक्सपर्ट का मत है कि इसे नहीं निकलवाना चाहिए, क्योंकि इससे जबड़े खाली हो जाते हैं, जिससे मसूढ़ों में इंफेक्शन का खतरा बना रहता है, लेकिन अक्ल दाढ़ के निकलने का प्रोसेस इतना पेनफुल होता है कि ज्यादातर लोग इसे 40 सल तक निकलवा ही देते हैं. अक्ल दाढ़ निकलते समय नसों में दर्द और मसूढ़ों पर दबाव पड़ता है, जिससे सूजन और रेडनेस पैदा होती है. कई बार ये सिर दर्द और चेहरे पर सूजन भी पैदा कर सकता है.
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