Ajit Pawar Baramati: महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजित पवार का आज बारामती में एक विमान हादसे में निधन हो गया. जहां उनका पूरा राजनीतिक करियर फला-फूला. आज वहीं उनका निधन हो गया.
ajit pawar baramati
Ajit Pawar Baramati: बारामती पवार परिवार का गढ़ रहा है. जहां चाचा शरद पवार के बड़े प्रभाव में अजित पवार के उदय को भी आकार मिली, वही शहर था जहां बुधवार को एक विमान दुर्घटना में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री ने अंतिम सांस ली. विडंबना साफ थी: जिस निर्वाचन क्षेत्र ने अजीत पवार को एक राजनीतिक ताकत बनाया, वही उनकी जिंदगी का आखिरी पड़ाव भी बन गया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अजित पवार के असामयिक निधन पर शोक व्यक्त किया.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दशकों से बारामती पवार नाम का पर्याय रहा है. 1967 से यह सीट परिवार का गढ़ बनी रही – पहले शरद पवार के तहत और 1991 से अजित पवार के तहत, जिन्होंने शुरू में कांग्रेस के टिकट पर चुनावी राजनीति में प्रवेश किया और 1999 में पार्टी बनने के बाद एनसीपी में चले गए.
निर्वाचन क्षेत्र में अजित पवार का जमीनी स्तर का काम उनकी लोकप्रियता की आधारशिला बन गया, जिससे उन्हें वर्षों से एक वफादार समर्थन आधार बनाने में मदद मिली. उस वफादारी की परीक्षा नवंबर 2024 में हुई और निर्णायक रूप से इसकी पुष्टि हुई. बारामती के गौरवशाली राजनीतिक इतिहास में पहली बार शरद पवार का शब्द अंतिम नहीं रहा. मतदाताओं ने अजीत पवार को उनके पोते युगेंद्र पवार एनसीपी (एसपी) उम्मीदवार पर 1,00,899 वोटों के भारी अंतर से जीत दिलाई.
इस फैसले ने 2023 के एनसीपी विभाजन के बीच बारामती की लड़ाई को प्रभावी ढंग से सुलझा दिया, जिसमें अजित पवार एक गुट का नेतृत्व कर रहे थे और शरद पवार दूसरे गुट का नेतृत्व कर रहे थे. अभियान बहुत व्यक्तिगत था. शरद पवार के खेमे ने इसे बुढ़ापे में विश्वासघात बताया, जबकि अजित पवार के पक्ष ने परिवार से अलगाव की कहानियों से जवाब दिया. जीत के बाद अजित पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार ने बारामती के मतदाताओं को उनके साथ खड़े रहने के लिए श्रेय दिया.
उन्होंने कहा कि बारामती के लोगों ने दिखाया है कि वे दादा का सच्चा परिवार हैं. यह पहली बार नहीं था जब बारामती में पारिवारिक वफादारी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं टकराईं.
2024 के लोकसभा चुनाव में पवार परिवार आमने-सामने था. जब अजित पवार ने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को शरद पवार की बेटी और अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ मैदान में उतारा था. हालांकि इस चुनाव में सुप्रिया सुले को शानदार जीत मिली. जिसके बाद अजित पवार ने कहा कि वह अब बारामती से चुनाव नहीं लड़ेंगे. लेकिन फिर भी उन्होंने मैदान में लौटने का फैसला किया. जिसके बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में जीत मिली. लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद भी विधानसभा चुनाव में अजित पवार ने शानदार जीत दर्ज की. यह जीत उनके समर्थकों ने उस विकास कार्य को दी, जो उन्होंने लगभग चार दशकों में अपने निर्वाचन क्षेत्र में किया था.
अहमदनगर जिले के राहुरी तालुका के देवलाली प्रवरा में 22 जुलाई, 1959 को अजित पवार का जन्म हुआ था. अजित पवार लोगों के साथ अथक जुड़ाव और महाराष्ट्र की जमीन से जुड़े रहने की अपनी क्षमता के कारण ‘अजीत दादा’ के नाम से जाने गए. चुनावी राजनीति से परे उन्होंने सहकारी संस्थानों जिसमें दूध संघ, चीनी मिलें और बैंक शामिल हैं, के प्रबंधन में अहम भूमिका निभाई. ये ऐसे क्षेत्र थे जिन्होंने राज्य में ग्रामीण राजनीतिक शक्ति को आकार दिया.
उनकी औपचारिक नेतृत्व यात्रा में 1991 में एक निर्णायक मोड़ आया, जब वह बारामती से लोकसभा के लिए चुने गए, यह सीट उन्होंने बाद में अपने चाचा शरद पवार के लिए खाली कर दी. अजीत पवार बारामती से सात बार महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए. पहली बार 1991 के उपचुनाव में और बाद में 1995, 1999, 2004, 2009 और 2014 में और उन्होंने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, जिसमें महत्वपूर्ण विभागों के राज्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री शामिल हैं.
अजित पवार ने 2024 के विधानसभा चुनाव में अपने चाचा शरद पवार के उम्मीदवार और अपने ही भतीजे योगेन्द्र पवार को एक लाख से ज्यादा वोटों से हराया और खुद को बारामती निर्वाचन क्षेत्र में प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया. बुधवार को जिस शहर ने उनके उदय को आकार दिया, वह उनकी मृत्यु का भी गवाह बना. बारामती, जहां अजीत पवार राजनीतिक रूप से बड़े हुए और अपनी पहचान बनाई, वही जगह बनी जहां उनकी यात्रा पूरी हुई. उसी जगह पर एक मार्मिक अंत जिसने राजनीति में उनके जीवन को परिभाषित किया.
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