Kasab age dispute: 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मुकदमे में अभियोजन पक्ष के सामने गवाह, घटनास्थल के सबूत और खुद अजमल कसाब के बयान मौजूद थे. लेकिन केस की सुनवाई के दौरान एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उम्र से जुड़ी एक अलग कानूनी लड़ाई खड़ी कर दी. कसाब के बचाव पक्ष ने दावा किया कि हमले के समय उसकी उम्र 18 साल से कम थी. अदालत में उसे नाबालिग साबित करने की कोशिश हुई और इसी दौरान कसाब की ओर से 17 साल की उम्र का दावा सामने आया. इस दावे को खारिज करने के लिए सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने मेडिकल जांच और पुराने आधिकारिक रिकॉर्ड का सहारा लिया.
नाबालिग साबित हो जाता तो बदल सकता था मुकदमे का रास्ता
अप्रैल 2009 में मुकदमा शुरू होने के बाद बचाव पक्ष ने कसाब की उम्र को लेकर सवाल उठाया. उसका पक्ष था कि 26/11 हमलों के समय वह नाबालिग था. अगर अदालत उसे कानूनी तौर पर नाबालिग मान लेती तो मामला सामान्य आपराधिक मुकदमे की बजाय किशोर न्याय व्यवस्था के तहत जा सकता था और मौत की सजा का सवाल भी नहीं उठता. यही वजह थी कि उम्र का मुद्दा मुकदमे में बेहद अहम बन गया. उज्ज्वल निकम ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि उम्र कम बताना मुकदमे को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है. लेकिन इस आरोप को सिर्फ बहस के जरिए साबित नहीं किया जा सकता था, इसलिए उम्र की वैज्ञानिक जांच का रास्ता अपनाया गया.
चार डॉक्टरों की टीम ने किया बोन और दांतों का टेस्ट
अदालत के निर्देश के बाद मुंबई के सर जेजे अस्पताल में मेडिकल बोर्ड ने कसाब की उम्र का आकलन किया. उसकी हड्डियों के जुड़ने यानी ossification और दांतों की स्थिति की जांच की गई. मेडिकल रिपोर्ट में जोड़ों के जुड़ने और अक्ल की दाढ़ निकलने जैसे संकेतों का अध्ययन किया गया. मेडिकल बोर्ड ने कसाब की उम्र को लगभग 20 से 26 साल के बीच आंका. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक इस आकलन का मतलब था कि 26 नवंबर 2008 को मुंबई हमले के वक्त उसकी उम्र कम से कम करीब 19 साल 6 महीने थी. यानी अदालत में सामने रखा गया 17 साल का दावा मेडिकल जांच के आधार पर टिक नहीं पाया.
सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट नहीं, पुराने रिकॉर्ड भी बने अहम सबूत
उम्र के दावे को चुनौती देने के लिए अभियोजन पक्ष ने कसाब के गिरफ्तारी के बाद के रिकॉर्ड भी अदालत के सामने रखे. आर्थर रोड सेंट्रल जेल की तत्कालीन अधीक्षक स्वाति साठे ने गवाही दी कि जेल में दाखिले के समय कसाब ने अपनी उम्र 21 साल बताई थी. उनके पास इसका रिकॉर्ड भी था. इसके बाद नायर अस्पताल का रिकॉर्ड सामने आया. 27 नवंबर 2008 को इलाज के दौरान डॉक्टर राघवन ने अदालत में बताया कि कसाब ने वहां भी अपनी उम्र 21 साल बताई थी. इस तरह मेडिकल जांच के अलावा दो अलग अलग आधिकारिक रिकॉर्ड भी अभियोजन पक्ष के दावे को मजबूती दे रहे थे.
मजिस्ट्रेट के सामने भी 21 साल बताई थी उम्र
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. अभियोजन पक्ष ने कसाब के न्यायिक इकबालिया बयान का भी सहारा लिया, जो मजिस्ट्रेट के सामने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज हुआ था. रिपोर्टों के मुताबिक, उस बयान में भी कसाब ने खुद को 21 साल का बताया था. यानी अदालत के सामने एक तरफ 17 साल होने का दावा था, तो दूसरी तरफ गिरफ्तारी के बाद के उसके अपने बयान, जेल रिकॉर्ड, अस्पताल रिकॉर्ड और मेडिकल जांच जैसे अलग अलग स्रोत मौजूद थे. यही वह बिंदु था, जहां उम्र से जुड़ा बचाव पक्ष का दावा कमजोर पड़ने लगा.
पाकिस्तान से जन्म प्रमाण पत्र मंगाने की कोशिश भी हुई
जब मेडिकल रिपोर्ट और भारतीय आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आने लगे तो बचाव पक्ष ने पाकिस्तान के फरीदकोट गांव से जन्म प्रमाण पत्र या स्थानीय निकाय के रिकॉर्ड हासिल करने की कोशिश की. इसके लिए अदालत से रोगेटरी लेटर या आयोग भेजने की मांग की गई थी. अभियोजन पक्ष ने इस मांग का विरोध किया. बाद में विशेष न्यायाधीश एमएल तहिलियानी ने बचाव पक्ष की मांग खारिज कर दी. अदालत ने उपलब्ध मेडिकल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर कसाब को वयस्क माना. उस समय की रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने उसे कम से कम 21 वर्ष का माना था.
उज्ज्वल निकम का तरीका था बदले बयान नहीं, पक्के सबूत
कसाब की उम्र को लेकर चली इस पूरी लड़ाई में सबसे अहम बात यह थी कि अभियोजन पक्ष ने किसी एक बयान पर निर्भर रहने के बजाय कई तरह के सबूत एक साथ रखे. मेडिकल जांच, जेल रिकॉर्ड, अस्पताल के दस्तावेज और कसाब के खुद के पुराने बयान एक ही दिशा में जा रहे थे. यही वह कानूनी रणनीति थी, जिसने उम्र के दावे को कमजोर किया. अदालत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं रहा कि कसाब क्या कह रहा है, बल्कि यह भी था कि उसके शरीर और उसके पुराने आधिकारिक रिकॉर्ड क्या बता रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने भी मेडिकल जांच के आधार को माना
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी कसाब की उम्र को लेकर निचली अदालत के निष्कर्ष को बरकरार रखा. 2012 के फैसले में अदालत ने उम्र तय करने के लिए की गई मेडिकल जांच पर भरोसे को स्वीकार किया और कसाब को वयस्क माना. सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मौत की सजा भी बरकरार रखी. इस तरह अदालत में सामने आया ‘मैं 17 साल का हूं’ वाला दावा अंतिम रूप से स्वीकार नहीं हुआ. उम्र को लेकर हुई यह कानूनी लड़ाई 26/11 मुकदमे के उन पहलुओं में से एक बन गई, जिसमें मेडिकल विज्ञान और आधिकारिक रिकॉर्ड ने अदालत के सामने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
अब इसी कानूनी लड़ाई पर बनी है ‘प्रहार’
अब इसी घटनाक्रम को फिल्म प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम में बड़े पर्दे पर पेश किया जा रहा है. फिल्म का ट्रेलर कोर्टरूम की इसी लड़ाई को सामने लाता है, जहां कसाब की ओर से उम्र को लेकर दावा और उसके जवाब में सबूतों की लड़ाई दिखाई गई है. राजकुमार राव उज्ज्वल निकम की भूमिका में हैं और अविनाश अरुण ने फिल्म का निर्देशन किया है. फिल्म 16 अक्टूबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी. यानी 26/11 की कहानी को सिर्फ हमले और आतंकियों के सफाए तक सीमित रखने के बजाय यह फिल्म उस अदालत के भीतर की लड़ाई पर फोकस कर रही है, जहां एक आरोपी के बयान से ज्यादा महत्व उन सबूतों का था जिन्हें जांच और कानून की कसौटी पर परखा गया.