Adhir Ranjan Chowdhury: किताबें छोड़ क्यों उठाई बंदूक? जेल की सलाखों के पीछे से कैसे जीता चुनाव? जानिए बंगाल की राजनीति बदलने वाले अधीर रंजन चौधरी के जीवन की वो हैरान करने वाली दास्तान...
Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. इसी बीच मुर्शिदाबाद में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने TMC प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधा है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, ‘जब तक ममता बनर्जी भारत में मौजूद हैं. मैं BJP के साथ हाथ नहीं मिला सकता क्योंकि ममता बनर्जी ही थीं जो सबसे पहले BJP को बंगाल में लेकर आईं. उन्होंने BJP सरकार में मंत्री के तौर पर भी काम किया है. जब तक ममता बनर्जी आस-पास हैं, BJP को बंगाल में अधीर रंजन चौधरी की कोई जरूरत नहीं होगी क्योंकि ममता बनर्जी पहले से ही उनके पाले में हैं. वे दोनों मिलकर लड़ते हैं.’
अधीर रंजन चौधरी तीन दशकों के अंतराल के बाद आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए राज्य की राजनीति में लौटे हैं. पांच बार के सांसद और लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के पूर्व नेता प्रतिपक्ष, अधीर रंजन चौधरी अपनी गृह सीट बहरामपुर से पार्टी के उम्मीदवार हैं. आइए एक नजर डालते हैं कि अधीर रंजन चौधरी कौन हैं और यह हस्ती बंगाल में इतनी लोकप्रिय क्यों है. राजनीति में उनका प्रवेश कैसा रहा है और उन्होंने क्या भूमिका निभाई है?
अधीर रंजन चौधरी अपने मतदाताओं के विचारों को मुखरता से रखने के लिए साथ ही अपने क्षेत्र के लोगों के साथ सामुदायिक संबंध बनाने और भविष्य के नेताओं को तैयार करने के लिए जाने जाते हैं. सभी स्तरों पर जनसेवा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप उन्हें संसद में कांग्रेस पार्टी के सबसे प्रमुख प्रतिनिधियों में से एक के रूप में पहचाना जाता है. अपने पूरे करियर के दौरान उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है जिसमें लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता और पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष का पद शामिल है.
अधीर रंजन चौधरी का जन्म 2 अप्रैल, 1956 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बहरामपुर में हुआ था. उनका पालन-पोषण एक बंगाली परिवार में हुआ और उन्होंने इसी समुदाय के भीतर अपने राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाया. अधीर रंजन के पिता निरंजन चौधरी भी अपने समुदाय में एक सम्मानित व्यक्ति थे. हालांकि अधीर रंजन के पास केवल स्नातक की डिग्री है फिर भी उन्हें व्यापक रूप से एक ज़मीनी नेता और समर्पित जनसेवक के रूप में माना जाता है.
चौधरी नक्सलवादी आंदोलन से जुड़ गए थे जो 1970 के दशक में पूर्वी भारत के कई इलाकों में उभरा था. हालाँकि बाद में उनका झुकाव मुख्यधारा की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की ओर हो गया जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी कर रहे थे. उनका पहला बड़ा चुनावी मुकाबला 1991 में हुआ जब उन्होंने नबग्राम विधानसभा क्षेत्र से पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ा. उस चुनाव में, अधीर रंजन चौधरी को कड़े राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के समर्थकों ने उनका पीछा किया और मतदान प्रक्रिया के दौरान उन्हें एक अन्य उम्मीदवार द्वारा कुछ समय के लिए बंधक भी बना लिया गया था. आखिरकार चौधरी 1,401 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए.
चार साल बाद 1996 के चुनावों में चौधरी ने नबग्राम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और निर्णायक जीत हासिल की. उन्हें 76,852 वोट मिले और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को लगभग 20,329 वोटों के अंतर से हराया. यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में चौधरी के लगातार बढ़ते कद की शुरुआत थी. अधीर रंजन चौधरी ने 1999 में राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा, जब उन्होंने बहरामपुर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) के मौजूदा सांसद प्रोमोथेश मुखर्जी को 95,391 वोटों के अंतर से हराया. उस चुनाव के बाद चौधरी पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बन गए. समय के साथ चौधरी ने विभिन्न संसदीय समितियों में काम किया है जिनमें सूचना प्रौद्योगिकी समिति, रेलवे कन्वेंशन समिति और विदेश मंत्रालय की सलाहकार समिति शामिल हैं.
फिर भी अधीर रंजन चौधरी की संगठनात्मक क्षमता, साहस और CPM के खिलाफ उनके जुझारू रवैये ने स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता को रातों-रात आसमान पर पहुँचा दिया. 1996 के विधानसभा चुनावों में CPM के एक नेता के रिश्तेदार की हत्या के आरोप में जेल में बंद होने के बावजूद चौधरी ने नबग्राम विधानसभा सीट जीत ली. उस दौरान, अधीर के भाषण जेल के अंदर रिकॉर्ड किए जाते थे और पार्टी की रैलियों में बजाए जाते थे. दिलचस्प बात यह है कि उस समय ममता बनर्जी ने अधीर की उम्मीदवारी का ज़ोरदार विरोध किया था. इन दोनों नेताओं के बीच की कड़वी दुश्मनी आज भी जस की तस बनी हुई है.
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