Best milk for children: मां का दूध ही शिशु के लिए सर्वोत्तम पोषण है. यह जन्म से 6 महीने तक शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है. लेकिन, चिंता की बात तब बन जाती है जब किसी मां के पास बच्चे के लिए पर्याप्त दूध नहीं होता है. ऐसे में वे कौन सा दूध पिलाएं. इसी को लेकर WHO की डॉक्टर ने सुझाव दिए हैं.
जानिए, अगर किसी मां के पास पर्याप्त दूध न हो तो उसे बच्चे को कौन सा मिल्क देना चाहिए. (Canva)
Best milk for children: इस बात में कोई दोराय नहीं कि, मां का दूध ही शिशु के लिए सर्वोत्तम पोषण है. यह जन्म से 6 महीने तक शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है. बच्चों में यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर इन्फेक्शन (दस्त, निमोनिया), एलर्जी और मोटापे से बचाता है. दरअसल यह पचाने में आसान है और मस्तिष्क के विकास में अहम भूमिका निभाता है. लेकिन, चिंता की बात तब बन जाती है जब किसी मां के पास बच्चे के लिए पर्याप्त दूध नहीं होता है. ऐसे लोग बच्चे की सेहत के प्रति फिकरमंद हो जाते हैं. फिर लोग बिना कुछ सोचे कुछ लोग दूधवाले से दूध लेकर पिलाना शुरू कर देते हैं, तो कुछ पैकेटबंद दूध पिलाते हैं. वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पाउडर वाला दूध पिलाना शुरू कर देते हैं. लेकिन, अगर आप ऐसा करते हैं तो यकीन मानिए कि आप बड़ी गलती कर रहे हैं. इससे बच्चे में कई परेशानियों का जोखिम बढ़ सकता है.
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही नेस्ले ने दुनिया भर में अपने कुछ बेबी फ़ॉर्मूला (शिशु दूध) उत्पादों को वापस ले लिया है. इनमें एक संभावित टॉक्सिन के होने की आशंका बताई गई, जो फ़ूड पॉइजनिंग का कारण बन सकती है. बता दें कि, इनमें सेरुलिड नाम का टॉक्सिन हो सकता है, जिससे उल्टी या जी मिचलाने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. ये प्रोडक्ट फ़्रांस, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ़्रीका समेत कई देशों में सावधानी बरतते हुए वापस ले लिया गया है. इस संबंध में नेस्ले के सीईओ फ़िलिप नाव्राटिल ने एक वीडियो जारी कर माफ़ी भी मांगी.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) 6 महीने तक के शिशु को सिर्फ़ और सिर्फ़ मां का दूध ही पिलाने की सिफ़ारिश करता है. WHO की पूर्व चीफ़ साइंटिस्ट और एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की चेयरपर्सन, डॉ. सौम्या स्वामीनाथन कहती हैं, “नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में जिन बच्चों को ट्यूब से दूध देना पड़ता है, उन्हें डॉक्टर फ़ॉर्मूला मिल्क दे सकते हैं. लेकिन, अब कई सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में ह्यूमन मिल्क बैंक शुरू हो गए हैं.” डॉक्टर बताती हैं कि कई स्वस्थ मांएं अतिरिक्त दूध मिल्क बैंक में देती हैं, जिससे एनआईसीयू के बच्चों को फ़ॉर्मूला की जगह मां का दूध मिलता है. जिन अस्पतालों ने ऐसा मिल्क बैंक शुरू किया है, उनके अनुसार ब्रेस्ट मिल्क पीने वाले एनआईसीयू बच्चों का अस्पताल में रहना करीब एक हफ़्ते कम हो जाता है.
बीबीसी की रिपोर्ट में दिल्ली स्थित पीडियाट्रिशियन और चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर दिनेश मित्तल बताते हैं कि, अगर बच्चे को इन्फ़ेक्शन होता है, तो मां का शरीर अपने आप ऐसी एंटीबॉडी बनाता है, जो दूध के ज़रिए बच्चे तक पहुंचती है. जबकि, फ़ॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों में कब्ज़ की समस्या ज्यादा देखी जाती हैं. ऐसे बच्चों का वजन भी जल्दी बढ़ता है, जिससे आगे चलकर मोटापे का खतरा बढ़ सकता है. वहीं, यूनिसेफ़ के अनुसार, जिस शिशु को पहले 6 महीने तक सिर्फ़ और सिर्फ़ मां का दूध (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफ़ीडिंग) नहीं पिलाया जाता, उन्हें दस्त या निमोनिया से मरने का ख़तरा काफ़ी ज्यादा होता है. इसके अलावा, स्तनपान शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को मजबूत करता है और ज़िंदगी में मोटापा और डायबिटीज़ जैसी लंबी बीमारियों से बचाव कर सकता है.
कई बार ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं जब मां अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करा पाती हैं. इस बारे में नई दिल्ली के सीताराम भारतिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड रिसर्च के शिशु रोग विभाग के प्रमुख और डिप्टी मेडिकल डायरेक्टर डॉक्टर जितेंद्र नागपाल बताते हैं, “फ़ॉर्मूला मिल्क आमतौर पर तीन स्थितियों में दिया जाता है. पहला, तब जब मां का दूध बच्चे की पूरी ज़रूरत के अनुसार पर्याप्त न हो. दूसरी स्थिति में जब माता-पिता दोनों कामकाजी हों और उनके पास पर्याप्त समय न हो तो वे अपनी सुविधा के अनुसार फ़ॉर्मूला मिल्क देते हैं. तीसरी स्थिति में डॉक्टर खुद सलाह देते हैं, लेकिन ऐसा कम मामलों में होता है.”
डॉक्टर नागपाल कहते हैं कि ब्रेस्ट मिल्क को ‘लिक्विड गोल्ड’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें कई ऐसे तत्व होते हैं जो हम चाहकर भी फ़ॉर्मूला मिल्क में नहीं डाल सकते हैं. जैसे- डिफेंस सेल्स (रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं) जो बच्चे के पोषण और विकास पर गहरा असर डालते हैं. लेकिन वह दावा करते हैं कि गाय और भैंस के दूध की तुलना में फ़ॉर्मूला मिल्क थोड़ा बेहतर नज़र आता है. दरअसल, फ़ॉर्मूला मिल्क में ऐसे कई माइक्रोन्यूट्रिएंट्स होते हैं जो बच्चों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर डाले जाते हैं.
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