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मेरे पीरिड्स आ गए, तुम्हारे भी… क्या साथ रहने वाली लड़कियों की माहवारी मैच होती है? साइंस से समझें

Menstrual cycle synchrony: हॉस्टल, पीजी, फ्लैट या कॉलेज में एक साथ रहने वाली लड़कियों से अक्सर सुनने में आता है कि, 'मेरे पीरियड्स आ गए हैं तो अब तुम्हारे भी आने वाले होंगे'. ऐसे में सवाल है कि, आखिर क्या सच में साथ रहने वाली लड़कियों के पीरियड्स सिंक हो जाते हैं? पीरियड्स सिंक के पीछे की साइंस क्या है? जानिए इसके पीछे की वजह-

Menstrual cycle synchrony: हर महिला को समय पर पीरियड्स आना उनके अच्छे स्वास्थ्य का संकेत है. दरअसल, पीरियड्स महिलाओं के शरीर की एक नेचुरल बॉडी क्लीनिंग प्रोसेस है जो लगभग हर 28-30 दिन में आती है. हालांकि, हर महिला की पीरियड्स डेट अलग-अलग होती है. लेकिन, कहा जाता है कि, अगर लड़कियां हॉस्टल, पीजी, फ्लैट, कॉलेज डोरमेट्री या परिवार में एक साथ रहती हैं तो उनके पीरियड्स आपस में सिक्रनाइज हो जाते हैं. यानी उनकी माहवारी मैच हो जाती है. ऐसे में साथ रहने वाली महिलाओं के बीच एक बात बड़ी फेमस है, ‘मेरे पीरियड्स आ गए हैं तो अब तुम्हारे भी आने वाले होंगे’. ऐसे में सवाल है कि, आखिर क्या सच में साथ रहने वाली लड़कियों के पीरियड्स सिंक हो जाते हैं? पीरियड्स सिंक के पीछे की साइंस क्या है? क्यों होता है ऐसा? मॉडर्न रिसर्च और डॉक्टर इस बारे में क्या कहते हैं? जानिए इसके पीछे की वजह-

पीरियड्स सिंक का साइंस

साथ रहने वाली सहेलियों के पीरियड्स सिंक होना बेशक आपको यह सामान्य लगे, लेकिन साइंस की भाषा में इसे मैक्क्लिंटॉक प्रभाव (McClintock Effect) या मेंस्ट्रुअल सिंक्रोनी कहा जाता है. दरअसल, सालों से यह माना जाता रहा है कि साथ रहने वाली महिलाओं के शरीर से निकलने वाले फेरोमोन्स (एक प्रकार का केमिकल) एक-दूसरे के पीरियड साइकल को प्रभावित करते हैं. 

क्या है मैक्क्लिंटॉक प्रभाव?

क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट के मुताबिक, पीरियड्स एक के साथ होने की थ्योरी सबसे पहले 1971 में मनोवैज्ञानिक मार्था मैक्क्लिंटॉक ने दी थी. 1971 में मार्था ने कॉलेज की 135 स्टूडेंट्स पर स्टडी की थी और दावा किया था कि जो लड़कियां रूममेट या करीबी फ्रेंड्स थीं, समय के साथ उनके पीरियड्स की डेट एक‑दूसरे के करीब आने लगी थी. यानी कि जो महिलाएं करीब रहती हैं, उनके ओव्यूलेशन का समय धीरे-धीरे एक समान होने लगता है. उनके मुताबिक, पसीने के जरिए निकलने वाले फेरोमोन्स हवा के जरिए दूसरी महिला के हार्मोनल सिस्टम को ट्रिगर करते हैं जिससे ओव्यूलेशन और पीरियड की टाइमिंग बदलकर ‘सिंक’ होने लगती है.

पीरियड सिंक पर क्या कहती डॉक्टर?

एम्स रायबरेली की सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. ज्योत्सना देवी कहती हैं, ‘हॉस्टल, पीजी या घर में साथ रहने वाली हर लड़की या महिला के पीरियड्स साइकिल एक ही हों, यह पूरी तरह सच नहीं है. हां, कुछेक में ऐसा होना भी संभव है. दरअसल, हर महिला के पीरियड साइकिल का समय अलग होता है. इसलिए समय के साथ डेट्स मैच होना या उनका ओवरलैप होना स्वाभाविक है. हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बॉडी या पीरियड्स एक-दूसरे के साथ ‘सिंक’ हो रहे हैं.

क्या कहती है रिसर्च

मैक्लिंटॉक के बाद कई रिसर्चर्स ने इस स्टडी को दोहराने की कोशिश की तो मिले-जुले नतीजे सामने आए. कई स्टडी में मैक्लिंटॉक इफेक्ट को सपोर्ट किया तो कुछ ने इसे सिर्फ संयोग बताया. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और पीरियड ट्रैकिंग ऐप क्लू ने मिलकर करीब  360 गर्ल्स या महिलाएं (जो साथ रहते थीं) के डेटा का एनालिसिस किया गया. पाया गया कि अधिकांश महिलाओं के पीरियड्स साथ में आने की बजाय, उनके पीरियड्स साइकल में और गैप आता गया. रिसर्चर्स का कहना है कि पीरियड सिंकिंग का कोई पुख्ता वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है. 

चीनी कॉलेज की छात्राओं पर भी स्टडी

2006 के दौरान झेंगवेई यांग और जेफरी शैंक ने 186 चीनी कॉलेज छात्राओं पर एक साल से अधिक समय तक स्टडी की. इन छात्राओं को 4 से 8 के ग्रुप में डोरमेट्री में रखा गया. रिसर्चर्स ने पाया कि इन महिलाओं के पीरियड्स की तारीख सिंकनाइज नहीं हुईं. इसकी जगह पीरियड्स की शुरुआत में अंतर संयोग के आधार पर ही देखा गया. इस स्टडी में सामने आया कि पीरियड्स में डिफरेंस, लंबाई की वजह से पीरियड्स ओवरलैप हो सकते हैं, लेकिन यह फेरोमोन्स या सामाजिक निकटता का नतीजा नहीं है. 

लाइफस्टाइल है असली कारण

डॉ. ज्योत्सना कहती हैं कि, पीरियड डेट्स एक-दूसरे के करीब आने के पीछे का कारण फेरोमोन्स नहीं लाइफस्टाइल से जुड़ी चीजें अधिक जिम्मेदार हो सकती है. एक साथ या पास रहने वाली महिलाएं अक्सर समान स्ट्रेस को महसूस करती हैं. उनके खान-पान की आदतें और फिजिकल एक्टिविटी भी लगभग समान ही रहती हैं. उनका यही कॉमन रुटीन हार्मोनल संतुलन को प्रभावित करता है. रिसर्च बताती है कि अगर 2 दोस्त एक जैसी डाइट और वर्कआउट फॉलो कर रही हैं तो उनके हार्मोन्स पर समान प्रभाव पड़ना मुमकिन है. यही वजह है कि कभी-कभी पीरियड्स की तारीखें पास आ जाती हैं, जिसे लोग ‘सिंकिंग’ मान लेते हैं.

Lalit Kumar

9 साल से ज्यादा के लंबे करियर में ललित कुमार ने दैनिक जागरण, दैनिक भाष्कर, हिन्दुस्तान और नेटवर्क 18 जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, समाज, कला व संस्कृति के अलावा जटिल स्वास्थ्य विषयों और जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण उनकी विशेषता है। खबरों का डीप एनालिसिस उनकी पहचान है। हर खबर को आसान भाषा में पाठक तक पहुंचाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वर्तमान में वे देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थानों में एक इंडिया न्यूज (डिजिटल) में लाइफस्टाइल, हेल्थ, धर्म और एस्ट्रो टीम का हिस्सा हैं।

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