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Home > देश > कन्फर्म, RAC या वेटिंग टिकट कौन तय करता है? रेलवे के इस सिस्टम का ऐसे चलता है पूरा खेल

कन्फर्म, RAC या वेटिंग टिकट कौन तय करता है? रेलवे के इस सिस्टम का ऐसे चलता है पूरा खेल

Railway Ticket Booking : रेलवे में कन्फर्म, RAC और वेटिंग टिकट मिलने के पीछे PRS यानी पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम की अहम भूमिका होती है. यह सिस्टम स्लीपर, चेयर कार, 3एसी, 2एसी और 1एसी जैसे आरक्षित कोचों की टिकट बुकिंग के साथ सीट उपलब्धता, कैंसिलेशन और चार्ट तैयार करने जैसी प्रक्रियाओं को मैनेज करता है. वहीं जनरल और अनारक्षित टिकटों के लिए UTS सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है. 1986 से विकसित होता आया PRS आज रेलवे की रिजर्व टिकट व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

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Last Updated: October 8, 2026 23:42:03 IST

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Railway Ticket Booking: रेलवे में सफर करने वाले ज्यादातर लोग कन्फर्म, RAC या वेटिंग टिकट के बारे में तो जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये टिकट तय कौन करता है? कौन सा यात्री कन्फर्म सीट पाएगा, किसे RAC मिलेगा और किसका टिकट वेटिंग में जाएगा? इन सबके पीछे रेलवे का PRS यानी पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम काम करता है. यह सिर्फ टिकट बुक करने का सिस्टम नहीं, बल्कि रिजर्व सीटों की उपलब्धता से लेकर टिकट कैंसिलेशन और चार्ट तैयार करने तक कई जरूरी काम संभालता है.

स्लीपर से 1एसी तक, रिजर्व टिकट का पूरा सिस्टम PRS

रेलवे में स्लीपर, चेयर कार, 3एसी, 2एसी और 1एसी जैसी कैटेगरी में सीट या बर्थ रिजर्व कराने की सुविधा होती है. इन सभी आरक्षित टिकटों की बुकिंग और उपलब्धता का प्रबंधन PRS के जरिए किया जाता है. इसी सिस्टम के तहत यात्रियों को कन्फर्म टिकट, RAC या अलग-अलग तरह की वेटिंग लिस्ट में जगह मिलती है. हालांकि PRS को रेलवे के हर टिकट की बुकिंग का सिस्टम समझना सही नहीं होगा. यह मुख्य रूप से आरक्षित टिकटों के लिए है. यानी जिन ट्रेनों या कोच में सीट या बर्थ पहले से रिजर्व कराने की सुविधा होती है, उनके लिए टिकट बुकिंग इसी सिस्टम से होती है.

जनरल टिकट के लिए अलग है रेलवे का सिस्टम

अगर आप बिना रिजर्वेशन वाले जनरल कोच में सफर करना चाहते हैं तो उसका टिकट PRS के जरिए नहीं मिलता. ऐसे अनारक्षित टिकटों के लिए रेलवे का UTS यानी Unreserved Ticketing System इस्तेमाल किया जाता है. इस तरह आसान भाषा में समझें तो रिजर्व सीट या बर्थ की बुकिंग का काम PRS संभालता है, जबकि अनारक्षित यात्रा के टिकट के लिए UTS सिस्टम इस्तेमाल होता है. दोनों प्रणालियों का काम अलग-अलग है.

कन्फर्म से लेकर RAC और वेटिंग तक ऐसे चलता है काम

हर दिन लाखों यात्री अलग-अलग ट्रेनों और कोच में रिजर्वेशन कराते हैं. कोई स्लीपर में बर्थ चाहता है तो कोई 3एसी, 2एसी या 1एसी में यात्रा के लिए सीट बुक करता है. चेयर कार में भी रिजर्व सीटों की बुकिंग इसी व्यवस्था के तहत होती है. बुकिंग के दौरान उपलब्धता के आधार पर यात्री को कन्फर्म टिकट, RAC या वेटिंग मिल सकती है. बाद में किसी यात्री के टिकट कैंसिल करने या सीट उपलब्ध होने पर RAC और वेटिंग की स्थिति भी बदल सकती है. इन बदलावों को मैनेज करने में PRS की अहम भूमिका होती है.

टिकट कैंसिलेशन और चार्ट तैयार करने में भी PRS का रोल

PRS का काम केवल टिकट जारी करने तक सीमित नहीं है. रिजर्व टिकट के कैंसिलेशन, सीट की उपलब्धता और ट्रेन का रिजर्वेशन चार्ट तैयार करने जैसे काम भी इसी व्यवस्था से जुड़े हैं. सीनियर सिटीजन या महिलाओं के लिए उपलब्ध विशेष प्रावधानों के तहत रिजर्वेशन भी इसी रिजर्वेशन सिस्टम के जरिए मैनेज किया जाता है. इसी तरह यात्रा के नजदीक RAC टिकट के कन्फर्म होने की प्रक्रिया भी PRS में उपलब्ध सीटों और नियमों के आधार पर आगे बढ़ती है.

आखिर PRS तैयार किसने किया है?

रेलवे का PRS एक कंप्यूटर आधारित व्यवस्था है, जिसे CRIS यानी Centre for Railway Information Systems ने विकसित किया है. यह एक बड़े नेटवर्क के तौर पर काम करता है, जो देशभर में रिजर्व टिकटों से जुड़ी जानकारी और बुकिंग को मैनेज करता है. आज रेलवे काउंटर पर रिजर्व टिकट बुक कराने से लेकर ऑनलाइन माध्यम से टिकट रिजर्व करने तक यात्रियों को इसी विशाल रिजर्वेशन नेटवर्क की सुविधा मिलती है. यही वजह है कि करोड़ों यात्रियों के बीच सीट उपलब्धता और रिजर्वेशन की जानकारी को व्यवस्थित तरीके से संभालना संभव हो पाता है.

1986 में शुरू हुआ था PRS का सफर

भारतीय रेलवे की रिजर्वेशन व्यवस्था में PRS ने मैनुअल प्रक्रिया को कंप्यूटरीकृत व्यवस्था की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाई. 1986 में इसकी शुरुआत के बाद समय के साथ यह व्यवस्था ऑनलाइन और मोबाइल आधारित टिकट बुकिंग की जरूरतों के अनुरूप विकसित होती गई. आज PRS भारतीय रेलवे में आरक्षित टिकटों के प्रबंधन की प्रमुख कंप्यूटरीकृत प्रणालियों में शामिल है. यानी जब भी आप ट्रेन में अपनी सीट या बर्थ रिजर्व कराते हैं, तो पर्दे के पीछे टिकट की उपलब्धता, RAC, वेटिंग और चार्ट से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को संभालने में PRS की अहम भूमिका होती है.

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Last Updated: October 8, 2026 23:42:03 IST

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Railway Ticket Booking: रेलवे में सफर करने वाले ज्यादातर लोग कन्फर्म, RAC या वेटिंग टिकट के बारे में तो जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये टिकट तय कौन करता है? कौन सा यात्री कन्फर्म सीट पाएगा, किसे RAC मिलेगा और किसका टिकट वेटिंग में जाएगा? इन सबके पीछे रेलवे का PRS यानी पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम काम करता है. यह सिर्फ टिकट बुक करने का सिस्टम नहीं, बल्कि रिजर्व सीटों की उपलब्धता से लेकर टिकट कैंसिलेशन और चार्ट तैयार करने तक कई जरूरी काम संभालता है.

स्लीपर से 1एसी तक, रिजर्व टिकट का पूरा सिस्टम PRS

रेलवे में स्लीपर, चेयर कार, 3एसी, 2एसी और 1एसी जैसी कैटेगरी में सीट या बर्थ रिजर्व कराने की सुविधा होती है. इन सभी आरक्षित टिकटों की बुकिंग और उपलब्धता का प्रबंधन PRS के जरिए किया जाता है. इसी सिस्टम के तहत यात्रियों को कन्फर्म टिकट, RAC या अलग-अलग तरह की वेटिंग लिस्ट में जगह मिलती है. हालांकि PRS को रेलवे के हर टिकट की बुकिंग का सिस्टम समझना सही नहीं होगा. यह मुख्य रूप से आरक्षित टिकटों के लिए है. यानी जिन ट्रेनों या कोच में सीट या बर्थ पहले से रिजर्व कराने की सुविधा होती है, उनके लिए टिकट बुकिंग इसी सिस्टम से होती है.

जनरल टिकट के लिए अलग है रेलवे का सिस्टम

अगर आप बिना रिजर्वेशन वाले जनरल कोच में सफर करना चाहते हैं तो उसका टिकट PRS के जरिए नहीं मिलता. ऐसे अनारक्षित टिकटों के लिए रेलवे का UTS यानी Unreserved Ticketing System इस्तेमाल किया जाता है. इस तरह आसान भाषा में समझें तो रिजर्व सीट या बर्थ की बुकिंग का काम PRS संभालता है, जबकि अनारक्षित यात्रा के टिकट के लिए UTS सिस्टम इस्तेमाल होता है. दोनों प्रणालियों का काम अलग-अलग है.

कन्फर्म से लेकर RAC और वेटिंग तक ऐसे चलता है काम

हर दिन लाखों यात्री अलग-अलग ट्रेनों और कोच में रिजर्वेशन कराते हैं. कोई स्लीपर में बर्थ चाहता है तो कोई 3एसी, 2एसी या 1एसी में यात्रा के लिए सीट बुक करता है. चेयर कार में भी रिजर्व सीटों की बुकिंग इसी व्यवस्था के तहत होती है. बुकिंग के दौरान उपलब्धता के आधार पर यात्री को कन्फर्म टिकट, RAC या वेटिंग मिल सकती है. बाद में किसी यात्री के टिकट कैंसिल करने या सीट उपलब्ध होने पर RAC और वेटिंग की स्थिति भी बदल सकती है. इन बदलावों को मैनेज करने में PRS की अहम भूमिका होती है.

टिकट कैंसिलेशन और चार्ट तैयार करने में भी PRS का रोल

PRS का काम केवल टिकट जारी करने तक सीमित नहीं है. रिजर्व टिकट के कैंसिलेशन, सीट की उपलब्धता और ट्रेन का रिजर्वेशन चार्ट तैयार करने जैसे काम भी इसी व्यवस्था से जुड़े हैं. सीनियर सिटीजन या महिलाओं के लिए उपलब्ध विशेष प्रावधानों के तहत रिजर्वेशन भी इसी रिजर्वेशन सिस्टम के जरिए मैनेज किया जाता है. इसी तरह यात्रा के नजदीक RAC टिकट के कन्फर्म होने की प्रक्रिया भी PRS में उपलब्ध सीटों और नियमों के आधार पर आगे बढ़ती है.

आखिर PRS तैयार किसने किया है?

रेलवे का PRS एक कंप्यूटर आधारित व्यवस्था है, जिसे CRIS यानी Centre for Railway Information Systems ने विकसित किया है. यह एक बड़े नेटवर्क के तौर पर काम करता है, जो देशभर में रिजर्व टिकटों से जुड़ी जानकारी और बुकिंग को मैनेज करता है. आज रेलवे काउंटर पर रिजर्व टिकट बुक कराने से लेकर ऑनलाइन माध्यम से टिकट रिजर्व करने तक यात्रियों को इसी विशाल रिजर्वेशन नेटवर्क की सुविधा मिलती है. यही वजह है कि करोड़ों यात्रियों के बीच सीट उपलब्धता और रिजर्वेशन की जानकारी को व्यवस्थित तरीके से संभालना संभव हो पाता है.

1986 में शुरू हुआ था PRS का सफर

भारतीय रेलवे की रिजर्वेशन व्यवस्था में PRS ने मैनुअल प्रक्रिया को कंप्यूटरीकृत व्यवस्था की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाई. 1986 में इसकी शुरुआत के बाद समय के साथ यह व्यवस्था ऑनलाइन और मोबाइल आधारित टिकट बुकिंग की जरूरतों के अनुरूप विकसित होती गई. आज PRS भारतीय रेलवे में आरक्षित टिकटों के प्रबंधन की प्रमुख कंप्यूटरीकृत प्रणालियों में शामिल है. यानी जब भी आप ट्रेन में अपनी सीट या बर्थ रिजर्व कराते हैं, तो पर्दे के पीछे टिकट की उपलब्धता, RAC, वेटिंग और चार्ट से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को संभालने में PRS की अहम भूमिका होती है.

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