Aruna Shanbaug Case: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद निवासी हरीश राणा को इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी है. लेकिन क्या आपको पता है कि अरुणा शॉनबाक की वजह से इच्छामृत्यु को पूरी तरह से लीगल किया गया था.
अरुणा शॉनबाग के केस की वजह से भारत में इच्छामृत्यु का रास्ता साफ हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में पैसिव यूथेनेशिया को पूरी तरह से लीगल किया था.
Passive Euthanasia: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के 53 साल पहले मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में एक 25 साल की नर्स के साथ बेरहमी से सेक्शुअल असॉल्ट किया गया था. इस हमले में कुत्ते की चेन से उसका गला घोंट दिया गया था, जिससे उसके ब्रेन को गंभीर नुकसान हुआ और वह अगले चार दशकों तक वेजीटेटिव स्टेट में रही और उसकी ज़िंदगी भारत में ‘मरने के अधिकार’ की नींव बनेगी.
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने 31 साल के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की इजाज़त दी है, अरुणा शॉनबाग की दिल दहला देने वाली कहानी फिर से चर्चा का विषय बन गई है.
साल 2009 में शॉनबाग को लगी चोटों के 36 साल बाद, जिसकी वजह से वह वेजीटेटिव स्टेट में चली गईं थीं. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जिंदगी खत्म करने की अर्जी मान ली. याचिकाकर्ता लेखक-पत्रकार विरानी थे, जिन्होंने शॉनबाग के बारे में एक किताब लिखी थी. कोर्ट ने एक मेडिकल पैनल से सलाह ली, जिसने यह नतीजा निकाला कि शॉनबाग परमानेंट वेजीटेटिव स्टेट में रहने के ज्यादातर क्राइटेरिया को पूरा करती हैं.
7 मार्च, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फ़ैसला सुनाया. इसने भारत में पैसिव यूथेनेशिया को लीगल बनाने के लिए गाइडलाइंस का एक सेट जारी किया. कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि लाइफ सपोर्ट बंद करने का फैसला व्यक्ति के माता-पिता या पति-पत्नी या दूसरे करीबी रिश्तेदारों को लेना होगा और उनकी गैर-मौजूदगी में कोई व्यक्ति या लोगों का ग्रुप अगले दोस्त के तौर पर काम करेगा.
शॉनबाग के मामले में विरानी ने ‘अगला दोस्त’ होने का दावा किया था. अस्पताल इससे सहमत नहीं था. अरुणा शॉनबाग में उनकी दिलचस्पी चाहे जितनी भी हो, वह KEM हॉस्पिटल के स्टाफ के उस इन्वॉल्वमेंट का मुकाबला नहीं कर सकती जो 38 साल से दिन-रात अरुणा की देखभाल कर रहे हैं. हॉस्पिटल स्टाफ़ ने ज़ोर देकर कहा कि वे चाहते हैं कि शॉनबाग ज़िंदा रहें, जिसके कारण कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की अर्ज़ी खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि अगर हॉस्पिटल स्टाफ़ अपना मन बदलते हैं और भविष्य में लाइफ़ सपोर्ट हटाने का फ़ैसला करते हैं तो वे बॉम्बे हाई कोर्ट जा सकते हैं.
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया के सवाल को पांच जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच को भेज दिया था. यह तब हुआ जब NGO कॉमन कॉज की एक पिटीशन में कहा गया था कि एक व्यक्ति को इज्ज़त से मरने दिया जाना चाहिए. केंद्र ने इसका विरोध किया था और कहा था कि इसके गंभीर नतीजे होंगे. सरकार ने कहा था कि एक डॉक्टर का काम जान बचाना है, लेना नहीं और कहा था कि ऐसी पॉलिसी एग्जीक्यूटिव को तय करनी चाहिए, ज्यूडिशियरी को नहीं.
एक साल बाद शानबाग को निमोनिया का पता चला. 18 मई, 2015 को उन्हें होश में लाने की कोशिशें नाकाम होने के बाद उनकी मौत हो गई. हॉस्पिटल की नर्सों ने उनका अंतिम संस्कार किया.
2018 में संवैधानिक बेंच ने पैसिव यूथेनेशिया को पूरी तरह से लीगल कर दिया और इज्ज़त से मरने के अधिकार को फंडामेंटल राइट माना. पैसिव यूथेनेशिया के लिए प्रोसीजर और सेफगार्ड तय किए गए. कोर्ट ने “लिविंग विल” की भी इजाज़त दी, जिससे लोग आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट के खिलाफ फैसला ले सकते हैं. बेंच ने कहा कि जब जीवन की पवित्रता खत्म हो जाती है तो क्या हमें उन्हें दरवाजा पार करने और सम्मान के साथ मौत का सामना करने की इजाज़त नहीं देनी चाहिए? कुछ लोगों के लिए उनकी मौत भी जश्न का पल हो सकती है.
New fitness trends in India: भारत के बड़े शहरों में फिटनेस का अंदाज तेजी से…
Gold Plated Cars: कुछ कारों में सोने का इस्तेमाल सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि…
MP Flood Weather Alert: मध्य प्रदेश में मानसून सक्रिय है. कई जिलों में लगातार बारिश…
BPL Suspended by BCB: बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के प्रेसिडेंट तमीम इकबाल ने अनाउंस किया है…
Rakshabandhan history: रक्षाबंधन आज भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के वादे से जुड़ा त्योहार है,…
IND vs SL: गॉल टेस्ट में शानदार जीत के बाद टीम इंडिया का आत्मविश्वास बढ़ा…