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Home > देश > सड़क पर हादसा हो या गिरफ्तारी… क्यों तुरंत निकल आता है कैमरा? सुप्रीम कोर्ट ने उठाया गंभीर सवाल

सड़क पर हादसा हो या गिरफ्तारी… क्यों तुरंत निकल आता है कैमरा? सुप्रीम कोर्ट ने उठाया गंभीर सवाल

SC Remark on Social Media: शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की कि लोग अपने मोबाइल फोन को मीडिया डिवाइस में बदल रहे हैं और तुरंत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो अपलोड कर रहे हैं. CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं.

Written By:
Published: March 21, 2026 18:03:00 IST
Last Updated: 2026-03-21 18:07:05

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Supreme Court Social Media Remark: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को,  इस बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की कि लोग अपने मोबाइल फोन को मीडिया डिवाइस में बदल रहे हैं और तुरंत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो अपलोड कर रहे हैं. कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी गतिविधियां किसी आरोपी व्यक्ति के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं.
 
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं. याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस गिरफ्तार आरोपियों के वीडियो और तस्वीरें अपने सोशल मीडिया हैंडल पर अपलोड करती है, जिससे जनता के मन में उनके प्रति पूर्वाग्रह पैदा होता है. इसके बाद, जब सबूतों की कमी के कारण आरोपी बरी हो जाते हैं, तो दोष न्यायपालिका पर मढ़ा जाता है.
 

सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की

पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन द्वारा दिए गए इस तर्क से सहमति व्यक्त की कि जिस किसी के पास भी मोबाइल फोन है, वह प्रभावी रूप से एक मीडिया आउटलेट बन गया है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब भी कोई घटना होती है, भले ही कोई व्यक्ति खून से लथपथ सड़क पर पड़ा हो लोग तुरंत अपने मोबाइल फोन निकाल लेते हैं और कंटेंट बनाना शुरू कर देते हैं.
 

पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति बागची ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि केवल पुलिस के सोशल मीडिया हैंडल पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, एक व्यापक ढांचा तैयार करने की मांग की जानी चाहिए जिसमें सभी हितधारक शामिल हों पुलिस, पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया. सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों में पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग के संबंध में एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और उसके कड़ाई से पालन को सुनिश्चित करने के लिए तीन महीने का समय दिया है; इसका उद्देश्य जांच में पारदर्शिता, सूचना के अधिकार और आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन बनाना है.
 
उन्होंने टिप्पणी की कि एक व्यापक दृष्टिकोण से, हमारा मानना ​​है कि पुलिस को अपनी ब्रीफिंग के माध्यम से किसी आरोपी व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह पैदा नहीं करना चाहिए. पुलिस को एक SOP के माध्यम से विनियमित किया जा सकता है. लेकिन मीडिया विशेष रूप से सोशल मीडिया और आम जनता के बारे में क्या? क्या उन्हें रोका जा सकता है? तुलनात्मक रूप से, टीवी चैनल कहीं अधिक संयमित होते हैं, भले ही कोई उनके विचारों से असहमत हो.
 

तुषार मेहता ने क्या कहा?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे टैब्लॉइड-जैसे समूह हैं जिन्हें सीधे तौर पर ब्लैकमेलर कहा जा सकता है. न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि समस्या सोशल मीडिया की खंडित प्रकृति में निहित है. CJI कांत ने टिप्पणी की, यह एक ‘डिजिटल गिरफ़्तारी’ जैसा है या शायद इसका एक अलग पहलू है. राष्ट्रीय राजधानी से दूर कस्बों और शहरों में एक चलन देखा जा रहा है, जहां लोग अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए मीडियाकर्मी होने का दिखावा करते हैं और बिना किसी हिचकिचाहट के अपने वाहनों पर ऐसे पहचान पत्र प्रदर्शित करते हैं.
 

अदालत ने याचिका वापस लेने का सुझाव क्यों दिया?

शंकरनारायणन ने कहा कि मैं कुछ ऐसे वकीलों को जानता हूं जो सिर्फ़ हाईवे पर टोल देने से बचने के लिए अपनी कारों पर ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट’ के स्टिकर लगा लेते हैं.  बेंच ने टिप्पणी की कि, आरोपी के लिए निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के मुद्दे पर एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता को देखते हुए, यह उचित होगा कि वर्तमान याचिका को वापस ले लिया जाए और अप्रैल के बाद, जब पुलिस के लिए ‘मानक संचालन प्रक्रियाएं’ (SOPs) लागू हो जाएंगी, तब इसे एक व्यापक दायरे के साथ फिर से दायर किया जाए.

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Published: March 21, 2026 18:03:00 IST
Last Updated: 2026-03-21 18:07:05

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Supreme Court Social Media Remark: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को,  इस बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की कि लोग अपने मोबाइल फोन को मीडिया डिवाइस में बदल रहे हैं और तुरंत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो अपलोड कर रहे हैं. कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी गतिविधियां किसी आरोपी व्यक्ति के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं.
 
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं. याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस गिरफ्तार आरोपियों के वीडियो और तस्वीरें अपने सोशल मीडिया हैंडल पर अपलोड करती है, जिससे जनता के मन में उनके प्रति पूर्वाग्रह पैदा होता है. इसके बाद, जब सबूतों की कमी के कारण आरोपी बरी हो जाते हैं, तो दोष न्यायपालिका पर मढ़ा जाता है.
 

सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की

पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन द्वारा दिए गए इस तर्क से सहमति व्यक्त की कि जिस किसी के पास भी मोबाइल फोन है, वह प्रभावी रूप से एक मीडिया आउटलेट बन गया है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब भी कोई घटना होती है, भले ही कोई व्यक्ति खून से लथपथ सड़क पर पड़ा हो लोग तुरंत अपने मोबाइल फोन निकाल लेते हैं और कंटेंट बनाना शुरू कर देते हैं.
 

पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति बागची ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि केवल पुलिस के सोशल मीडिया हैंडल पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, एक व्यापक ढांचा तैयार करने की मांग की जानी चाहिए जिसमें सभी हितधारक शामिल हों पुलिस, पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया. सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों में पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग के संबंध में एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और उसके कड़ाई से पालन को सुनिश्चित करने के लिए तीन महीने का समय दिया है; इसका उद्देश्य जांच में पारदर्शिता, सूचना के अधिकार और आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन बनाना है.
 
उन्होंने टिप्पणी की कि एक व्यापक दृष्टिकोण से, हमारा मानना ​​है कि पुलिस को अपनी ब्रीफिंग के माध्यम से किसी आरोपी व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह पैदा नहीं करना चाहिए. पुलिस को एक SOP के माध्यम से विनियमित किया जा सकता है. लेकिन मीडिया विशेष रूप से सोशल मीडिया और आम जनता के बारे में क्या? क्या उन्हें रोका जा सकता है? तुलनात्मक रूप से, टीवी चैनल कहीं अधिक संयमित होते हैं, भले ही कोई उनके विचारों से असहमत हो.
 

तुषार मेहता ने क्या कहा?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे टैब्लॉइड-जैसे समूह हैं जिन्हें सीधे तौर पर ब्लैकमेलर कहा जा सकता है. न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि समस्या सोशल मीडिया की खंडित प्रकृति में निहित है. CJI कांत ने टिप्पणी की, यह एक ‘डिजिटल गिरफ़्तारी’ जैसा है या शायद इसका एक अलग पहलू है. राष्ट्रीय राजधानी से दूर कस्बों और शहरों में एक चलन देखा जा रहा है, जहां लोग अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए मीडियाकर्मी होने का दिखावा करते हैं और बिना किसी हिचकिचाहट के अपने वाहनों पर ऐसे पहचान पत्र प्रदर्शित करते हैं.
 

अदालत ने याचिका वापस लेने का सुझाव क्यों दिया?

शंकरनारायणन ने कहा कि मैं कुछ ऐसे वकीलों को जानता हूं जो सिर्फ़ हाईवे पर टोल देने से बचने के लिए अपनी कारों पर ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट’ के स्टिकर लगा लेते हैं.  बेंच ने टिप्पणी की कि, आरोपी के लिए निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के मुद्दे पर एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता को देखते हुए, यह उचित होगा कि वर्तमान याचिका को वापस ले लिया जाए और अप्रैल के बाद, जब पुलिस के लिए ‘मानक संचालन प्रक्रियाएं’ (SOPs) लागू हो जाएंगी, तब इसे एक व्यापक दायरे के साथ फिर से दायर किया जाए.

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