जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कहा कि उनकी सरकार केंद्र के साथ मिलकर दो परियोजनाओं पर काम कर रही है, जिन्हें सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) का हवाला देते हुए पाकिस्तान की आपत्तियों के कारण रोक दिया गया था.
फिर शुरु हो सकती है तुलबुल परियोजना
Tulbul Navigation Project: हाल ही में उमर अब्दुल्ला ने तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट के फिर से शुरू होने की वकालत की है. जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कहा कि उनकी सरकार केंद्र के साथ मिलकर दो परियोजनाओं पर काम कर रही है, जिन्हें सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) का हवाला देते हुए पाकिस्तान की आपत्तियों के कारण रोक दिया गया था.
यह जम्मू-कश्मीर में झेलम नदी पर प्रस्तावित एक महत्वाकांक्षी परियोजना है, जो वुलर झील के मुहाने पर नेविगेशन लॉक और नियंत्रण संरचना बनाएगी. 1984 में शुरू हुई यह योजना पूरे वर्ष नौचालन सुनिश्चित करेगी, बाढ़ नियंत्रण करेगी और जलविद्युत उत्पादन बढ़ाएगी. अगर इस परियोजना पर काम शुरू होता है तो यह कश्मीर घाटी के आर्थिक विकास का आधार बनेगी. लगभग 3 लाख एकड़-फुट जल संग्रहण क्षमता वाली यह परियोजना कश्मीर को अंतर्देशीय जलमार्ग देगी जिससे पर्यटन, माल ढुलाई और सिंचाई को बढ़ावा मिलेगा.
यह झेलम नदी पर वुलर झील के आउटलेट पर बैराज है, जो जल के प्राकृतिक भंडारण का उपयोग कर नदी में नौचालन सुगम बनाएगा. भारत का कहना है कि यह IWT के अनुच्छेद 1(11) के तहत ‘नॉन-कंजम्प्टिव यूज’ है. परियोजना बाढ़ रोकने, कम पानी में नेविगेशन और 100-150 मेगावाट बिजली उत्पादन करेगी. साथ ही इससे कश्मीर में 25,000 हेक्टेयर नई सिंचाई संभव होगी.
इसका दूसरा लोकप्रिय नाम ‘वुलर बैराज’ है. वुलर एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील वूलर पर स्थित होने से इसका ये नाम पड़ा. इस परियोजना का उद्देश्य झेलम नदी में पूरे वर्ष पानी का एक समान प्रवाह सुनिश्चित करना था. झेलम कश्मीर घाटी की उन तीन नदियों में से एक है जो अब निलंबित हो चुके अंतर्राष्ट्रीय जल परिवहन नियमन के दायरे में आती हैं ताकि जल निकाय में नौवहन सुनिश्चित किया जा सके.
1960 की सिंधु जल संधि के तहत झेलम पाकिस्तान को दी गई पश्चिमी नदी है. पाकिस्तान इसे ‘स्टोरेज वर्क’ मानता है, जो संधि के नियमों का उल्लंघन है, वहीं भारत इससे असहमत है. पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय जल निकासी नीति (IWT) का हवाला देते हुए इस परियोजना पर आपत्ति जताई थी और तर्क दिया कि झेलम नदी के जल प्रवाह को नियंत्रित करके भारत इसका उपयोग पाकिस्तान में सूखा या बाढ़ लाने के लिए एक “हथियार” के रूप में कर सकता है. अप्रैल 2025 में भारत ने IWT निलंबित कर दिया था, जिसके बाद परियोजना के पुनर्जीवित होने की संभावना फिर से शुरू हो गयी.
पाकिस्तान के विरोध के बावजूद भारत ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध में इस परियोजना पर काम फिर से शुरू किया, लेकिन घाटी में उग्रवाद बढ़ने के कारण तुलबुल नौवहन परियोजना (TNP) उग्रवादियों का पहला निशाना बना. इसके फलस्वरूप श्रमिकों ने परियोजना छोड़ दी और साइट पर जमा किए गए भारी मात्रा में लोहे और मशीनरी को लूट लिया गया. इसके बाद अगले चालीस सालों तक टीएनपी पर काम पूरी तरह से ठप रहा. हाल ही में जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा तो है कि परियोजना पर फिर से काम शुरू किया जायेगा, हालांकि यह काम कहां तक पहुंचेगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
यह परियोजना भारत के लिए सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि झेलम नियंत्रण से पाकिस्तान पर जल दबाव बनेगा. वहीं आर्थिक रूप से इसके महत्व की बात करें तो इस परियोजना से कश्मीर में नौकरियां, पर्यटन, परिवहन बढ़ेगा. बाढ़ नियंत्रण से घाटी में कृषि सुरक्षित होगी, जिससे क्षेत्र में स्थिरता और विकास को बढ़ावा मिलेगा.
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