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West Bengal Elections 2026: टीएमसी को बीजेपी से किस बात का सता रहा डर?, रेवड़ियां बांटने में लगी पार्टियां, समझें पूरा मामला

West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे सियासत में भी हलचल बढ़ने लगी है. ममता बनर्जी ने 34 साल तक चले वामपंथी शासन को उखाड़ फेका और खुद राज्य की मुखिया बन गईं. वे अगर इस बार जीत जाती हैं तो लगातार चौथी बार जीत हासिल करने वाली पश्चिम बंगाल की पहली सीएम होंगी. लेकिन, उनके सामने कई तरह की चुनौतियां हैं. बीजेपी भी टीएमसी को कड़ी टक्कर दे रही है. साथ ही जनता में भी उनके प्रति नाराजगी को साफ तौर पर देखा जा सकता है. जहां एक तरफ युवाओं में बेरोजगारी को लेकर गुस्सा है तो वहीं भ्रष्टाचार से जनता परेशान है. ममता बनर्जी भी लोगों को साधने में रेवड़ियां बांटने में लगी हुई हैं. कई योजनाओं को तुरंत लागू कर दिया गया है जिससे जनता की नाराजगी को दूर किया जा सके. देखना होगा कि इस बार पश्चिम बंगाल की गद्दी पर किसका राज होता है. क्या बीजेपी, टीएमसी को टक्कर दे पाएगी?

West Bengal Elections 2026: साल 2011 में जब ममता बनर्जी ने पहली बार मुख्यमंत्री का पद संभाला था तो न केवल उनके राजनीतिक विरोधियों ने बल्कि कई राजनीतिक विश्लेषकों ने भी उनकी शासन करने की क्षमता पर संदेह व्यक्त किया था. उनकी राजनीतिक परिपक्वता को लेकर भी शंकाएं जाहिर की गई थीं. हालांकि, पिछले पंद्रह वर्षों में बंगाल की राजनीति ने ही इन संदेहों और सवालों का जवाब दे दिया है. ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में न केवल एक बार बल्कि लगातार तीन बार चुनी गईं. अब जब पश्चिम बंगाल एक बार फिर विधानसभा चुनावों की दहलीज पर खड़ा है, तो ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस के चेहरे के रूप में चौथी बार चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं.

इस संदर्भ में यदि ममता एक बार फिर अपनी पार्टी को जीत दिलाती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल के इतिहास में लगातार चार विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनाने वाली पहली मुख्यमंत्री बन सकती हैं. लेकिन क्या इतिहास बनाना उनके लिए इतना आसान साबित होगा? कई मायनों में 2026 का चुनाव ममता बनर्जी के लिए अब तक की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा साबित हो सकता है. परिणामस्वरूप, यह सवाल उठता है कि इस चुनाव में उनके सामने कौन सी राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियां हैं और क्या वह उन पर काबू पा सकेंगी?

दो चरणों में चुनाव

जहां 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव आठ चरणों में संपन्न हुए थे, वहीं चुनाव आयोग ने घोषणा की है कि इस बार चुनाव केवल दो चरणों में होंगे. राज्य में मतदान 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को निर्धारित है और परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे. वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी ने टिप्पणी की हैं कि 2011 का चुनाव ममता बनर्जी के लिए वामपंथी शासन को सत्ता से हटाने की लड़ाई थी, वहीं 2026 का चुनाव बंगाल को भारतीय जनता पार्टी से बचाने की लड़ाई का प्रतिनिधित्व करता है. वह उन चुनौतियों की ओर भी इशारा करती हैं जो इस संघर्ष के भीतर ही निहित हैं. इसमें सबसे बड़ी परेशानी ‘सत्ता-विरोधी लहर’ है. 

कई मुद्दों पर घिरी ममता सरकार

ममता राज्य में लगातार चौथी बार सरकार बनाने का प्रयास कर रही हैं. हालांकि, उन्हें कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और विकास से जुड़े गंभीर सवालों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे मुद्दे जिनका जवाब देने के लिए वह बाध्य होंगी. दूसरी चुनौती ‘SIR’ है. इसका ममता बनर्जी पर नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों तरह से असर पड़ सकता है. ममता बनर्जी ने इसके खिलाफ एक लड़ाई लड़ी है. सड़कों से लेकर संसद और सुप्रीम कोर्ट तक. जिससे एक मज़बूत नेता के तौर पर उनकी छवि और मज़बूत हुई है और उनके समर्थकों को एकता का संदेश मिला है. हालांकि, शिखा मुखर्जी का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में नामों को हटाने को लेकर जो आशंका है, वह अपने आप में एक बड़ी चुनौती है.

एसआईआर प्रोसेस ने बदला समीकरण

वोटर लिस्ट में बदलाव 2026 के चुनावों का सबसे ज़्यादा विवादित पहलू बनकर उभरा है. आजादी के बाद यह पहली बार हुआ है जब पश्चिम बंगाल में वोटरों की कुल संख्या पिछले चुनावों के मुकाबले कम हुई है. राज्य में SIR प्रक्रिया के बाद लगभग 6.36 मिलियन वोटरों के नाम अंतिम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, जबकि लगभग 6.06 मिलियन वोटरों के नाम अभी भी जांच के दायरे में हैं.  जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं या जिनके नाम अभी लिस्ट में हैं और फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं. उनके पास अभी भी चुनावी समीक्षा प्रक्रिया के ज़रिए अपने नाम दोबारा शामिल करवाने का मौका है. 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य में 73.04 मिलियन रजिस्टर्ड वोटर थे और COVID-19 महामारी के बावजूद वोटिंग 82.3 प्रतिशत रही थी. यह आंकड़ा भारत में दर्ज की गई सबसे ज़्यादा वोटिंग दरों में से एक है. इस संदर्भ को देखते हुए यह देखना बाकी है कि क्या इस साल भी जनता उसी उत्साह के साथ वोटिंग प्रक्रिया में हिस्सा लेगी?

भ्रष्टाचार बन सकते हैं बाधा

एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि पिछले कुछ सालों में तृणमूल कांग्रेस पर लगे भ्रष्टाचार के अलग-अलग आरोप ममता बनर्जी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान PDS घोटाला, मवेशी तस्करी घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला और मंत्रियों व नौकरशाहों की गिरफ्तारियों जैसे मुद्दे तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ विरोध के मुख्य बिंदुओं के तौर पर जोर-शोर से उठे. विधानसभा चुनावों में ये मुद्दे शहरी इलाकों में वोटिंग के पैटर्न पर काफी असर डाल सकते हैं. खासकर कोलकाता और उसके आस-पास के क्षेत्रों में ममता के खिलाफ नाराज़गी बढ़ी है. इसलिए इस भावना को संभालना एक बड़ी चुनौती होगी.

इसके अलावा ममता बनर्जी ने पहले कहा था कि वह SIR प्रक्रिया के कारण किसी का भी नाम वोटर लिस्ट से हटने नहीं देंगी. उन्होंने यह भी वादा किया था कि वह राज्य में वक्फ अधिनियम को लागू नहीं होने देंगी. हालांकि, वह इन दोनों में से कोई भी वादा पूरा नहीं कर पाईं. नतीजतन, इन दोनों मुद्दों को लेकर आबादी के एक खास तबके में नाराज़गी देखी जा सकती है. 

दरअसल, वक्फ संशोधन विधेयक का पूरे पश्चिम बंगाल में ज़ोरदार विरोध हुआ था. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद साफ तौर पर कहा था कि वह किसी भी हाल में राज्य में इसे लागू नहीं होने देंगी. इस कानून के विरोध के कारण मुर्शिदाबाद ज़िले में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा भी भड़क उठी थी. लेकिन, राज्य में चल रही विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया को लेकर मचे हंगामे के बीच ममता बनर्जी सरकार ने चुपके से इस अधिनियम को लागू करने का फैसला कर लिया. बिस्वजीत भट्टाचार्य का आगे मानना ​​है कि पश्चिम बंगाल में वोटिंग अब ज्यादा से ज्यादा सांप्रदायिक मुद्दों से प्रभावित होगी. 

बीजेपी से कड़ी टक्कर

हालात को देखते हुए ममता बनर्जी भी इस बात को पूरी तरह समझती हैं कि यह चुनाव उनके लिए आसान नहीं होगा. ममता का सक्रिय रवैया जो चुनाव की तारीखें घोषित होने तक की गई घोषणाओं में साफ झलकता है, जैसे कि महिला मतदाताओं को लुभाने और उनका समर्थन पक्का करने के लिए ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं के लिए वित्तीय आवंटन बढ़ाना, ‘बांग्लार युवा साथी’ पहल के तहत बेरोजगार युवाओं को 1,500 की मासिक वित्तीय सहायता देना, राज्य सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बकाया महंगाई भत्ते (DA) का भुगतान करने का निर्णय लेना और पुजारियों तथा मुअज़्ज़िनों के मानदेय में बढ़ोतरी के कदम उठाना. यह सब चुनाव की घोषणा से ठीक पहले किया गया. इससे यह साबित होता है कि ममता बनर्जी आने वाली इस चुनावी जंग को आसान नहीं मानतीं. वह जनता की नाराजगी को दूर करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं. 

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