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West Bengal Election 2026: मुर्शिदाबाद में हिंदुओं को किस बात की चिंता?, धार्मिक पहचान, आर्सेनिक पानी, सुरक्षा के बीच हुमायूं कबीर की राजनीती

West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल ज़िले मुर्शिदाबाद में चुनावी चर्चा पर धार्मिक पहचान की राजनीति और गंभीर स्थानीय मुद्दों का गहरा असर है. जहां AIMIM से जुड़े हुमायूं कबीर जैसे नेता कथित शोषण के ख़िलाफ अल्पसंख्यकों का समर्थन जुटाने पर ज़ोर देते हैं, वहीं कुछ लगातार बनी रहने वाली समस्याएं जैसे आर्सेनिक दूषित पानी, पुलिस व्यवस्था में बड़ी कमियां और बुनियादी ढांचे की विफलताएं यहां के निवासियों के रोजमर्रा के जीवन और चिंताओं का केंद्र बनी हुई हैं. AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का दावा है कि TMC मुस्लिम समुदाय की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है.

West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल ज़िले मुर्शिदाबाद में चुनावी चर्चा पर धार्मिक पहचान की राजनीति और गंभीर स्थानीय मुद्दों का गहरा असर है. जहां AIMIM से जुड़े हुमायूं कबीर जैसे नेता कथित शोषण के ख़िलाफ अल्पसंख्यकों का समर्थन जुटाने पर ज़ोर देते हैं, वहीं कुछ लगातार बनी रहने वाली समस्याएं जैसे आर्सेनिक दूषित पानी, पुलिस व्यवस्था में बड़ी कमियां और बुनियादी ढांचे की विफलताएं यहां के निवासियों के रोजमर्रा के जीवन और चिंताओं का केंद्र बनी हुई हैं. AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का दावा है कि TMC मुस्लिम समुदाय की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है.

वे हुमायूं कबीर के साथ अपने गठबंधन को सशक्तिकरण की लड़ाई के तौर पर पेश करते हैं, जिससे अक्सर चुनाव का मुद्दा धार्मिक पहचान के इर्द-गिर्द सिमट जाता है. मुर्शिदाबाद में 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक माहौल धार्मिक पहचान की ओर झुकाव से काफी प्रभावित है. खासकर निलंबित TMC विधायक हुमायूं कबीर के कार्यों के कारण. जहां पानी और शासन जैसे बुनियादी मुद्दे अभी भी बने हुए हैं, वहीं भावनात्मक धार्मिक परियोजनाएं केंद्र में आ गई हैं. 

धर्म बनाम बुनियादी मुद्दे

बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक मस्जिद बनाने की हुमायूं कबीर की योजना एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गई है. उनका तर्क है कि बाबरी मस्जिद की भावना और मुस्लिम राजनीतिक मुखरता ही 2026 के नतीजों को तय करेगी. कबीर की नई बनी पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) एक मुस्लिम मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री की मांग पर चुनाव प्रचार कर रही है. वह इस चुनाव को केवल सेवा देने के बजाय अल्पसंख्यक राजनीतिक सत्ता हासिल करने की लड़ाई के तौर पर पेश कर रही है. बुनियादी जरूरतों की अनदेखी की बात करें तो पहचान की राजनीति पर जोर देने के बावजूद, मुर्शिदाबाद भारत के उन ज़िलों में से एक है जो आर्सेनिक से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. यहां की लगभग एक-तिहाई आबादी आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित है.

हिंदू समुदाय की चिंताएं

हिंदू समुदायों ने कबीर की भड़काऊ बयानबाज़ी पर चिंता जताई है. खासकर उनके उस 70-30 वाले बयान पर जो काफी चर्चा में रहा था. इस बयान में उन्होंने धमकी दी थी कि अगर उन्हें उकसाया गया तो वे दो घंटे के अंदर हिंदुओं को भागीरथी नदी में डुबो देंगे. इससे ध्रुवीकरण की चिंताएं बनने लगीं. आलोचक और राजनीतिक विरोधी कबीर पर आरोप लगाते हैं कि वे अपनी मस्जिद परियोजना के समय और प्रतीकों के ज़रिए जान-बूझकर लोगों को उकसा रहे हैं, जिससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है. चुनावों से पहले इस विवाद को शांत करने की कोशिश में कबीर ने जनवरी 2026 में हिंदू समुदाय से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी. उन्होंने दावा किया कि उनके बयान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रभाव में आकर दिए गए थे.

आर्सेनिक संकट

प्रदूषण का स्तर की बात करें तो 26 ब्लॉकों में से 24 ब्लॉक आर्सेनिक से बुरी तरह प्रभावित हैं, जहां आर्सेनिक का स्तर 50 µg/L से ज़्यादा है. इसके अलावा जन स्वास्थ्य पर नजर डाली जाए तो अनुमान के मुताबिक, 25 लाख लोग दूषित पानी पी रहे हैं. जांच किए गए लोगों में से 19% की त्वचा पर आर्सेनिक के कारण होने वाले घाव या निशान साफ ​​दिखाई देते हैं. नागरिक व्यवस्था की विफलता भी इसमें एक फैक्टर है. हालांकि मझ्यमपुर जैसे ट्रीटमेंट प्लांट मौजूद हैं, फिर भी यहां का पानी अक्सर स्थानीय आबादी की पहुंच से बाहर होता है. इस आबादी में मुख्य रूप से कम आय वाले किसान और मजदूर शामिल हैं.

पुलिस व्यवस्था और सुरक्षा

ज़िले में तनाव बना हुआ है. कबीर द्वारा मस्जिद की नींव रखे जाने के समारोह के बाद सांप्रदायिक अशांति को रोकने के लिए हाल ही में 3,500 से अधिक सुरक्षाकर्मी और CISF की 19 कंपनियां तैनात की गई. कबीर ने स्थानीय पुलिस पर उन्हें परेशान करने और उनके परिवार को निशाना बनाने का आरोप लगाया है, जबकि अधिकारी सांप्रदायिक तनाव भड़कने के जोखिम के चलते हाई अलर्ट पर हैं. ज़ोरदार धार्मिक बयानबाज़ी पर दिए जाने वाले अत्यधिक ध्यान के कारण सामूहिक आपदा से निपटने के लिए जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे की कमी अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती है.

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