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राइटर्स बिल्डिंग की सीढ़ियों पर जब घसीटी गई एक महिला, वो घटना जिसने बदल दी बंगाल की राजनीति

Bengal Mamata Banerjee vs CPI(M) Rivalry: ममता बनर्जी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के बीच की राजनीतिक लड़ाई पश्चिम बंगाल के इतिहास की सबसे बड़ी टक्करों में से एक रही है. इसकी शुरुआत 1990 के हजारा हमले से हुई जब ममता बनर्जी पर लाठीचार्ज हुआ और 1993 में राइटर्स बिल्डिंग्स में उनके साथ हुए अपमान ने इस दुश्मन को और गहरा कर दिया. इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बनाई और करीब दो दशक तक CPI(M) के खिलाफ लगातार संघर्ष किया. कई चुनावी हार और मुश्किलों के बावजूद वे हार नहीं मानी.

Bengal Mamata Banerjee vs CPI(M) Rivalry: पश्चिम बंगाल की पॉलिटिक्स में ममता बनर्जी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के बीच मुकाबला सिर्फ दो नेताओं या पार्टियों के बीच की लड़ाई नहीं थी बल्कि एक लंबी पॉलिटिकल लड़ाई थी जिसने पूरे राज्य का रुख बदल दिया. 34 साल से सत्ता में काबिज लेफ्ट फ्रंट सरकार को हराना किसी चमत्कार से कम नहीं था लेकिन इस बदलाव के पीछे दशकों का संघर्ष बेइज्जती और जिद छिपी थी. कुछ ही दिनों में बंगाल में चुनाव होने वाले हैं तो चलिए इससे पहले जानते हैं कि एक महिला ने कैसे 34 साल से सत्ता को अपने दम पर उखाड़ फेका था.

1990 से शुरू होती है कहानी

यह कहानी 16 अगस्त 1990 से शुरू होती है. कोलकाता की सड़कें लगभग सुनसान थीं. दुकानें बंद थीं और सड़क पर कुछ ही गाड़ियां दिख रही थीं. कांग्रेस ने उस दिन पूरे देश में बंद का आह्वान किया था और कांग्रेस कार्यकर्ता सीपीएम सरकार का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आए थे. साउथ कोलकाता के हाजरा इलाके में कांग्रेस की एक रैली को सफेद सूती साड़ी और चप्पल पहनी एक महिला लीड कर रही थी जो पार्टी की फायरब्रांड नेता हैं. जैसे ही कांग्रेस की रैली हाजरा के बीच में पहुंची अचानक सीपीएम कार्यकर्ताओं के साथ झड़प हो गई. सीपीएम कार्यकर्ता लालू आलम एक डंडे के साथ रैली को लीड कर रही महिला के पास पहुंचें और उसके सिर पर वार किया. महिला का सिर फट गया और उसकी सफेद साड़ी खून से लाल हो गई. वह महिला ममता बनर्जी थीं. इस घटना से ममता बिल्कुल भी नहीं डरीं और अस्पताल से छुट्टी मिलते ही ममता बनर्जी सिर पर पट्टी बांधकर फिर से सड़क पर निकल आईं.

सीपीएम बना जानी दुश्मन

1990 की इस घटना ने एक तरह से ममता बनर्जी और सीपीएम के बीच दुश्मनी की शुरुआत कर दी. तीन साल बाद 1993 में ममता बनर्जी से जुड़ी एक और घटना हुई जिसने सीपीएम को उनका जानी दुश्मन बना दिया. जनवरी 1993 में नादिया जिले में एक बहरी और गूंगी रेप की खबर सामने आई. उस समय ममता बनर्जी कांग्रेस यूथ विंग की प्रेसिडेंट थीं. वह पीड़िता को सेक्रेटेरिएट में राइटर्स बिल्डिंग ले गईं.जहां उस समय के चीफ मिनिस्टर ज्योति बसु का ऑफिस था और चीफ मिनिस्टर ज्योति बसु के चैंबर के बाहर धरना दिया. ममता ने बार-बार कहा कि आरोपी ज्योति बसु की पार्टी सीपीएम के वर्कर थे और चीफ मिनिस्टर उन्हें बचा रहे थे. बनर्जी ने ऐलान किया कि जब तक चीफ मिनिस्टर उनसे नहीं मिलते वह राइटर्स बिल्डिंग से बाहर नहीं निकलेंगी.जब उन्होंने विरोध किया तो पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी की और महिला पुलिस ऑफिसर्स ने उन्हें सीढ़ियों से घसीटकर नीचे उतारा उनके कपड़े फाड़ दिए. यह बेइज्ज़ती ममता बनर्जी के लिए सिर्फ एक घटना नहीं थी बल्कि एक पक्का इरादा था. उन्होंने कसम खाई कि जब तक वह चीफ मिनिस्टर नहीं बन जातींसवह राइटर्स बिल्डिंग्स में कदम नहीं रखेंगी यह वादा उन्होंने 18 साल तक निभाया.

1997 में बनाई पार्टी

1997 में कांग्रेस पार्टी से अलग होने के बाद ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बनाई. तृणमूल जिसका मतलब है जमीनी स्तर उनके पॉलिटिकल झुकाव को दिखाता था जो सीधे आम लोगों से जुड़ा था. कोलकाता के श्यामबाजार में हुई उनकी पहली रैली में रिसोर्स की कमी के बावजूद भारी भीड़ जमा हुई. इस भीड़ ने इशारा किया कि ममता बनर्जी सिर्फ एक लीडर नहीं बल्कि एक इमोशन बन रही थीं.

कई हार का सामना

इसके बाद वह लगभग दो दशकों तक CPI(M) के खिलाफ लगातार लड़ती रहीं. इस दौरान उन्हें कई हार का सामना करना पड़ा 2001 और 2006 के विधानसभा चुनाव हार गईं और 2004 के लोकसभा चुनावों में भी उन्हें झटका लगा. लेकिन हर गिरावट से उठना उनकी पहचान बन गई. उनकी सादगी सूती साड़ी और चप्पल पहनने की उनकी इमेज और गरीबों और मजदूर वर्ग से उनके जुड़ाव ने जनता के बीच उनकी पकड़ को और मजबूत किया.

लेफ्ट फ्रंट का 34 साल का राज हुआ खत्म

आखिरकार 2011 में वह दिन आया जब इस लंबे संघर्ष का फल मिला. लेफ्ट फ्रंट का 34 साल का राज खत्म हुआ और ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं.सबसे खास बात यह है कि वह 20 मई 2011 को मुख्यमंत्री के तौर पर उसी राइटर्स बिल्डिंग्स में लौटीं जहां से उन्हें 1993 में घसीटकर निकाला गया था. यह सिर्फ सत्ता का बदलाव नहीं था बल्कि एक निजी और राजनीतिक संघर्ष की जीत थी.

जब उन्होंने 2011 में पहली बार मुख्यमंत्री का पद संभाला था तो न सिर्फ उनके विरोधियों ने बल्कि कुछ पॉलिटिकल एनालिस्ट ने भी उनके शासन करने की क्षमता पर शक जताया था. उनकी पॉलिटिकल मैच्योरिटी पर भी शक जताया गया था. लेकिन पिछले पंद्रह सालों में बंगाल की पॉलिटिक्स ने खुद ही इन शकों और सवालों के जवाब दे दिए हैं. ममता बनर्जी एक बार नहीं बल्कि लगातार तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री चुनी गईं. 

क्या इस बार चुनाव जीत पाएंगी ममता?

अब जब पश्चिम बंगाल एक बार फिर असेंबली इलेक्शन की दहलीज पर है तो ममता बनर्जी चौथी बार तृणमूल कांग्रेस का चेहरा बनकर चुनावी मैदान में उतरी हैं. अगर ममता अपनी पार्टी को फिर से जीत दिलाती हैं, तो वह लगातार चार असेंबली इलेक्शन जीतने वाली पश्चिम बंगाल की पहली मुख्यमंत्री बन सकती हैं.

 तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए अपना मैनिफेस्टो जारी कर दिया है. मैनिफेस्टो जारी करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, “मैं बंगाल के लोगों से अपील करती हूं कि बंगाल को बचाने के लिए एकजुट होकर BJP के खिलाफ लड़ें. अगर सेंट्रल एजेंसियां ​​आपको डराने की कोशिश कर रही हैं, तो डरें नहीं. अगर वे आपको पैसे देने की कोशिश कर रहे हैं, तो न लें. वे बॉर्डर इलाकों से पैसा और हथियार माफिया लाते हैं और यहां अशांति और दंगे भड़काने की कोशिश करते हैं. मैं बांटने वाली राजनीति नहीं कर रही हूं. हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी बराबर हैं.”

मैनिफेस्टो जारी करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि ‘लक्ष्मी भंडार’ स्कीम के तहत, जनरल कैटेगरी की महिलाओं को हर महीने ₹1,500 और SC/ST कैटेगरी की महिलाओं को हर महीने ₹1,700 मिलेंगे. बेरोज़गार युवाओं को पॉकेट मनी के तौर पर हर महीने ₹1,500 मिलेंगे. बंगाल इंडस्ट्री के लिए पसंदीदा जगह है. हम MSME सेक्टर में पहले नंबर पर हैं, जिसमें 15 मिलियन लोग काम करते हैं. बंगाल में लेदर इंडस्ट्री सबसे बड़ी है. इससे पता चलता है कि ममता बनर्जी आज भी इस चुनाव में भी वाम मोर्चा के विचारधारा आधारित राजनीती के उलट बंगाल में जनता आधारित राजनीति कर रही है. जो उनको चुनाव में फायदा दे सकता है.

Divyanshi Singh

दिव्यांशी सिंह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और पिछले 4 सालों से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। जियो-पॉलिटिक्स और स्पोर्टस में काम करने का लंबा अनुभव है।

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