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SIR में क्या होता है Form 6-7? जानिए एक ऑनलाइन बदलाव पर क्यों मचा है देश भर में बवाल

SIR प्रक्रिया में आखिर 'फॉर्म 6' को लेकर इतना बवाल क्यों मचा है? जानिए कैसे एक छोटे से ऑनलाइन बदलाव ने चुनाव आयोग, विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के बीच बहस छेड़ दी. फॉर्म 6 और फॉर्म 7 का असली सच, आयोग के अंदर का मतभेद और चीफ जस्टिस की कड़ी टिप्पणी.

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Last Updated: October 5, 2026 20:27:54 IST

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5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले ‘फॉर्म 6’ में किसी भी तरह के बदलाव को मंजूरी नहीं दी है.

CJI सूर्यकांत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा, हमने फॉर्म 6 के किसी भी संशोधित रूप (Modified Version) को मंजूरी नहीं दी है. जब रिकॉर्ड हमारे सामने पेश किए जाएंगे, तब हम यह देखना चाहेंगे कि इसमें बदलाव किसने किया.’ इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर संबंधित रिकॉर्ड मांगे हैं और चेतावनी दी है कि यदि यह साबित होता है कि आयोग में बिना आम सहमति के फैसले लिए गए, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है.

फॉर्म 6 और फॉर्म 7 क्या हैं?

मतदाता सूची (Electoral Roll) को सही और पारदर्शी बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग ‘मतदाता पंजीकरण नियम, 1960’ (Registration of Electors Rules, 1960) के तहत इन दोनों फॉर्मों का उपयोग करता है.

फॉर्म 6 (नए मतदाता के लिए ‘एंट्री पास’)

कोई भी भारतीय नागरिक जो पहली बार वोटर बन रहा है, या जिसने अपना क्षेत्र बदला है, वह अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 भरता है. इसमें आवेदक को अपनी व्यक्तिगत जानकारी, आयु प्रमाण (Age Proof), निवास प्रमाण और नागरिकता की घोषणा देनी होती है.

फॉर्म 7 (नाम हटाने/आपत्ति दर्ज करने के लिए)

यदि मतदाता सूची में किसी गलत व्यक्ति का नाम शामिल है, तो उस नाम को हटवाने या उस पर आपत्ति जताने के लिए फॉर्म 7 भरा जाता है. इसमें तीन विकल्प होते हैं अपना नाम हटवाना, किसी अन्य के नाम पर आपत्ति करना, या नए जोड़े जा रहे नाम का विरोध करना. फॉर्म 7 मिलने पर संबंधित अधिकारी (BLO/ERO) मौके पर जाकर जांच (Field Verification) करते हैं और सुनवाई के बाद फैसला लेते हैं.

विवाद की शुरुआत कहाँ से हुई?

पूरा विवाद निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) अभियान के दौरान शुरू हुआ. SIR का मकसद वोटर लिस्ट को दुरुस्त करना और फर्जी या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना होता है. विवाद के तीन मुख्य कारण हैं:

1. फॉर्म 6 में अनधिकृत बदलाव का आरोप

ऑनलाइन फॉर्म 6 भरते समय आवेदकों से एक अतिरिक्त घोषणा पत्र मांगा जाने लगा. इसमें पूछा गया कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पहले की किसी SIR वोटर लिस्ट में था.

विपक्ष ने कहा कि संसद या कानून मंत्रालय की अनुमति के बिना फॉर्म में बदलाव करना गैर-कानूनी है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग के किस अधिकारी के आदेश पर सॉफ्टवेयर डेवलपर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने ऑनलाइन फॉर्म में यह बदलाव लागू किया.

2. फॉर्म 7 के दुरुपयोग का आरोप

 कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आरोप लगाया कि पहले से छपे हुए (Pre-printed) फॉर्म 7 बांटे गए ताकि लगभग 15 लाख मतदाताओं (मुख्य रूप से अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी वर्ग) के नाम हटाए जा सकें. सितंबर 2026 तक कर्नाटक में 4,000 से अधिक फॉर्म 7 दाखिल किए गए, जिनमें से 1,363 फॉर्म सिर्फ 10 व्यक्तियों द्वारा जमा किए गए थे.

तेलंगाना में भी 29,000 से अधिक फॉर्म 7 जमा किए गए, जिन्हें लेकर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया कि विरोधी दल सुनियोजित तरीके से अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम कटवाने की कोशिश कर रहे हैं.

3. सॉफ्टवेयर और तकनीकी खामी (गोवा मामला)

गोवा में एक परिवार ने अपना पता बदलने के लिए ‘फॉर्म 8’ भरा था. लेकिन सॉफ्टवेयर की खराबी के कारण उनका फॉर्म स्वीकार नहीं हुआ और उन्हें फिर से ‘फॉर्म 6’ (नया मतदाता फॉर्म) भरने को कहा गया. बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पर चुनाव आयोग को सख्त फटकार लगाते हुए कहा था कि “सॉफ्टवेयर कानून से ऊपर नहीं हो सकता” और इस तरह तो नियम-पुस्तिका का मकसद ही खत्म हो जाएगा.

निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर ही दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर प्रक्रियागत आपत्ति दर्ज कराई थी. उनका मानना था कि उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किए गए ऐसे बदलावों से युवा और नए मतदाता (Gen Z) वोटर लिस्ट से वंचित हो सकते हैं.

वहीं, आयोग ने शुरुआत में दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने इन बदलावों को हरी झंडी दे दी है. लेकिन 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के बयान ने साफ कर दिया कि अदालत ने ऐसे किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी.

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से पूरा प्रशासनिक रिकॉर्ड मांगा है. कोर्ट यह जांच करेगा कि फॉर्म 6 में ऑनलाइन बदलाव की अनुमति किसने दी और क्या यह फैसला आयोग की आम सहमति से लिया गया था या नहीं. विवाद बढ़ता देख चुनाव आयोग ने उन राज्यों में इस अतिरिक्त घोषणा पत्र की अनिवार्यता हटा ली है, जहाँ पुनरीक्षण का काम पूरा हो चुका है.

फॉर्म 6 और फॉर्म 7 लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के दो सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं. सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग के जवाब और आगामी अदालती सुनवाई पर टिकी हैं.

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5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले ‘फॉर्म 6’ में किसी भी तरह के बदलाव को मंजूरी नहीं दी है.

CJI सूर्यकांत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा, हमने फॉर्म 6 के किसी भी संशोधित रूप (Modified Version) को मंजूरी नहीं दी है. जब रिकॉर्ड हमारे सामने पेश किए जाएंगे, तब हम यह देखना चाहेंगे कि इसमें बदलाव किसने किया.’ इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर संबंधित रिकॉर्ड मांगे हैं और चेतावनी दी है कि यदि यह साबित होता है कि आयोग में बिना आम सहमति के फैसले लिए गए, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है.

फॉर्म 6 और फॉर्म 7 क्या हैं?

मतदाता सूची (Electoral Roll) को सही और पारदर्शी बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग ‘मतदाता पंजीकरण नियम, 1960’ (Registration of Electors Rules, 1960) के तहत इन दोनों फॉर्मों का उपयोग करता है.

फॉर्म 6 (नए मतदाता के लिए ‘एंट्री पास’)

कोई भी भारतीय नागरिक जो पहली बार वोटर बन रहा है, या जिसने अपना क्षेत्र बदला है, वह अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 भरता है. इसमें आवेदक को अपनी व्यक्तिगत जानकारी, आयु प्रमाण (Age Proof), निवास प्रमाण और नागरिकता की घोषणा देनी होती है.

फॉर्म 7 (नाम हटाने/आपत्ति दर्ज करने के लिए)

यदि मतदाता सूची में किसी गलत व्यक्ति का नाम शामिल है, तो उस नाम को हटवाने या उस पर आपत्ति जताने के लिए फॉर्म 7 भरा जाता है. इसमें तीन विकल्प होते हैं अपना नाम हटवाना, किसी अन्य के नाम पर आपत्ति करना, या नए जोड़े जा रहे नाम का विरोध करना. फॉर्म 7 मिलने पर संबंधित अधिकारी (BLO/ERO) मौके पर जाकर जांच (Field Verification) करते हैं और सुनवाई के बाद फैसला लेते हैं.

विवाद की शुरुआत कहाँ से हुई?

पूरा विवाद निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) अभियान के दौरान शुरू हुआ. SIR का मकसद वोटर लिस्ट को दुरुस्त करना और फर्जी या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना होता है. विवाद के तीन मुख्य कारण हैं:

1. फॉर्म 6 में अनधिकृत बदलाव का आरोप

ऑनलाइन फॉर्म 6 भरते समय आवेदकों से एक अतिरिक्त घोषणा पत्र मांगा जाने लगा. इसमें पूछा गया कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पहले की किसी SIR वोटर लिस्ट में था.

विपक्ष ने कहा कि संसद या कानून मंत्रालय की अनुमति के बिना फॉर्म में बदलाव करना गैर-कानूनी है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग के किस अधिकारी के आदेश पर सॉफ्टवेयर डेवलपर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने ऑनलाइन फॉर्म में यह बदलाव लागू किया.

2. फॉर्म 7 के दुरुपयोग का आरोप

 कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आरोप लगाया कि पहले से छपे हुए (Pre-printed) फॉर्म 7 बांटे गए ताकि लगभग 15 लाख मतदाताओं (मुख्य रूप से अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी वर्ग) के नाम हटाए जा सकें. सितंबर 2026 तक कर्नाटक में 4,000 से अधिक फॉर्म 7 दाखिल किए गए, जिनमें से 1,363 फॉर्म सिर्फ 10 व्यक्तियों द्वारा जमा किए गए थे.

तेलंगाना में भी 29,000 से अधिक फॉर्म 7 जमा किए गए, जिन्हें लेकर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया कि विरोधी दल सुनियोजित तरीके से अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम कटवाने की कोशिश कर रहे हैं.

3. सॉफ्टवेयर और तकनीकी खामी (गोवा मामला)

गोवा में एक परिवार ने अपना पता बदलने के लिए ‘फॉर्म 8’ भरा था. लेकिन सॉफ्टवेयर की खराबी के कारण उनका फॉर्म स्वीकार नहीं हुआ और उन्हें फिर से ‘फॉर्म 6’ (नया मतदाता फॉर्म) भरने को कहा गया. बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पर चुनाव आयोग को सख्त फटकार लगाते हुए कहा था कि “सॉफ्टवेयर कानून से ऊपर नहीं हो सकता” और इस तरह तो नियम-पुस्तिका का मकसद ही खत्म हो जाएगा.

निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर ही दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर प्रक्रियागत आपत्ति दर्ज कराई थी. उनका मानना था कि उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किए गए ऐसे बदलावों से युवा और नए मतदाता (Gen Z) वोटर लिस्ट से वंचित हो सकते हैं.

वहीं, आयोग ने शुरुआत में दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने इन बदलावों को हरी झंडी दे दी है. लेकिन 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के बयान ने साफ कर दिया कि अदालत ने ऐसे किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी.

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से पूरा प्रशासनिक रिकॉर्ड मांगा है. कोर्ट यह जांच करेगा कि फॉर्म 6 में ऑनलाइन बदलाव की अनुमति किसने दी और क्या यह फैसला आयोग की आम सहमति से लिया गया था या नहीं. विवाद बढ़ता देख चुनाव आयोग ने उन राज्यों में इस अतिरिक्त घोषणा पत्र की अनिवार्यता हटा ली है, जहाँ पुनरीक्षण का काम पूरा हो चुका है.

फॉर्म 6 और फॉर्म 7 लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के दो सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं. सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग के जवाब और आगामी अदालती सुनवाई पर टिकी हैं.

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