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क्या सोशल मीडिया भी किसी देश में करा सकता है युद्ध? सच हो रही 20 साल पहले की भविष्यवाणी

संपादकीय कार्यालयों जैसे पारंपरिक नियंत्रकों के नियंत्रण में अब सूचना का बाज़ार नहीं है, जिस वजह से कोई भी सूचना बिना किसी फिल्टर के लोगों तक पहुंच रही है. इससे सूचनाओं की वास्तविकता को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं, जिससे सोशल मीडिया वॉरफेयर की स्थिति बन जाती है.

Social Media Warfare: आज के सूचना युग की कल्पना सोशल मीडिया के बिना असंभव है. सोशल मीडिया हमारे दैनिक जीवन में गहराई से समाया हुआ है. सोशल मीडिया के आसान एक्सेस के कारण, हर कोई; चाहे वह आम नागरिक हो, राजनेता हो या कंपनी कम लागत में सूचनाओं तक व्यापक पहुंच प्राप्त कर रहा है. संपादकीय कार्यालयों जैसे पारंपरिक नियंत्रकों के नियंत्रण में अब सूचना का बाज़ार नहीं है, जिस वजह से कोई भी सूचना बिना किसी फिल्टर के लोगों तक पहुंच रही है. इससे सूचनाओं की वास्तविकता को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं, जिससे सोशल मीडिया वॉरफेयर की स्थिति बन जाती है. 

क्या है सोशल मीडिया वॉरफेयर?

सोशल मीडिया वॉरफेयर का मतलब है ट्विटर, फेसबुक और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म का रणनीतिक इस्तेमाल करके लोगों की राय को बदलना, गलत जानकारी फैलाना और बिना पारंपरिक लड़ाई के जियोपॉलिटिकल या आर्थिक लक्ष्य हासिल करना. यह नई कोल्ड वॉर का युद्धक्षेत्र बनकर उभरा है क्योंकि देश और गैर-सरकारी संगठन जानकारी के दबदबे के जरिए प्रॉक्सी संघर्ष करते हैं. ये वॉरफेयर सीधे सैन्य टकराव से बचते हुए चुनाव, बाजार और गठबंधनों को प्रभावित करते हैं. यह अदृश्य युद्ध वायरल कहानियों का फायदा उठाकर समाज को बांटता है, ठीक वैसे ही जैसे मूल कोल्ड वॉर के दौरान वैचारिक टकराव हुए थे. 

बीस साल पहले ही वैज्ञानिकों ने कर दी थी “नेट युद्ध” की भविष्यवाणी

इस घटना की भविष्यवाणी 20 साल पहले ही कर दी गयी थी. उस समय वैज्ञानिकों ने 21वीं सदी में “नेट युद्ध” के विकास की भविष्यवाणी की थी. दो दशक पहले, 1990 के दशक के आखिर में और 2000 के दशक की शुरुआत में, RAND कॉर्पोरेशन के शोधकर्ताओं जॉन आर्कुइला और डेविड रॉनफेल्ट ने सूचना युग में नेटवर्क-आधारित संघर्षों का वर्णन करने के लिए “नेटवॉर” शब्द गढ़ा था. उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि विकेन्द्रीकृत कलाकार—राज्य, आतंकवादी, या निगम—गतिज बल के बजाय समन्वित ऑनलाइन हमलों के माध्यम से दुश्मनों को बाधित करने के लिए डिजिटल नेटवर्क का उपयोग करेंगे. “नेटवर्क्स एंड नेटवार्स” (2001) लेख में उल्लिखित इस दूरदर्शिता ने अनुमान लगाया था कि सोशल मीडिया इन गतिशीलता को कैसे बढ़ाएगा, जिससे इंटरनेट विचारों और प्रभाव के लिए एक युद्ध का मैदान बन जाएगा. 
साइबर युद्ध के विपरीत, इसका उद्देश्य सूचना प्रौद्योगिकी या संचार प्रणालियों पर हमला करना नहीं था. बल्कि, नेटवर्क युद्ध का लक्ष्य किसी विशिष्ट समूह की धारणा को जानबूझकर प्रभावित करना था. डिजिटल युग में, प्रतिद्वंद्वी को समाप्त करने और युद्ध जीतने के लिए रक्तपात की आवश्यकता नहीं रह गई है, क्योंकि सूचना स्वयं सबसे शक्तिशाली हथियार बन गई है जिसका उपयोग राज्य, कंपनियां, छोटे समूह और व्यक्ति समान रूप से कर सकते हैं.

आधुनिक रणनीतियां और प्रभाव

आज का सोशल मीडिया युद्ध वायरल कहानियों के माध्यम से सामने आता है जो उपयोगकर्ताओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करती हैं. नैतिक धर्मयुद्ध के रूप में तैयार किए गए टैरिफ, हुआवेई प्रतिबंधों जैसे तकनीकी प्रतिबंध, विरोध प्रदर्शनों के लिए ऑनलाइन लामबंदी, और बॉट्स और डीपफेक के माध्यम से सूचनाएं प्रसारित की जा रही हैं. 
हमलावर झूठी कहानियों को बढ़ाने के लिए सोशल बॉट्स तैनात करते हैं, संस्थानों में विश्वास को खत्म करने के लिए जनसांख्यिकी को लक्षित करते हैं, जैसा कि चुनाव हस्तक्षेप या कॉर्पोरेट बाइक लीश अभियानों में देखा गया है. ये प्रयास मतदाताओं को प्रभावित करके राजनीति में और घबराहट पैदा करने वाली अफवाहों के माध्यम से शेयरों को गिराकर बाजारों में फैलते हैं, जिससे हाइब्रिड युद्ध होता है.
हमलावर चाहे किसी भी लक्ष्य को निशाना बनाएं और कोई भी रणनीति अपनाएं, सोशल मीडिया युद्ध में सूचना को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की संभावनाएं व्यापक हैं: उदाहरण के लिए, अफवाहों, गलत या गोपनीय सूचनाओं और अन्य सामग्री को प्रभावशाली व्यक्तियों के आधिकारिक सोशल मीडिया खातों के माध्यम से फैलाना. इस तरह की ध्रुवीकरण करने वाली सामग्री, गलत सूचना या आरोपों को फैलाकर हमलावर तेजी से व्यापक जनसमूह तक पहुंच सकते हैं, विवाद को जन्म दे सकते हैं और यहां तक ​​कि पारंपरिक मीडिया का ध्यान भी आकर्षित कर सकते हैं.

जवाबी रणनीतियां

सरकारों और कंपनियों को बॉट्स और डीपफेक का पता लगाने के लिए AI-संचालित तकनीक में निवेश करना चाहिए, एल्गोरिदम पर प्लेटफॉर्म पारदर्शिता लागू करनी चाहिए, और आबादी को हेरफेर से बचाने के लिए डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना चाहिए. साइबर हमलों और साइबर क्राइम के लिए कड़े कानूनी प्रावधान करने चाहिए.  कार्यक्रमों के माध्यम से जनता को जागरूक करने का प्रयास करना चाहिये कि वो ऐसे ही बिना किसी ऑथेंटिक सोर्स से मिली सूचना या खबर पर भरोसा न करें.  

Shivangi Shukla

वर्तमान में शिवांगी शुक्ला इंडिया न्यूज़ के साथ कार्यरत हैं. हेल्थ, बॉलीवुड और लाइफ़स्टाइल विषयों पर लेखन में उन्हें विशेष रुचि और अनुभव है. इसके अलावा रिसर्च बेस्ड आर्टिकल और पॉलिटिकल कवरेज से जुड़े मुद्दों पर भी वे नियमित रूप से लेखन करती हैं. तथ्यपरक, सरल और पाठकों को जागरूक करने वाला कंटेंट तैयार करना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है. डिजिटल मीडिया में विश्वसनीय और प्रभावी पत्रकारिता को लेकर वे निरंतर अभ्यासरत हैं.

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