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Canada bill c-12 Kya Hai: हजारों भारतीय छात्रों पर लटकी डिपोर्टेशन की तलवार, जानें क्या है कनाडा का बिल C-12; पंजाब से लेकर गुजरात तक हड़कंप

कनाडा में ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन, इमिग्रेशन वकील और यूनियन ने इस कानून का कड़ा विरोध किया है. वे रिफ्यूजी को सही सुनवाई न मिलने, बिना किसी की जांच के लिए गए फैसलों, डिपोर्टेशन के बढ़ते रिस्क और इंटरनेशनल रिफ्यूजी ट्रीटी के संभावित उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल कनाडा और दूसरे ऑर्गनाइज़ेशन ने इसे "रिफ्यूजी अधिकारों में बड़ी गिरावट" बताया है.

Canada bill c-12: कनाडा की नई इमिग्रेशन नीति जिसे आमतौर पर “बिल C-12” कहा जा रहा है ने प्रवासी समुदायों में बड़ी चिंता पैदा कर दी है. खासकर पंजाब से गए छात्रों और शरणार्थियों के बीच डर का माहौल है. क्योंकि इस बिल से शरण का आवेदन करने वाले 30 हजार लोग प्रभावित हो सकते हैं. जिसमें से बड़ी संख्या में भारतीय हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि नियमों पर खरे न उतरने वाले लोगों को डिपोर्टेशन का सामना भी करना पड़ सकता है.

30000

क्या है बिल C-12?

स नए कानून को ‘कनाडा की इमिग्रेशन प्रणाली और सीमाओं को मज़बूत करने वाला अधिनियम’ (Strengthening Canada’s Immigration System and Borders Act) या ‘बिल C-12′ ​​कहा जाता है. इसे 26 मार्च, 2026 को शाही मंज़ूरी (Royal Assent) मिल गई है और यह बिल आधिकारिक तौर पर कानून बन गया है.

21 दिनों के भीतर देना होगा सबूत

कनाडा की इमिग्रेशन एजेंसी IRCC (Immigration, Refugees and Citizenship Canada) ने करीब 30,000 शरणार्थियों को प्रोसीजरल फेयरनेस नोटिस भेजे हैं. इन नोटिस का मतलब यह है कि उनके केस अब नए नियमों के तहत योग्य नहीं माने जा सकते.इनमें लगभग 9,000 लोग पंजाब से जुड़े छात्र और शरणार्थी बताए जा रहे हैं जो पहले स्टडी वीज़ा पर कनाडा गए थे.नोटिस मिलने के बाद लोगों को 21 दिनों के भीतर अतिरिक्त जानकारी या सबूत देने होंगे या फिर स्वेच्छा से कनाडा छोड़ने का विकल्प चुनना होगा. अगर कोई जवाब नहीं देता तो उसके खिलाफ डिपोर्टेशन (देश से बाहर निकालने) की प्रक्रिया शुरू हो सकती है.

बिल C-12 में क्या बदलाव हुए हैं

इस नए कानून के तहत कनाडा की शरण प्रणाली में कई बड़े बदलाव किए गए हैं.

  • सख्त समय सीमा: जो लोग कनाडा आने के एक साल बाद शरण मांगते हैं, उन्हें अब पूरी सुनवाई का अधिकार नहीं मिलेगा.
  • कम सुनवाई का मौका: कई मामलों में अब सीधे Immigration and Refugee Board में सुनवाई नहीं होगी, बल्कि केवल PRRA (Pre-Removal Risk Assessment) का विकल्प मिलेगा.
  • सरकार के अधिकार बढ़े: स्टडी वीज़ा, वर्क परमिट या रेजिडेंसी स्टेटस को सरकार कभी भी बदल या रद्द कर सकती है.
  • डेटा शेयरिंग: सरकार अब व्यक्तिगत जानकारी अन्य एजेंसियों और कुछ मामलों में विदेशी संस्थाओं के साथ भी साझा कर सकती है.

सरकार का कहना है कि ये बदलाव सिस्टम को मजबूत करने और गलत इस्तेमाल रोकने के लिए हैं, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इससे शरणार्थियों के अधिकार कमजोर होंगे.

इसका विरोध क्यों हो रहा है?

कनाडा में ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन, इमिग्रेशन वकील और यूनियन ने इस कानून का कड़ा विरोध किया है. वे रिफ्यूजी को सही सुनवाई न मिलने, बिना किसी की जांच के लिए गए फैसलों, डिपोर्टेशन के बढ़ते रिस्क और इंटरनेशनल रिफ्यूजी ट्रीटी के संभावित उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल कनाडा और दूसरे ऑर्गनाइज़ेशन ने इसे “रिफ्यूजी अधिकारों में बड़ी गिरावट” बताया है.

सरकार का क्या कहना है?

कनाडा सरकार का कहना है कि इमिग्रेशन सिस्टम पर बढ़ते दबाव को कंट्रोल करना ज़रूरी है. इसका मकसद कुछ मामलों में धोखाधड़ी और झूठे दावों को रोकना है, और सभी फैसले कनाडा के संविधान और इंटरनेशनल नियमों के तहत लिए जाएंगे. सरकार ने यह भी कहा है कि जिनके दावे खारिज हो जाते हैं, उनके पास अभी भी प्री-रिमूवल रिस्क असेसमेंट (PRRA) जैसे ऑप्शन मौजूद रहेंगे. इससे यह पता लगाया जाता है कि व्यक्ति को उसके देश वापस भेजना कितना सुरक्षित होगा.

क्या भारतीयों को सच में डिपोर्टेशन का खतरा है?

अभी, यह कानून किसी खास देश को टारगेट नहीं करता है, लेकिन कनाडा में बड़ी संख्या में भारतीय स्टूडेंट्स, वर्क परमिट होल्डर्स और असाइलम एप्लीकेंट्स को देखते हुए, इसके असर को लेकर चिंता जताई जा रही है. एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि ये बदलाव पुराने या पेंडिंग केस पर असर डाल सकते हैं और कुछ रिजेक्टेड असाइलम केस के लिए डिपोर्टेशन प्रोसेस को तेज़ कर सकते हैं.

Divyanshi Singh

दिव्यांशी सिंह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और पिछले 4 सालों से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। जियो-पॉलिटिक्स और स्पोर्टस में काम करने का लंबा अनुभव है।

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