राजघराने से ताल्लुक रखते थे एस डी बर्मन, फिर कैसे बने संगीत की दुनिया के बादशाह, मात्र 1 रुपये के लिए साहिर से हुई थी बहस
S.D Burman: संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनके बनाए गानों से नहीं होती बल्कि उनकी पूरी जिंदगी अपने आप में एक कहानी बन जाती है. सचिन देव बर्मन यानी एस.डी. बर्मन भी ऐसे ही संगीतकार थे. त्रिपुरा के राजघराने से ताल्लुक रखने वाले इस शख्स ने आराम और शाही जिंदगी के बजाय संगीत को चुना. आगे चलकर वही संगीत उनकी पहचान बना और हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली संगीतकारों में उनका नाम शामिल हुआ.
राजघराने से निकले तो आसान नहीं था सफर
एस.डी. बर्मन का जन्म 1906 में त्रिपुरा के शाही परिवार में हुआ था. परिवार की पृष्ठभूमि ऐसी थी कि उनके सामने आराम की जिंदगी के रास्ते खुले थे लेकिन उनका मन संगीत में बसता था. पिता से उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा मिली और आगे उन्होंने कई बड़े उस्तादों से प्रशिक्षण लिया. लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत और बंगाल की पारंपरिक धुनों का असर बाद में उनके संगीत की खास पहचान बना.
मुंबई पहुंचने के बाद स्ट्रगल
मुंबई पहुंचने के बाद भी उन्हें तुरंत सफलता नहीं मिली. फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. एक वक्त ऐसा भी आया जब वह मायानगरी से निराश होकर वापस कलकत्ता लौटने का मन बना चुके थे. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. आखिरकार 'बाजी' ने उनकी किस्मत बदल दी और देव आनंद, गुरु दत्त और साहिर लुधियानवी के साथ उनका शानदार दौर शुरू हुआ.
प्यार के लिए परिवार से भी दूरी
एस.डी. बर्मन की निजी जिंदगी भी उतनी ही दिलचस्प थी. उन्हें मीरा दासगुप्ता से प्यार हुआ, जो उनकी छात्रा रह चुकी थीं और खुद भी संगीत व लेखन से जुड़ी थीं. दोनों ने 1938 में शादी की. इस रिश्ते को लेकर दोनों परिवारों में आपत्ति थी. खासकर शाही परिवार में इस शादी को सहजता से स्वीकार नहीं किया गया. कई स्रोतों के मुताबिक, शादी के बाद एस.डी. बर्मन के अपने परिवार से रिश्ते टूट गए और उन्होंने अपनी विरासत से भी दूरी बना ली. मीरा सिर्फ उनकी जीवनसंगिनी नहीं थीं, बल्कि उनके संगीत सफर में सहयोगी भी बनीं. दोनों ने मिलकर संगीत को जिंदगी का केंद्र बनाया. बाद में उनके बेटे आर.डी. बर्मन ने भी संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई.
साहिर के साथ बनी जोड़ी
एस.डी. बर्मन और साहिर लुधियानवी की जोड़ी ने नौजवान, बाजी, जाल, टैक्सी ड्राइवर और प्यासा जैसी फिल्मों में यादगार संगीत दिया. दोनों की रचनात्मक साझेदारी ने फिल्मी गीतों को कहानी का अहम हिस्सा बना दिया. प्यासा में यह मेल अपने चरम पर दिखाई दिया. हालांकि प्यासा के बाद दोनों ने साथ काम करना बंद कर दिया. कहा जाता है कि उनके बीच कलात्मक और अनुबंध संबंधी मतभेद हो गए थे. साहिर चाहते थे कि गीतकार की भूमिका और उसके अधिकारों को संगीतकार से कम न समझा जाए.
एक रुपये के कारण हुई बहस
कहा जाता है कि साहिर ने लता मंगेशकर से एक रुपया ज्यादा फीस लेने की मांग की थी. यह एस.डी. बर्मन से उनका एक रुपये का विवाद नहीं था बल्कि गीतकार के सम्मान और मेहनत की कीमत को लेकर साहिर का अपना रुख था. इसी सोच के चलते उन्होंने गीतकारों के अधिकार और क्रेडिट के लिए भी आवाज उठाई.
संगीत बना सबसे बड़ी पहचान
एस.डी. बर्मन ने बाद में गाइड, बंदिनी, अराधना, काला पानी, टैक्सी ड्राइवर जैसी फिल्मों के जरिए अपनी अलग शैली कायम की. वह शाही परिवार से आए जरूर थे, लेकिन उनकी असली पहचान राजघराने से नहीं बल्कि संगीत से बनी. जिस व्यक्ति ने कभी संगीत के लिए शाही विरासत से दूरी बनाई थी, उसी ने आगे चलकर ऐसा संगीत रचा कि कई पीढ़ियों के कलाकार उनसे प्रभावित हुए.