Khan Sir Mother: अपनी माँ के एक सपने को पूरा करने के लिए खान सर ने उठाया ऐसा कदम, जिसने गरीब मरीजों की उम्मीद जगा दी है. आखिर क्या है इस अस्पताल की सच्चाई? जानिए...
मां से प्रेरणा लेकर खान सर ने खोला सबसे सस्ता अस्पताल(अस्पताल की तस्वीर काल्पनिक है)
Khan Sir Patna: देश के मशहूर शिक्षक खान सर ने अपनी माँ के उस सपने को हकीकत में बदला, जिसमें वो हर किसी को सस्ता इलाज दिलाना चाहती थीं, खान सर ने पटना में एक ऐसा ही अस्पताल शुरू किया है जहाँ जांच और इलाज के दाम सुनकर यकीन करना मुश्किल होता है. खान सर जो शिक्षा के क्षेत्र में अपना काफी नाम बना चुके हैं अब स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बड़ा काम किया है. जब खान सर से अस्पताल खोलने के पीछे की प्रेरणा के बारे में पूछे गया था, तब उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी माँ की इस सोच से प्रेरणा मिली कि पैसे की कमी के कारण किसी को भी मेडिकल इलाज से वंचित नहीं रहना चाहिए.
आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें कि खान सर का अस्पताल इसी साल जनवरी के आखिरी सप्ताह में खुली है. खबरों की मानें तो इस अस्पताल में ब्लड टेस्ट सिर्फ 7 रुपये में और ECG मात्र 25 रुपये में हो रहा है. खान सर ने खुद पटना प्रेस से कहा, “हमारा मकसद है कि इलाज की कमी से कोई पीछे न छूटे. यहाँ इलाज सरकारी अस्पतालों से भी सस्ता होगा. इस अस्पताल में न सिर्फ एक हाई-टेक डायलिसिस यूनिट शुरू हो चुकी है, बल्कि आने वाले समय में यहाँ ब्लड बैंक और कैंसर के इलाज की भी तैयारी है. रिपोर्ट कहती है कि यहाँ डायलिसिस और बेसिक सर्जरी का खर्च सरकारी अस्पतालों से भी कम बैठने वाला है.
अस्पताल की एक दिलचस्प बात इसका ऑपरेशन थिएटर (OT) है. खान सर ने वहाँ चमकने वाली टाइलें लगाने से मना कर दिया. उनका कहना है कि ‘जब दो टाइलें जुड़ती हैं, तो उनके बीच की बारीक दरार में बैक्टीरिया और वायरस अपना घर बना लेते हैं. एक राई के दाने जितनी जगह में भी हज़ारों कीटाणु हो सकते हैं.’ इसीलिए, पूरे OT में खास तरह के ‘एंटी-इंफेक्शन मैट’ लगाए गए हैं जो बिल्कुल मार्बल जैसे दिखते हैं.
भारत में मिडिल क्लास और गरीब परिवारों के लिए मेडिकल बिल किसी सदमे से कम नहीं होते. टेस्ट, दवाइयां, डॉक्टर की फीस और बेड का खर्चा इतनी जल्दी बढ़ता है कि इंसान की जमा-पूंजी खत्म हो जाती है. जब पैसा नहीं होता, तो लोग फैसले बदलने पर मजबूर हो जाते हैं. माता-पिता जरूरी टेस्ट नहीं करवाते, बुजुर्ग डॉक्टर के पास दोबारा जाने से बचते हैं और कई मरीज तो पैसे बचाने के चक्कर में दवाइयां तक कम कर देते हैं। ऐसे में इलाज ‘हक’ नहीं, बल्कि ‘हिसाब-किताब’ बन जाता है.
बिहार और आसपास के राज्यों में खान सर आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. उन्होंने किसी रसूख या बड़े कॉलेज की डिग्री के दम पर अपनी पहचान नहीं बनाई. उन्होंने सिखाया कि पढ़ाया कैसे जाता है बिल्कुल देसी अंदाज़ में, बिना किसी फालतू बात के. जहाँ बाकी कोचिंग सेंटर किताबी और उबाऊ लगते थे, खान सर ने पढ़ाई को मजेदार बना दिया.
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