Mount Abu Shankar Math History: राजस्थान का माउंट आबू अपनी खूबसूरत वादियों, झीलों और धार्मिक स्थलों के लिए मशहूर है. अरावली पर्वतमाला के बीच बसे इस हिल स्टेशन पर एक ऐसा शिव मंदिर भी है, जिसकी बनावट पहली नजर में ही लोगों का ध्यान खींच लेती है. आमतौर पर मंदिरों के ऊपर गुंबद या पारंपरिक शिखर दिखाई देते हैं, लेकिन माउंट आबू के शंकर मठ में मंदिर का शिखर ही शिवलिंग और उसकी जलहरी के आकार में तैयार किया गया है. यहां गर्भगृह में स्थापित विशाल शिवलिंग भी इस स्थान को खास पहचान देता है.
इस मंदिर को अरवुडा विश्वनाथ महादेव के नाम से जाना जाता है. यहां स्थापित शिवलिंग एक ही विशाल पत्थर को तराशकर बनाया गया है. पर्यटन से जुड़ी जानकारियों के मुताबिक, इसकी ऊंचाई करीब 9.5 फीट, चौड़ाई 7.5 फीट और वजन लगभग 27 टन है. यही वजह है कि शंकर मठ को माउंट आबू के प्रमुख धार्मिक आकर्षणों में गिना जाता है.
1960 के दशक में रखी गई थी शंकर मठ की नींव
शंकर मठ का इतिहास 1960 से 1962 के बीच शुरू होता है. मठ की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, स्वामी महेशानंद गिरि महाराज ने माउंट आबू में एक पुराने मकान को खरीदकर उसे श्री शंकर मठ का नाम दिया था. उस समय यह जगह आबादी से कुछ दूर और हरियाली से घिरी हुई थी. यहां साधु-संतों के रहने, पूजा-पाठ और वेदांत के अध्ययन की व्यवस्था शुरू हुई.
वर्ष 1965 के बाद यहां संतों का स्थायी रूप से रहना संभव हो पाया. इसके बाद 1975 में परिसर में बड़े शिव मंदिर का निर्माण शुरू किया गया. यह मंदिर 1977 में बनकर तैयार हुआ और उसी वर्ष यहां अरवुडा विश्वनाथ महादेव की प्रतिष्ठा की गई. मंदिर के निर्माण के बाद मठ में साधना, धार्मिक प्रवचन और पूजा-पाठ की गतिविधियां लगातार चलती रहीं.
27 टन का विशाल शिवलिंग है मुख्य आकर्षण
शंकर मठ के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल है. यह करीब 9.5 फीट ऊंचा और 7.5 फीट चौड़ा बताया जाता है. इसका वजन लगभग 27 टन है. इसे एक ही बड़े पत्थर को तराशकर तैयार किया गया है.
इस शिवलिंग पर भगवान शिव की तीसरी आंख और जटाओं जैसी आकृतियां दिखाई देती हैं. स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पत्थर को तराशने के दौरान ये आकृतियां स्वाभाविक रूप से उभर आई थीं. श्रद्धालु इन्हें भगवान शिव के स्वरूप से जोड़कर देखते हैं. हालांकि, इन आकृतियों के अपने आप बनने की बात को धार्मिक मान्यता के रूप में ही समझना चाहिए.
मंदिर का शिखर भी शिवलिंग की तरह
शंकर मठ की वास्तुकला इसे दूसरे शिव मंदिरों से अलग बनाती है. मंदिर के शिखर को सामान्य गुंबद की तरह बनाने के बजाय शिवलिंग और जलहरी के आकार में तैयार किया गया है. मठ की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, स्वामी महेशानंद गिरि महाराज की इच्छा थी कि मंदिर को दूर से देखने पर भी श्रद्धालुओं को भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग का दर्शन हो सके.
इसी विचार के आधार पर मंदिर के शिखर की बनावट तय की गई. मंदिर की बाहरी दीवारों पर जोधपुर के छीत्तर पत्थर का इस्तेमाल किया गया है. इस तरह इसकी वास्तुकला में धार्मिक प्रतीक और पारंपरिक पत्थरकारी का सुंदर मेल देखने को मिलता है.
कमल तालाब और रुद्राक्ष के पेड़ बढ़ाते हैं सुंदरता
मंदिर परिसर में हरियाली और शांत वातावरण इसकी खूबसूरती को और बढ़ाते हैं. यहां कमल के फूलों वाला छोटा तालाब और रुद्राक्ष के पेड़ भी मौजूद हैं. श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के साथ कुछ समय शांत वातावरण में बिता सकते हैं. मठ में संतों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए भी व्यवस्था विकसित की गई है. वर्ष 1986-87 में यहां एक बड़ा आवासीय भवन बनाया गया था. बाद में 2003 में पास का एक मकान खरीदकर उसे शंकर धाम के रूप में विकसित किया गया.
पूजा-पाठ और आरती की परंपरा
शंकर मठ में पूजा के साथ वेदांत और उपनिषदों के अध्ययन की परंपरा भी रही है. मठ की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यहां नियमित स्वाध्याय और धार्मिक गतिविधियां संचालित होती हैं. पर्यटन से जुड़ी जानकारियों में मंदिर में दिन में तीन बार आरती और सोमवार को विशेष भस्म आरती का उल्लेख मिलता है. सावन और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है.
माउंट आबू आने वाले पर्यटक अगर प्राकृतिक सुंदरता के साथ किसी शांत धार्मिक स्थल को भी देखना चाहते हैं, तो शंकर मठ उनके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है. इसकी खासियत सिर्फ विशाल शिवलिंग नहीं, बल्कि मंदिर की पूरी बनावट है, जहां शिखर से लेकर गर्भगृह तक भगवान शिव की उपासना का भाव दिखाई देता है.