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Home > धर्म > सूर्यास्त के बाद क्यों नहीं किया जाता अंतिम संस्कार? गरुड़ पुराण में बताए गए नियम और इसके पीछे की धार्मिक मान्यता

सूर्यास्त के बाद क्यों नहीं किया जाता अंतिम संस्कार? गरुड़ पुराण में बताए गए नियम और इसके पीछे की धार्मिक मान्यता

Cremation after sunset rules: गरुड़ पुराण के अनुसार सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करने से बचने की सलाह दी गई है. धार्मिक मान्यता है कि दिन के समय दाह संस्कार करने से आत्मा की शांति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है. यदि रात में मृत्यु हो जाए तो अगले दिन सूर्योदय के बाद अंतिम संस्कार करना शुभ माना जाता है.

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Last Updated: August 7, 2026 14:09:31 IST

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Cremation after sunset rules: हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार का विशेष महत्व बताया गया है. इनमें अंतिम संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण संस्कारों में माना जाता है. अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में हो जाए तो उसका अंतिम संस्कार तुरंत क्यों नहीं किया जाता? गरुड़ पुराण में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है. इसमें सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार न करने के धार्मिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं. आइए जानते हैं इस परंपरा के पीछे की मान्यताएं और इससे जुड़े नियम.

क्यों वर्जित माना गया है रात्रि में अंतिम संस्कार?

गरुड़ पुराण के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु सूर्यास्त के बाद होती है, तो उसका अंतिम संस्कार अगले दिन सूर्योदय के बाद करना उचित माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि रात के समय दाह संस्कार करने से मृत आत्मा को परलोक की यात्रा में कष्टों का सामना करना पड़ सकता है. इसी कारण सनातन परंपरा में दिन के समय अंतिम संस्कार करने की परंपरा चली आ रही है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार किया जाता है, तो आत्मा की मोक्ष यात्रा में बाधा आ सकती है. कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि ऐसा करने पर अगले जन्म में व्यक्ति को शारीरिक कष्ट या किसी प्रकार की कमी का सामना करना पड़ सकता है. यही कारण है कि अंतिम संस्कार के लिए दिन का समय अधिक शुभ माना जाता है.

सूर्य का अंतिम संस्कार से क्या संबंध माना गया है?

हिंदू धर्म में सूर्य को आत्मा का प्रतीक और जीवन ऊर्जा का स्रोत माना गया है. मान्यता है कि आत्मा का संबंध सूर्य से है और अंततः उसी दिव्य चेतना में उसका विलय होता है. इसलिए सूर्य की उपस्थिति में किए गए अंतिम संस्कार को आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए अधिक शुभ माना जाता है.

सूर्यास्त के बाद क्यों बढ़ जाती है सावधानी?

गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है कि सूर्यास्त के बाद नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने की मान्यता है. इसी वजह से रात्रि में दाह संस्कार से बचने की सलाह दी जाती है. धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि ऐसे समय आत्मा की यात्रा प्रभावित हो सकती है, इसलिए अगले दिन तक प्रतीक्षा करना उचित माना गया है.

यदि रात में मृत्यु हो जाए तो क्या करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का निधन रात में हो जाए, तो शव को सम्मानपूर्वक सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है. कई परंपराओं में तुलसी के समीप दीपक जलाने और मृतक के पास परिवार के किसी सदस्य के उपस्थित रहने की मान्यता है. साथ ही भगवान के नाम का स्मरण और आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने का भी विशेष महत्व बताया गया है.

अंतिम संस्कार क्यों माना जाता है सबसे महत्वपूर्ण संस्कार?

सनातन धर्म में कुल 16 संस्कार बताए गए हैं, जिनमें अंतिम संस्कार जीवन की अंतिम धार्मिक प्रक्रिया है. मान्यता है कि दाह संस्कार के माध्यम से शरीर पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—में विलीन हो जाता है. इसे आत्मा को शरीर के बंधन से मुक्त कर उसकी आगे की यात्रा का मार्ग प्रशस्त करने वाला संस्कार माना गया है. धार्मिक परंपराओं में साधु-संतों के लिए अलग व्यवस्था बताई गई है. कई संप्रदायों में उन्हें दाह संस्कार के स्थान पर समाधि दी जाती है, क्योंकि उनका जीवन तप, साधना और वैराग्य से जुड़ा माना जाता है.

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Cremation after sunset rules: हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार का विशेष महत्व बताया गया है. इनमें अंतिम संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण संस्कारों में माना जाता है. अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में हो जाए तो उसका अंतिम संस्कार तुरंत क्यों नहीं किया जाता? गरुड़ पुराण में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है. इसमें सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार न करने के धार्मिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं. आइए जानते हैं इस परंपरा के पीछे की मान्यताएं और इससे जुड़े नियम.

क्यों वर्जित माना गया है रात्रि में अंतिम संस्कार?

गरुड़ पुराण के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु सूर्यास्त के बाद होती है, तो उसका अंतिम संस्कार अगले दिन सूर्योदय के बाद करना उचित माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि रात के समय दाह संस्कार करने से मृत आत्मा को परलोक की यात्रा में कष्टों का सामना करना पड़ सकता है. इसी कारण सनातन परंपरा में दिन के समय अंतिम संस्कार करने की परंपरा चली आ रही है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार किया जाता है, तो आत्मा की मोक्ष यात्रा में बाधा आ सकती है. कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि ऐसा करने पर अगले जन्म में व्यक्ति को शारीरिक कष्ट या किसी प्रकार की कमी का सामना करना पड़ सकता है. यही कारण है कि अंतिम संस्कार के लिए दिन का समय अधिक शुभ माना जाता है.

सूर्य का अंतिम संस्कार से क्या संबंध माना गया है?

हिंदू धर्म में सूर्य को आत्मा का प्रतीक और जीवन ऊर्जा का स्रोत माना गया है. मान्यता है कि आत्मा का संबंध सूर्य से है और अंततः उसी दिव्य चेतना में उसका विलय होता है. इसलिए सूर्य की उपस्थिति में किए गए अंतिम संस्कार को आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए अधिक शुभ माना जाता है.

सूर्यास्त के बाद क्यों बढ़ जाती है सावधानी?

गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है कि सूर्यास्त के बाद नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने की मान्यता है. इसी वजह से रात्रि में दाह संस्कार से बचने की सलाह दी जाती है. धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि ऐसे समय आत्मा की यात्रा प्रभावित हो सकती है, इसलिए अगले दिन तक प्रतीक्षा करना उचित माना गया है.

यदि रात में मृत्यु हो जाए तो क्या करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का निधन रात में हो जाए, तो शव को सम्मानपूर्वक सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है. कई परंपराओं में तुलसी के समीप दीपक जलाने और मृतक के पास परिवार के किसी सदस्य के उपस्थित रहने की मान्यता है. साथ ही भगवान के नाम का स्मरण और आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने का भी विशेष महत्व बताया गया है.

अंतिम संस्कार क्यों माना जाता है सबसे महत्वपूर्ण संस्कार?

सनातन धर्म में कुल 16 संस्कार बताए गए हैं, जिनमें अंतिम संस्कार जीवन की अंतिम धार्मिक प्रक्रिया है. मान्यता है कि दाह संस्कार के माध्यम से शरीर पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—में विलीन हो जाता है. इसे आत्मा को शरीर के बंधन से मुक्त कर उसकी आगे की यात्रा का मार्ग प्रशस्त करने वाला संस्कार माना गया है. धार्मिक परंपराओं में साधु-संतों के लिए अलग व्यवस्था बताई गई है. कई संप्रदायों में उन्हें दाह संस्कार के स्थान पर समाधि दी जाती है, क्योंकि उनका जीवन तप, साधना और वैराग्य से जुड़ा माना जाता है.

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