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Home > धर्म > नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा, मंगल दोष से मुक्ति के लिए करें ये उपाय, जानें पूजा विधि

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा, मंगल दोष से मुक्ति के लिए करें ये उपाय, जानें पूजा विधि

Maa Chandraghanta Puja: शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन 13 अक्टूबर को मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाएगी. देवी के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है और उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की आराधना से साहस, आत्मविश्वास और निर्भयता का भाव बढ़ता है. ज्योतिषीय मान्यताओं में उनका संबंध मंगल ग्रह से बताया जाता है. इस दिन लाल फूल, लाल चुनरी और दूध से बनी मिठाई अर्पित करने की परंपरा है. जानें मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंगल दोष से जुड़े उपाय, मंत्र और देवी की पौराणिक कथा.

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Last Updated: October 12, 2026 23:21:07 IST

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Maa Chandraghanta Puja: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना का विधान है. इस बार 13 अक्टूबर को भक्त देवी के इस स्वरूप की पूजा करेंगे. मां चंद्रघंटा को साहस, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि उनकी उपासना करने से मन में आत्मविश्वास बढ़ता है और व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा मंगल ग्रह से जुड़ी समस्याओं और मंगल दोष के निवारण के लिए भी की जाती है. आइए जानते हैं पूजा की विधि, मंत्र, उपाय और मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा.

मां चंद्रघंटा के स्वरूप का क्या है महत्व?

मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप को चंद्रघंटा कहा जाता है. उनके मस्तक पर अर्धचंद्र घंटे के आकार में सुशोभित है, इसी कारण उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा. देवी के दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए स्वरूप का वर्णन मिलता है. उनका वाहन सिंह है. देवी का यह रूप शक्ति और सौम्यता के अद्भुत मेल का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा करने से भय और नकारात्मक भावनाओं पर काबू पाने की प्रेरणा मिलती है. भक्त देवी से साहस, आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती की कामना करते हैं. नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी आराधना विशेष श्रद्धा के साथ की जाती है.

मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें?

नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके मां चंद्रघंटा के सामने दीपक जलाएं और व्रत-पूजा का संकल्प लें. देवी को लाल फूल, रक्त चंदन और लाल चुनरी अर्पित करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक मां की पूजा करें और उनके मंत्रों का जाप करें. मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाने की परंपरा है. कुछ मान्यताओं में हलवा और मेवे भी अर्पित किए जाते हैं. पूजा के बाद देवी को लगाया गया भोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करें और परिवार के अन्य सदस्यों में भी बांटें. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा से मन को शांति मिलती है.

मंगल दोष से जुड़े उपायों के लिए करें मां की आराधना

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा का संबंध मंगल ग्रह से माना जाता है. कुंडली में मंगल कमजोर होने या मंगल दोष होने पर इस दिन देवी की पूजा करना शुभ माना जाता है. इसके लिए मां चंद्रघंटा को लाल फूल अर्पित करें और लाल वस्त्र पहनकर श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना करें. मान्यता के अनुसार, देवी को तांबे का सिक्का या तांबे की कोई वस्तु अर्पित करना भी शुभ माना जाता है. इसके बाद मां को हलवा या मेवे का भोग लगाएं. पूजा के दौरान देवी का ध्यान करते हुए मंत्रों का जाप करें. इसके बाद मंगल ग्रह के मंत्र ‘ॐ अं अंगारकाय नमः’ का जाप कर सकते हैं. ध्यान रखें कि ये उपाय धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं; इनके परिणाम की कोई वैज्ञानिक गारंटी नहीं है.

मां चंद्रघंटा की पूजा में किन मंत्रों का करें जाप?

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना करते समय भक्त देवी के ध्यान और स्तुति मंत्रों का जाप कर सकते हैं. मंगल ग्रह से जुड़ी ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मंगल मंत्र का जाप भी किया जाता है. मंगल मंत्र: ॐ अं अंगारकाय नमः. मंत्र जाप के दौरान मन को शांत रखें और मां दुर्गा के इस स्वरूप का ध्यान करें. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक की गई आराधना से भक्तों को मानसिक बल और सकारात्मकता की अनुभूति होती है.

मां चंद्रघंटा ने कैसे किया महिषासुर का संहार?

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय देवताओं और दैत्य राजा महिषासुर के बीच भीषण युद्ध हुआ. इस युद्ध में देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा. महिषासुर ने इंद्र का सिंहासन छीन लिया और स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया. संकट में पड़े देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे और उनसे सहायता की प्रार्थना की. कथा के अनुसार, देवताओं की स्थिति देखकर त्रिदेवों से दिव्य ऊर्जा प्रकट हुई, जिससे एक शक्तिशाली देवी का आविर्भाव हुआ. देवी के दस हाथों को विभिन्न देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित किया गया. भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र और इंद्र ने अपना वज्र प्रदान किया. सूर्य देव से भी उन्हें दिव्य तेज प्राप्त हुआ. इसके बाद देवी ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर और उसकी सेना से युद्ध किया. पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी ने महिषासुर का संहार कर देवताओं को उसके भय से मुक्त कराया. मां चंद्रघंटा का यह स्वरूप बुराई पर अच्छाई की जीत, साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है. नवरात्रि के तीसरे दिन भक्त इसी शक्ति स्वरूप की पूजा कर सुख, शांति और निर्भयता की कामना करते हैं.

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Maa Chandraghanta Puja: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना का विधान है. इस बार 13 अक्टूबर को भक्त देवी के इस स्वरूप की पूजा करेंगे. मां चंद्रघंटा को साहस, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि उनकी उपासना करने से मन में आत्मविश्वास बढ़ता है और व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा मंगल ग्रह से जुड़ी समस्याओं और मंगल दोष के निवारण के लिए भी की जाती है. आइए जानते हैं पूजा की विधि, मंत्र, उपाय और मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा.

मां चंद्रघंटा के स्वरूप का क्या है महत्व?

मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप को चंद्रघंटा कहा जाता है. उनके मस्तक पर अर्धचंद्र घंटे के आकार में सुशोभित है, इसी कारण उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा. देवी के दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए स्वरूप का वर्णन मिलता है. उनका वाहन सिंह है. देवी का यह रूप शक्ति और सौम्यता के अद्भुत मेल का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा करने से भय और नकारात्मक भावनाओं पर काबू पाने की प्रेरणा मिलती है. भक्त देवी से साहस, आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती की कामना करते हैं. नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी आराधना विशेष श्रद्धा के साथ की जाती है.

मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें?

नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके मां चंद्रघंटा के सामने दीपक जलाएं और व्रत-पूजा का संकल्प लें. देवी को लाल फूल, रक्त चंदन और लाल चुनरी अर्पित करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक मां की पूजा करें और उनके मंत्रों का जाप करें. मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाने की परंपरा है. कुछ मान्यताओं में हलवा और मेवे भी अर्पित किए जाते हैं. पूजा के बाद देवी को लगाया गया भोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करें और परिवार के अन्य सदस्यों में भी बांटें. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा से मन को शांति मिलती है.

मंगल दोष से जुड़े उपायों के लिए करें मां की आराधना

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा का संबंध मंगल ग्रह से माना जाता है. कुंडली में मंगल कमजोर होने या मंगल दोष होने पर इस दिन देवी की पूजा करना शुभ माना जाता है. इसके लिए मां चंद्रघंटा को लाल फूल अर्पित करें और लाल वस्त्र पहनकर श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना करें. मान्यता के अनुसार, देवी को तांबे का सिक्का या तांबे की कोई वस्तु अर्पित करना भी शुभ माना जाता है. इसके बाद मां को हलवा या मेवे का भोग लगाएं. पूजा के दौरान देवी का ध्यान करते हुए मंत्रों का जाप करें. इसके बाद मंगल ग्रह के मंत्र ‘ॐ अं अंगारकाय नमः’ का जाप कर सकते हैं. ध्यान रखें कि ये उपाय धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं; इनके परिणाम की कोई वैज्ञानिक गारंटी नहीं है.

मां चंद्रघंटा की पूजा में किन मंत्रों का करें जाप?

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना करते समय भक्त देवी के ध्यान और स्तुति मंत्रों का जाप कर सकते हैं. मंगल ग्रह से जुड़ी ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मंगल मंत्र का जाप भी किया जाता है. मंगल मंत्र: ॐ अं अंगारकाय नमः. मंत्र जाप के दौरान मन को शांत रखें और मां दुर्गा के इस स्वरूप का ध्यान करें. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक की गई आराधना से भक्तों को मानसिक बल और सकारात्मकता की अनुभूति होती है.

मां चंद्रघंटा ने कैसे किया महिषासुर का संहार?

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय देवताओं और दैत्य राजा महिषासुर के बीच भीषण युद्ध हुआ. इस युद्ध में देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा. महिषासुर ने इंद्र का सिंहासन छीन लिया और स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया. संकट में पड़े देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे और उनसे सहायता की प्रार्थना की. कथा के अनुसार, देवताओं की स्थिति देखकर त्रिदेवों से दिव्य ऊर्जा प्रकट हुई, जिससे एक शक्तिशाली देवी का आविर्भाव हुआ. देवी के दस हाथों को विभिन्न देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित किया गया. भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र और इंद्र ने अपना वज्र प्रदान किया. सूर्य देव से भी उन्हें दिव्य तेज प्राप्त हुआ. इसके बाद देवी ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर और उसकी सेना से युद्ध किया. पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी ने महिषासुर का संहार कर देवताओं को उसके भय से मुक्त कराया. मां चंद्रघंटा का यह स्वरूप बुराई पर अच्छाई की जीत, साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है. नवरात्रि के तीसरे दिन भक्त इसी शक्ति स्वरूप की पूजा कर सुख, शांति और निर्भयता की कामना करते हैं.

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