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Home > धर्म > Shardiya Navratri 2026: नवरात्र में कलश स्थापना के बाद भूलकर भी न करें ये गलतियां, घटस्थापना के बाद इन 5 बातों का रखें खास ध्यान

Shardiya Navratri 2026: नवरात्र में कलश स्थापना के बाद भूलकर भी न करें ये गलतियां, घटस्थापना के बाद इन 5 बातों का रखें खास ध्यान

Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर 2026 से शुरू हो रहे हैं. पहले दिन घटस्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा आरंभ होगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश स्थापना के बाद पूजा स्थल की सफाई, अखंड ज्योत की सुरक्षा, सात्विक खानपान और घर में शांत वातावरण बनाए रखने का ध्यान रखना चाहिए.

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Last Updated: October 10, 2026 15:48:49 IST

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Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना की शुरुआत घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ होती है. इस साल नवरात्र 11 अक्टूबर 2026 से शुरू हो रहे हैं. पहले दिन घरों और मंदिरों में कलश स्थापना के साथ पूजा-अर्चना की जाएगी. नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में पूजा-पाठ के साथ स्वच्छता, संयम और सात्विक दिनचर्या को भी महत्व दिया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घटस्थापना के बाद कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए. अखंड ज्योत की सुरक्षा से लेकर पूजा स्थल की साफ-सफाई और खानपान तक, कुछ सावधानियां पूजा के दौरान जरूरी मानी जाती हैं. आइए जानते हैं कि नवरात्र में कलश स्थापना के बाद किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

अखंड ज्योत जलाई है तो सुरक्षा का रखें ध्यान

नवरात्र के दौरान कई घरों में नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, अखंड ज्योत को देवी की उपासना से जोड़कर देखा जाता है. अगर घर में अखंड ज्योत जलाई गई है, तो उसकी सुरक्षा के लिए उचित व्यवस्था करना जरूरी है. दीपक को ऐसी जगह रखें, जहां उसके आसपास कपड़े, कागज या ज्वलनशील सामान न हों. हवा से लौ बुझने या आग फैलने का खतरा भी ध्यान में रखें. खासकर घर में बच्चे या पालतू जानवर हों, तो दीपक को उनकी पहुंच से दूर रखना चाहिए. अखंड ज्योत की देखभाल के लिए पहले से व्यवस्था करना बेहतर रहता है.

घटस्थापना के बाद घर और पूजा स्थल को न छोड़ें गंदा

कलश स्थापना के बाद पूजा स्थल की नियमित साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है. कलश के आसपास गंदगी जमा न होने दें और पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को व्यवस्थित रखें. फूल, अक्षत, जल और अन्य पूजन सामग्री को साफ जगह पर रखें, ताकि पूजा के दौरान अव्यवस्था न हो. धार्मिक मान्यताओं में स्वच्छता को पूजा का अहम हिस्सा माना गया है. इसी वजह से नवरात्र के नौ दिनों में घर के साथ-साथ पूजा स्थल को भी साफ-सुथरा रखने पर जोर दिया जाता है.

नवरात्र में सात्विक भोजन को दिया जाता है महत्व

नवरात्र के दौरान कई श्रद्धालु व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग सामान्य भोजन करते हुए भी पूजा-पाठ और सात्विक दिनचर्या का पालन करते हैं. धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इन नौ दिनों में मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन से परहेज करने की सलाह दी जाती है. व्रत रखने वाले लोग अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या व्रत में खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं. मान्यता है कि संयमित खानपान से मन को शांत रखने और पूजा में ध्यान लगाने में मदद मिलती है. हालांकि, खानपान से जुड़े नियम अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं.

गुस्सा, विवाद और अपशब्दों से बचने की दी जाती है सलाह

नवरात्र को मां दुर्गा की आराधना और आत्मसंयम का पर्व माना जाता है. इस दौरान परिवार में शांतिपूर्ण और सकारात्मक माहौल बनाए रखने की सलाह दी जाती है. छोटी-छोटी बातों पर बहस करना, गुस्सा करना या दूसरों को अपशब्द कहना पूजा के भाव के अनुकूल नहीं माना जाता. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शांत मन से की गई पूजा में एकाग्रता बनाए रखना आसान होता है. इसलिए इन नौ दिनों में परिवार के सदस्यों के साथ प्रेम और सद्भाव बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए.

कलश के आसपास न रखें अनावश्यक सामान

घटस्थापना के लिए पूजा स्थल पर साफ और व्यवस्थित जगह चुनना बेहतर रहता है. कलश के आसपास अनावश्यक सामान रखने से बचें और पूजा की सभी जरूरी चीजें पहले से एकत्रित कर लें. कलश स्थापना में जल से भरा कलश, आम या अशोक के पत्ते, नारियल, अक्षत, मौली और फूल जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. कई घरों में कलश के साथ मिट्टी में जौ बोने की परंपरा भी है. जौ के अंकुरों को धार्मिक मान्यताओं में शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. पूजा की सामग्री व्यवस्थित रहने से रोजाना पूजा करना भी आसान होता है.

कलश स्थापना से शुरू होती है नौ दिनों की पूजा

घटस्थापना को कलश स्थापना भी कहा जाता है. इसे शारदीय नवरात्र के पहले दिन किया जाता है और धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस विधि के माध्यम से मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है. इसके साथ ही नौ दिनों की पूजा-अर्चना शुरू होती है. इस साल शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू हो रहे हैं. कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त शहर और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है, इसलिए पूजा से पहले अपने क्षेत्र के पंचांग से समय की पुष्टि कर लेना उचित है. अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि में भी अंतर हो सकता है. ऐसे में अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा करना बेहतर रहता है.

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Last Updated: October 10, 2026 15:48:49 IST

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Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना की शुरुआत घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ होती है. इस साल नवरात्र 11 अक्टूबर 2026 से शुरू हो रहे हैं. पहले दिन घरों और मंदिरों में कलश स्थापना के साथ पूजा-अर्चना की जाएगी. नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में पूजा-पाठ के साथ स्वच्छता, संयम और सात्विक दिनचर्या को भी महत्व दिया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घटस्थापना के बाद कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए. अखंड ज्योत की सुरक्षा से लेकर पूजा स्थल की साफ-सफाई और खानपान तक, कुछ सावधानियां पूजा के दौरान जरूरी मानी जाती हैं. आइए जानते हैं कि नवरात्र में कलश स्थापना के बाद किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

अखंड ज्योत जलाई है तो सुरक्षा का रखें ध्यान

नवरात्र के दौरान कई घरों में नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, अखंड ज्योत को देवी की उपासना से जोड़कर देखा जाता है. अगर घर में अखंड ज्योत जलाई गई है, तो उसकी सुरक्षा के लिए उचित व्यवस्था करना जरूरी है. दीपक को ऐसी जगह रखें, जहां उसके आसपास कपड़े, कागज या ज्वलनशील सामान न हों. हवा से लौ बुझने या आग फैलने का खतरा भी ध्यान में रखें. खासकर घर में बच्चे या पालतू जानवर हों, तो दीपक को उनकी पहुंच से दूर रखना चाहिए. अखंड ज्योत की देखभाल के लिए पहले से व्यवस्था करना बेहतर रहता है.

घटस्थापना के बाद घर और पूजा स्थल को न छोड़ें गंदा

कलश स्थापना के बाद पूजा स्थल की नियमित साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है. कलश के आसपास गंदगी जमा न होने दें और पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को व्यवस्थित रखें. फूल, अक्षत, जल और अन्य पूजन सामग्री को साफ जगह पर रखें, ताकि पूजा के दौरान अव्यवस्था न हो. धार्मिक मान्यताओं में स्वच्छता को पूजा का अहम हिस्सा माना गया है. इसी वजह से नवरात्र के नौ दिनों में घर के साथ-साथ पूजा स्थल को भी साफ-सुथरा रखने पर जोर दिया जाता है.

नवरात्र में सात्विक भोजन को दिया जाता है महत्व

नवरात्र के दौरान कई श्रद्धालु व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग सामान्य भोजन करते हुए भी पूजा-पाठ और सात्विक दिनचर्या का पालन करते हैं. धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इन नौ दिनों में मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन से परहेज करने की सलाह दी जाती है. व्रत रखने वाले लोग अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या व्रत में खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं. मान्यता है कि संयमित खानपान से मन को शांत रखने और पूजा में ध्यान लगाने में मदद मिलती है. हालांकि, खानपान से जुड़े नियम अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं.

गुस्सा, विवाद और अपशब्दों से बचने की दी जाती है सलाह

नवरात्र को मां दुर्गा की आराधना और आत्मसंयम का पर्व माना जाता है. इस दौरान परिवार में शांतिपूर्ण और सकारात्मक माहौल बनाए रखने की सलाह दी जाती है. छोटी-छोटी बातों पर बहस करना, गुस्सा करना या दूसरों को अपशब्द कहना पूजा के भाव के अनुकूल नहीं माना जाता. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शांत मन से की गई पूजा में एकाग्रता बनाए रखना आसान होता है. इसलिए इन नौ दिनों में परिवार के सदस्यों के साथ प्रेम और सद्भाव बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए.

कलश के आसपास न रखें अनावश्यक सामान

घटस्थापना के लिए पूजा स्थल पर साफ और व्यवस्थित जगह चुनना बेहतर रहता है. कलश के आसपास अनावश्यक सामान रखने से बचें और पूजा की सभी जरूरी चीजें पहले से एकत्रित कर लें. कलश स्थापना में जल से भरा कलश, आम या अशोक के पत्ते, नारियल, अक्षत, मौली और फूल जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. कई घरों में कलश के साथ मिट्टी में जौ बोने की परंपरा भी है. जौ के अंकुरों को धार्मिक मान्यताओं में शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. पूजा की सामग्री व्यवस्थित रहने से रोजाना पूजा करना भी आसान होता है.

कलश स्थापना से शुरू होती है नौ दिनों की पूजा

घटस्थापना को कलश स्थापना भी कहा जाता है. इसे शारदीय नवरात्र के पहले दिन किया जाता है और धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस विधि के माध्यम से मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है. इसके साथ ही नौ दिनों की पूजा-अर्चना शुरू होती है. इस साल शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू हो रहे हैं. कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त शहर और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है, इसलिए पूजा से पहले अपने क्षेत्र के पंचांग से समय की पुष्टि कर लेना उचित है. अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि में भी अंतर हो सकता है. ऐसे में अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा करना बेहतर रहता है.

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