डायेक्टर चेतन आंद ने एक फिल्म बाई, जिसे कान्स फिल्म फेस्टिवल में काफी सराहना मिली लेकिन फिल्म में गाना न होने के कारण फिल्म को बॉलीवुड में जगह नहीं मिली. इस फिल्म को ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेटिव ने भी काफी सराहा था.
फिल्म नीचा नगर
Neecha Nagar: साल 1946 में देव आनंद के बड़े भाई और फिल्म निर्माता चेतन आनंद ने फिल्म नीचा नगर का डायरेक्शन किया था. इस फिल्म में कोई गाना नहीं थी, जिसके कारण बॉलीवुड ने इसे देश में रिलीज करने से इनकार कर दिया. हालांकि इस फिल्म को पहले कान फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया. यह ग्रैंड प्रिक्स जीतने वाली एकमात्र फिल्म बन गई. इसने मुकाबले में शामिल 18 में से 11 फिल्मों के साथ प्राइज शेयर किया. एक्टर कामिनी कौशल और मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर रविशंकर ने इसी नीचा नगर फिल्म से डेब्यू किया था. इसे लॉर्ड माउंटबेटन से तारीफ मिली और इंटरनेशनल लेवल पर भी पहचान मिली. फिर भी इन सबके बावजूद इस फिल्म को भारत में दर्शक नहीं मिले. इसकी वजह ये थी कि इस फिल्म में कोई गाना नहीं था.
चेतन आनंद के बेटे केतन आनंद ने अनहर्ड टेल्स पॉडकास्ट में बात करते हुए बताया था कि पुरस्कार फिल्म के लिए मील का पत्थर साबित हो गया. वह फिल्म एक अवॉर्ड-विनिंग लैंडमार्क बन गई. पहले कान फिल्म फेस्टिवल में ग्रैंड प्रिक्स जीतने वाली पहली एशियाई फिल्म न गई. उन्होंने कहा कि मेरे पिता इंटरनेशनल लेवल पर मशहूर हो गए लेकिन भारत में उतना मशहूर नहीं हो पाए. फिर भी उनका हमेशा बहुत सम्मान किया जाता था. वह एक महान फ़िल्ममेकर थे. सत्यजीत रे उनसे प्रभावित थे और उन्होंने यह भी लिखा था कि नीचा नगर देखने के बाद वो अपनी नौकरी छोड़कर फ़िल्ममेकर बनना चाहते थे.
केतन ने आगे कहा कि जहां भारत में फिल्म कमर्शियली सफल नहीं हुई. वहीं इसके पॉलिटिकल मैसेज ने विदेशों में लोगों को प्रभावित किया. वह एक इंटेलेक्चुअल थे, जिन्होंने कान्स जीता था लेकिन फिल्म उनके अपने देश में नहीं चली. उस समय भारत आजादी की लड़ाई में व्यस्त था. हालांकि फ्रांस इससे बहुत प्रभावित हुआ और इसीलिए उन्होंने इसे सम्मानित किया.
उन्होंने ये भी बताया कि नीचा नगर को मिली पहचान से ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेशन भी हैरान रह गया था. एक फ्रेंच जूरी ने एक भारतीय फिल्म को इतना प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया है और इस पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था. उन्होंने इसे दिखाने के लिए एक स्पेशल स्क्रीनिंग का इंतजाम किया था.
केतन आनंद ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू उस समय भी संघर्ष कर रहे थे और माउंटबेटन के करीब थे. माउंटबेटन ने उन्हें बुलाया और उन्होंने साथ में फिल्म देखी क्योंकि ब्रिटिश यह मान ही नहीं पा रहे थे कि फ्रांस ने इसे इतना बड़ा अवॉर्ड दिया है. उन्होंने बताया कि नीचा नगर को मिली मान्यता से ब्रिटिश प्रशासन काफी हैरान रह गया था. उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि फ्रांसीसी जूरी ने एक भारतीय फिल्म को इतना प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया है. इसके कारण उन्होंने एक विशेष स्क्रीनिंग का आयोजन कराया. केतन आनंद ने बताया कि माउंटबेटन ने जवाहर लाल नेहरू को फोन करके उनके साथ फिल्म देखी. ब्रिटिश इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे थे कि फ्रांस ने फिल्म को इतना बड़ा पुरस्कार दिया है.
अंग्रेजों ने भी इस फिल्म की सराहना की और युवा चेतन ने एक बहुत ही प्यारी फिल्म बनाई है. इसे पूरे भारत में रिलीज करने की बात कही गई लेकिन वो कभी हो नहीं पाई. केतन आनंद ने याद करते हुए बताया कि बॉलीवुड ने यह कहकर फिल्म को लेने से इनकार कर दिया कि इसमें गाने नहीं हैं.
बता दें कि नीचा नगर मैक्सिम गोर्की की रचना ‘द लोअर डेप्थ्स’ (1902) का हिंदी रूपांतरण है. इसे भारतीय सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में पुनर्कल्पित किया गया. फिल्म में घोर आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को दर्शाया गया है. इसमें नीचा नगर के शोषित निवासियों को ऊंचा नगर में रहे वाले धनी अभिजात वर्ग द्वारा शोषित किया जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने के बावजूद नीचा नगर को भारत में केवल एक ही सिनेमाघर में सांकेतिक रूप से दिखाया गया था. इसमें गाने, नृत्य और रोमांस नहीं था.
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