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आज भी छात्र आंदोलनों की जान है ये गाना, दिलीप कुमार और वैजयंती माला की जोड़ी भरती है जोश

आंदोलनों में एक गाना अक्सर सुनाई देता है, जो है 'साथी हाथ बढ़ाना'. हालांकि आपको यकीन नहीं होगा कि इस गाने को किसी आंदोलन के लिए नहीं बनाया गया था. इसके बावजूद आशा भोसले और मोहम्मद रफी का ये गाना प्रदर्शन में सुनाई देता है.

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Last Updated: July 24, 2026 16:57:24 IST

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Protest Song of Dilip Kumar: दिल्ली के जंतर-मंतर पर जब भी किसी आंदोलन की आवाज गूंजती है, नारों के बीच एक गीत अक्सर भीड़ को एक धागे में पिरो देता है “साथी हाथ बढ़ाना…”. कोई इसे मोबाइल स्पीकर पर चला देता है, तो कहीं प्रदर्शनकारी खुद मिलकर इसे गुनगुनाने लगते हैं. लोग इस गाने से इमोशनल रूप से जुड़ जाते हैं. यही कारण है कि दशकों पुराना यह फिल्मी गीत आज भी सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि एकजुटता, संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक माना जाता है.

आंदोलन के लिए नहीं बना गाना

दिलचस्प बात यह है कि इस गीत की शुरुआत किसी आंदोलन के लिए नहीं हुई थी. यह 1957 में रिलीज हुई फिल्म ‘नया दौर’ का हिस्सा था. फिल्म की कहानी गांव के लोगों के संघर्ष और सामूहिक मेहनत के इर्द-गिर्द घूमती है. गीत उस दृश्य में आता है, जब लोग मिलकर अपने भविष्य की राह खुद बनाने का फैसला करते हैं लेकिन इसके शब्द इतने व्यापक थे कि वे फिल्म की कहानी से निकलकर समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन गए.

मोहम्मद रफी और वैजयंती माला की आवाज

इस अमर गीत को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी थी. इसके बोल साहिर लुधियानवी ने लिखे, जबकि ओ.पी. नैय्यर ने इसका संगीत तैयार किया. चारों दिग्गजों की यह साझेदारी ऐसी रही कि करीब सात दशक बाद भी यह गीत अपनी प्रासंगिकता नहीं खो पाया. आज भी जब किसी धरने या प्रदर्शन में लोग इसे गाते हैं, तो नई पीढ़ी भी इसकी भावनाओं से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करती है.

दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला

फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की जोड़ी ने इस गीत को पर्दे पर जीवंत बनाया था लेकिन समय के साथ इसकी पहचान फिल्मों से कहीं आगे निकल गई. अब यह गीत किसी अभिनेता या फिल्म का नहीं बल्कि उन लोगों का लगता है जो अपने अधिकार, सम्मान और बेहतर भविष्य के लिए शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष कर रहे हैं.

कुछ धुन हमेशा सुनाई देती हैं

शायद यही किसी महान रचना की सबसे बड़ी पहचान होती है. वक्त बदलता है, चेहरे बदलते हैं, मुद्दे बदलते हैं लेकिन कुछ शब्द और कुछ धुनें हमेशा जिंदा रहती हैं. “साथी हाथ बढ़ाना…” भी ऐसा ही गीत है, जो जंतर-मंतर से लेकर देश के हर उस कोने तक उम्मीद की आवाज बनकर गूंजता है, जहां लोग मिलकर बदलाव का सपना देखते हैं.

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Protest Song of Dilip Kumar: दिल्ली के जंतर-मंतर पर जब भी किसी आंदोलन की आवाज गूंजती है, नारों के बीच एक गीत अक्सर भीड़ को एक धागे में पिरो देता है “साथी हाथ बढ़ाना…”. कोई इसे मोबाइल स्पीकर पर चला देता है, तो कहीं प्रदर्शनकारी खुद मिलकर इसे गुनगुनाने लगते हैं. लोग इस गाने से इमोशनल रूप से जुड़ जाते हैं. यही कारण है कि दशकों पुराना यह फिल्मी गीत आज भी सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि एकजुटता, संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक माना जाता है.

आंदोलन के लिए नहीं बना गाना

दिलचस्प बात यह है कि इस गीत की शुरुआत किसी आंदोलन के लिए नहीं हुई थी. यह 1957 में रिलीज हुई फिल्म ‘नया दौर’ का हिस्सा था. फिल्म की कहानी गांव के लोगों के संघर्ष और सामूहिक मेहनत के इर्द-गिर्द घूमती है. गीत उस दृश्य में आता है, जब लोग मिलकर अपने भविष्य की राह खुद बनाने का फैसला करते हैं लेकिन इसके शब्द इतने व्यापक थे कि वे फिल्म की कहानी से निकलकर समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन गए.

मोहम्मद रफी और वैजयंती माला की आवाज

इस अमर गीत को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी थी. इसके बोल साहिर लुधियानवी ने लिखे, जबकि ओ.पी. नैय्यर ने इसका संगीत तैयार किया. चारों दिग्गजों की यह साझेदारी ऐसी रही कि करीब सात दशक बाद भी यह गीत अपनी प्रासंगिकता नहीं खो पाया. आज भी जब किसी धरने या प्रदर्शन में लोग इसे गाते हैं, तो नई पीढ़ी भी इसकी भावनाओं से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करती है.

दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला

फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की जोड़ी ने इस गीत को पर्दे पर जीवंत बनाया था लेकिन समय के साथ इसकी पहचान फिल्मों से कहीं आगे निकल गई. अब यह गीत किसी अभिनेता या फिल्म का नहीं बल्कि उन लोगों का लगता है जो अपने अधिकार, सम्मान और बेहतर भविष्य के लिए शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष कर रहे हैं.

कुछ धुन हमेशा सुनाई देती हैं

शायद यही किसी महान रचना की सबसे बड़ी पहचान होती है. वक्त बदलता है, चेहरे बदलते हैं, मुद्दे बदलते हैं लेकिन कुछ शब्द और कुछ धुनें हमेशा जिंदा रहती हैं. “साथी हाथ बढ़ाना…” भी ऐसा ही गीत है, जो जंतर-मंतर से लेकर देश के हर उस कोने तक उम्मीद की आवाज बनकर गूंजता है, जहां लोग मिलकर बदलाव का सपना देखते हैं.

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