Bollywood Evergreen Song: हिंदी सिनेमा के पुराने गानों की बात हो और मोहम्मद रफी का नाम न आए, ऐसा शायद ही कभी हो. रफी साहब की आवाज में रोमांस हो, दर्द हो या फिर मस्ती, हर रंग बिल्कुल अलग महसूस होता था. क्या आप जानते हैं कि एक दौर में उन्हें भी ऐसे संगीतकारों के बीच अपनी जगह बनानी पड़ती थी, जिनका संगीत उस समय बेहद लोकप्रिय था?
कहानी 1966 की फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ से जुड़ी है. इस फिल्म ने न सिर्फ शम्मी कपूर और आशा पारेख की जोड़ी को यादगार बनाया, साथ ही आरडी बर्मन के करियर में भी एक बड़ा मोड़ ला दिया. हम बात कर रहे हैं सोना रे-सोना रे गाने की. हैरानी की बात ये है कि ये गाना आज के समय में जेन-जी का भी फेवरेट बना हुआ है.
शम्मी कपूर की एक शर्त
कहा जाता है कि उस समय शंकर-जयकिशन का नाम फिल्म इंडस्ट्री में काफी बड़ा था. शम्मी कपूर भी उनके संगीत के बड़े प्रशंसक थे और चाहते थे कि उनकी अगली फिल्म का संगीत भी यही जोड़ी तैयार करे. इसी बीच विजय आनंद अपने भाई देव आनंद के साथ ‘तीसरी मंजिल’ बनाने की तैयारी कर रहे थे. हालांकि, बाद में देव आनंद इस फिल्म का हिस्सा नहीं बन पाए और फिल्म शम्मी कपूर के पास पहुंची. शम्मी कपूर ने फिल्म करने के लिए हामी तो भर दी लेकिन उनकी एक शर्त थी. उनका कहना था कि फिल्म का संगीत शंकर-जयकिशन ही देंगे. दूसरी तरफ विजय आनंद की पसंद आरडी बर्मन थे.
आरडी बर्मन को मिला बड़ा चैलेंज
जब यह बात निर्माता नासिर हुसैन तक पहुंची तो उन्होंने आरडी बर्मन से मुलाकात की. उन्होंने बर्मन के सामने एक चुनौती रख दी. कहा गया कि उन्हें ऐसा संगीत देना होगा कि शम्मी कपूर और दर्शकों को शंकर-जयकिशन की कमी महसूस ही न हो. यही चुनौती आरडी बर्मन के लिए एक बड़ा मौका बन गई. इसके बाद जो संगीत तैयार हुआ, उसने हिंदी फिल्म संगीत की दिशा ही बदल दी.
रफी और आशा की आवाज ने जमाया रंग
तीसरी मंजिल के गानों में मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज ने जान डाल दी. ओ मेरे सोना रे सोना, आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा, तुमने मुझे देखा और दीवाना मुझसा नहीं जैसे गाने लोगों की जुबान पर चढ़ गए. फिल्म 1966 में रिलीज हुई थी और इसके संगीत की लोकप्रियता ने आरडी बर्मन को एक अलग पहचान दिलाई.
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