Rakesh Roshan: मुंबई की चमकती फिल्मी दुनिया को दूर से देखने वाला शायद ही अंदाजा लगा सके कि इसी शहर में कुछ ऐसे सितारों की कहानियां भी लिखी गई हैं, जिनकी शुरुआत बेहद साधारण हालात से हुई. ऋतिक राकेश रोशन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. उन्होंने आगे चलकर बॉलीवुड को ‘करण अर्जुन’, ‘कोई मिल गया और ‘कहो ना प्यार है’ जैसी यादगार फिल्में दीं. हालांकि उनके शुरुआती दिन संघर्ष और आर्थिक तंगी के बीच गुजरे थे. कभी दोस्तों से पैसे उधार लेकर घर चलाना पड़ा. जब उनकी शादी हुई, तो उस समय उनकी कमाई महज 200 रुपये थी लेकिन मुश्किल वक्त में भी उन्होंने अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया.
फिल्मी परिवार मिला लेकिन…
6 सितंबर 1949 को जन्मे राकेश रोशन के पिता रोशन लाल नागरथ हिंदी सिनेमा के मशहूर संगीतकार थे. उनकी मां इरा मोइत्रा बंगाली गायिका थीं. छोटे भाई राजेश रोशन ने भी संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाई. ऐसे परिवार में जन्म लेने के बावजूद राकेश के लिए बॉलीवुड में सफलता हासिल करना आसान नहीं था. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत फिल्ममेकर मोहन कुमार के सहायक के तौर पर की. इसके बाद 1970 में फिल्म ‘घर-घर की कहानी’ से बतौर एक्टर पर्दे पर कदम रखा. उन्होंने 80 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया लेकिन उन्हें स्टारडम नहीं मिल सका. कुछ भूमिकाओं में तारीफ जरूर मिली लेकिन अभिनेता के तौर पर उनका सफर वैसी ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाया.
कैमरे के पीछे मिली असली पहचान
राकेश रोशन ने अपनी असफलता को मंजिल नहीं बनने दिया. उन्होंने कैमरे के पीछे जाने का फैसला किया. उन्होंने 1987 में ‘खुदगर्ज’ से डायरेक्शन की शुरुआत की. फिल्म सफल रही और यहीं से उनके करियर ने ऐसी करवट ली, जिसने उन्हें बॉलीवुड के बड़े फिल्ममेकर्स में शामिल कर दिया. इसके बाद उन्होंने खून भरी मांग, किशन कन्हैया, किंग अंकल और 1995 की ब्लॉकबस्टर करण अर्जुन जैसी फिल्मों ने उनकी पहचान मजबूत की.
‘क’ बना किस्मत का साथी
राकेश रोशन के निर्देशन करियर में ‘क’ अक्षर का खास महत्व रहा. करण अर्जुन के बाद उन्होंने बेटे ऋतिक रोशन को साल 2000 में कहो ना प्यार है से लॉन्च किया. फिल्म सुपरहिट रही और ऋतिक रातोंरात स्टार बन गए. इसके बाद कोई मिल गया और कृष जैसी फिल्मों ने पिता-पुत्र की जोड़ी को नई ऊंचाई दी. राकेश रोशन को अपने काम के लिए फिल्मफेयर पुरस्कारों के साथ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.