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रेबीज वैक्सीन के बावजूद नहीं बच पाई मासूम, क्यों फेल हो रहा वैक्सीनेशन का प्रभाव?

महाराष्ट्र के ठाणे जिले के दिवा इलाके में 17 नवंबर को एक सड़क पर खेल रही छह साल की निशा शिंदे को एक आवारा कुत्ते ने कंधे और गाल पर काट लिया. इलाज के बावजूद बच्ची बच न सकी, जो रेबीज वैक्सीन के बावजूद होने वाली दुर्लभ मौत का दर्दनाक उदाहरण है.

महाराष्ट्र के ठाणे जिले के दिवा इलाके में 17 नवंबर को एक सड़क पर खेल रही छह साल की निशा शिंदे को एक आवारा कुत्ते ने कंधे और गाल पर काट लिया. बच्ची को तुरंत एंटी-रेबीज वैक्सीन के चार डोज दिए गए, यहां तक कि अपना जन्मदिन भी मना लिया, लेकिन 16 दिसंबर को अचानक तेज बुखार, सिरदर्द और असामान्य व्यवहार जैसे सिर पटकना शुरू हो गया. इलाज के बावजूद बच्ची बच न सकी, जो रेबीज वैक्सीन के बावजूद होने वाली दुर्लभ मौत का दर्दनाक उदाहरण है.
यह घटना रेबीज के खतरे को उजागर करती है, जहां वैक्सीन कभी-कभी असफल हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है. 

रेबीज वैक्सीन कैसे काम करती है

रेबीज वैक्सीन रेबीज वायरस के ग्लाइकोप्रोटीन (G प्रोटीन) को निशाना बनाकर इम्यून सिस्टम को उत्तेजित करती है, जिससे न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज बनती हैं. ये एंटीबॉडीज वायरस को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) तक पहुंचने से रोकती हैं. पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) में पहले घाव की अच्छी सफाई, फिर रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन (RIG) से पैसिव इम्यूनिटी और वैक्सीन के डोज से एक्टिव इम्यूनिटी विकसित होती है. ये टीके निष्क्रिय वायरस से बने होते हैं, जो T-सेल्स और NK सेल्स को सक्रिय कर IFN-γ उत्पन्न करते हैं और वायरल प्रतिकृति रोकते हैं.

वैक्सीन असफलता के संभावित कारण

निशा केस की तरह PEP के बावजूद मौतें दुर्लभ हैं, लेकिन 122 मामलों की समीक्षा में आधी से ज्यादा में वैक्सीन के कान करने के दायरे का उल्लंघन था. वैक्सीन के असफल होने के कई कारण होते हैं, जैसे:

  • देर से इलाज: घाव के घंटों बाद वैक्सीन लेने पर वायरस नर्वस सिस्टम में पहुंच जाता है, जहां टीका बेअसर हो जाता है.
    हाई-रिस्क एरिया पर काटना: चेहरा, गर्दन या हाथ जैसे नर्व-रिच क्षेत्रों पर काटने से इंक्यूबेशन पीरियड छोटा (एक हफ्ता) हो जाता है, जिससे वैक्सीन कभी-कभी काम नहीं करती है.
  • RIG न देना: हाई-रिस्क केस में RIG घाव पर इंजेक्ट न करने से वायरस फैल जाता है.आरआईजी आपके शरीर को तैयार एंटीबॉडी प्रदान करता है, जिससे आपको तत्काल (निष्क्रिय) प्रतिरक्षा मिलती है. यह एक पूरक टीका है जो सीधे उस जगह पर रेबीज वायरस पर हमला करता है और उसे निष्क्रिय कर देता है जहां कुत्ते ने काटा था (जैसे- हाथ, पैर), जिससे इसे मस्तिष्क तक जाने से रोका जा सकता है.
  • घाव की अपर्याप्त सफाई: कुत्ते के काटते ही घाव की अच्छे से सफाई करना अनिवार्य है. साबुन-पानी से 15 मिनट तक घाव न धोने पर वायरस बचा रहता है, जो संक्रमण फैला सकता है.
  • कमजोर इम्यून रिस्पॉन्स: जिन लोगों की इम्युनिटी कमजोर होती है, उन लोगों पर वैक्सीन का असर कम होने की संभावना होती है, जिससे इंफेक्शन के बढ़ने की संभावना बनी रहती है.

मिथक बनाम तथ्य

डॉग बाइटिंग और रेबीज को लेकर कुछ मिथक लोगों में फैले हुए हैं. आइये जानते हैं ये मिथक क्या हैं?

  1. मिथक: रेबीज सिर्फ काटने से फैलता है.  तथ्य: लारयुक्त खरोंच, या चाटने से भी रेबीज हो सकता है.
  2. मिथक: वैक्सीन अकेले काफी होता है. तथ्य: हाई-रिस्क में RIG इंजेक्शन जरूरी होता है.
  3. मिथक: रेबीज असाध्य रोग है. तथ्य: PEP समय पर लेने से 100% रोकथाम, लेकिन वैक्सीन के बाद भी लक्षण आने पर लगभग हमेशा घातक होता है.

रोकथाम के उपाय

पेट्स को नियमित वैक्सीनेट करें, आवारा/जंगली जानवरों से दूर रहें. हाई-रिस्क मामले में RIG इंजेक्शन जरूर लगवाएं.  डॉग बाइटिंग के बाद घाव धोना पहला कदम होता है. साबुन और बहते पानी से 15 मिनट तक घाव को धोना चाहिए. 
किसी भी संदिग्ध जानवर (खासकर अनवैक्सीनेटेड कुत्ता) के काटने, खरोंच या मुंह पर चाटने पर फौरन डॉक्टर के पास जाएं. चेहरा/गर्दन पर गहरा काटना, अधिक खून बहने पर तुरंत इंजेक्शन लगवाएं. शुरुआती लक्षण जैसे बुखार, सिरदर्द, काटने वाली जगह पर दर्द जैसे लक्षण हाइड्रोफोबिया या एरोफोबिया से पहले के शुरूआती लक्षण हैं. इन लक्षणों के दिखने पर तुरंत चिकित्सकों से परामर्श लें.

रेबीज लाइसावायरस से होता है, जो कुत्तों से सबसे ज्यादा फैलता है. सही PEP से इसे रोका जा सकता है, लेकिन जागरूकता जरूरी है. 

Shivangi Shukla

वर्तमान में शिवांगी शुक्ला इंडिया न्यूज़ के साथ कार्यरत हैं. हेल्थ, बॉलीवुड और लाइफ़स्टाइल विषयों पर लेखन में उन्हें विशेष रुचि और अनुभव है. इसके अलावा रिसर्च बेस्ड आर्टिकल और पॉलिटिकल कवरेज से जुड़े मुद्दों पर भी वे नियमित रूप से लेखन करती हैं. तथ्यपरक, सरल और पाठकों को जागरूक करने वाला कंटेंट तैयार करना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है. डिजिटल मीडिया में विश्वसनीय और प्रभावी पत्रकारिता को लेकर वे निरंतर अभ्यासरत हैं.

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