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Home > देश > जब भारत के वैज्ञानिकों को पहननी पड़ी आर्मी की वर्दी, कलाम बने थे मेजर; वाजपेयी का वो फैसला जिसने बदल दी देश की तकदीर

जब भारत के वैज्ञानिकों को पहननी पड़ी आर्मी की वर्दी, कलाम बने थे मेजर; वाजपेयी का वो फैसला जिसने बदल दी देश की तकदीर

Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary Special: अटल जी के उस कारनामें के बारे में जानते हैं जब भारत के पीएम में उस समय की सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका को चकमा दे दिया था. जिसने भारत को वो पावर दी जो आज भी बहुत कम देशों के पास है.

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Last Updated: 2026-08-16 08:37:07

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Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary Special:  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज ही के दिन, 16 अगस्त को निधन हो गया था. भारत के महानतम नेताओं में से एक, अटलजी केवल एक राजनेता ही नहीं थे. उन्होंने 1998 में देश के लिए कुछ ऐसा किया था जिसे देख पूरी दुनिया दंग रह गई थी. तो चलिए अटल जी के उस कारनामें के बारे में जानते हैं जब भारत के पीएम में उस समय की सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका को चकमा दे दिया था. जिसने भारत को वो पावर दी जो आज भी बहुत कम देशों के पास है.

तारीख थी 11 मई 1998, घड़ी में ठीक 3:45 बजे थे. राजस्थान के पोखरण की गर्म रेत के नीचे एक ऐसा आंदोलन हुआ जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया. यह सिर्फ़ एक धमाका नहीं था, बल्कि भारत के सोए हुए स्वाभिमान को चुनौती थी. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने वह कर दिखाया था जिसके बारे में पिछली सरकारें सोचने से भी डरती थीं. अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसियां ​​आसमान से देख रही थीं, लेकिन भारत ने उनकी नाक के नीचे न्यूक्लियर टेस्ट कर दिया. यह घटना सिर्फ़ एक साइंटिफिक कामयाबी नहीं थी बल्कि भारत की स्ट्रेटेजिक आत्मनिर्भरता का ऐलान थी.

1998 का ​​न्यूक्लियर टेस्ट कोई आम फैसला नहीं था. उस समय दुनिया की नज़रें भारत पर थीं. “न्यूक्लियर हब” माने जाने वाले देश नहीं चाहते थे कि भारत न्यूक्लियर पावर बने. दबाव बहुत ज़्यादा था. आलोचना का डर था. पाबंदियों का खतरा था. लेकिन वाजपेयी ने इसकी परवाह किए बिना भविष्य चुना. यह टेस्ट भारत के आत्म-सम्मान और संप्रभुता का ऐलान था. वाजपेयी जानते थे कि अगर भारत को सुरक्षित रहना है, तो उसे ताकतवर बनना होगा.

बेहद दिलचस्प है कहानी

जब 1998 में वाजपेयी सत्ता में वापस आए, तो उनकी सरकार 13 पार्टियों के गठबंधन से बनी थी. उनके शपथ लेने के कुछ ही दिनों बाद, पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव उनसे मिलने आए. राव ने वाजपेयी से कहा, “सामग्री तैयार है, आप आगे बढ़ सकते हैं.” यह न्यूक्लियर बम की तैयारी का ज़िक्र था. वाजपेयी ने एक पल भी देर नहीं की. उन्होंने तुरंत डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. आर. चिदंबरम को बुलाया और उन्हें तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया. वाजपेयी अपनी पिछली 13 दिन की सरकार के अनुभव से जानते थे कि समय कीमती है.

इस मिशन का नाम ‘ऑपरेशन शक्ति’ रखा गया. सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट से बचना था. इसके लिए एक एडवांस्ड स्ट्रैटेजी बनाई गई थी. साइंटिस्ट कभी एक साथ यात्रा नहीं करते थे. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी टीम शक से बचने के लिए मिलिट्री यूनिफॉर्म पहनती थी. उन्हें कोड नेम दिए गए थे. कलाम का कोड नेम ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ था, जबकि डॉ. चिदंबरम ‘नटराज’ बन गए.

सारा कंस्ट्रक्शन का काम रात के अंधेरे में किया गया. सुबह होते ही सब कुछ ऐसे ढक दिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो. इंडियन आर्मी की 58वीं इंजीनियर रेजिमेंट ने इसमें पूरा साथ दिया. यह चूहे-बिल्ली का खेल था, जिसमें इंडिया जीत गया.

डॉ. कलाम ने सलाह दी थी कि टेस्ट के लिए बुद्ध पूर्णिमा को चुना जाए. वह दिन 11 मई, 1998 था. डॉ. कलाम ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बहुत ज़्यादा प्रेशर था, लेकिन वाजपेयी जी ने फैसला कर लिया था. जैसे ही दोपहर 3:45 बजे पहला धमाका हुआ, इंडिया ने दुनिया को बता दिया कि वह अब किसी पर डिपेंडेंट नहीं है. इस टेस्ट ने इंडिया को ‘न्यूक्लियर डिटरेंस’ दिया. इसका मतलब था कि अब कोई भी दुश्मन इंडिया की तरफ आँख उठाने से पहले दो बार सोचेगा. यह वाजपेयी का विज़न ही था जिसने इंडिया को एक कमज़ोर देश से ग्लोबल पावर बना दिया. ‘

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Last Updated: 2026-08-16 08:37:07

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Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary Special:  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज ही के दिन, 16 अगस्त को निधन हो गया था. भारत के महानतम नेताओं में से एक, अटलजी केवल एक राजनेता ही नहीं थे. उन्होंने 1998 में देश के लिए कुछ ऐसा किया था जिसे देख पूरी दुनिया दंग रह गई थी. तो चलिए अटल जी के उस कारनामें के बारे में जानते हैं जब भारत के पीएम में उस समय की सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका को चकमा दे दिया था. जिसने भारत को वो पावर दी जो आज भी बहुत कम देशों के पास है.

तारीख थी 11 मई 1998, घड़ी में ठीक 3:45 बजे थे. राजस्थान के पोखरण की गर्म रेत के नीचे एक ऐसा आंदोलन हुआ जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया. यह सिर्फ़ एक धमाका नहीं था, बल्कि भारत के सोए हुए स्वाभिमान को चुनौती थी. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने वह कर दिखाया था जिसके बारे में पिछली सरकारें सोचने से भी डरती थीं. अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसियां ​​आसमान से देख रही थीं, लेकिन भारत ने उनकी नाक के नीचे न्यूक्लियर टेस्ट कर दिया. यह घटना सिर्फ़ एक साइंटिफिक कामयाबी नहीं थी बल्कि भारत की स्ट्रेटेजिक आत्मनिर्भरता का ऐलान थी.

1998 का ​​न्यूक्लियर टेस्ट कोई आम फैसला नहीं था. उस समय दुनिया की नज़रें भारत पर थीं. “न्यूक्लियर हब” माने जाने वाले देश नहीं चाहते थे कि भारत न्यूक्लियर पावर बने. दबाव बहुत ज़्यादा था. आलोचना का डर था. पाबंदियों का खतरा था. लेकिन वाजपेयी ने इसकी परवाह किए बिना भविष्य चुना. यह टेस्ट भारत के आत्म-सम्मान और संप्रभुता का ऐलान था. वाजपेयी जानते थे कि अगर भारत को सुरक्षित रहना है, तो उसे ताकतवर बनना होगा.

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जब 1998 में वाजपेयी सत्ता में वापस आए, तो उनकी सरकार 13 पार्टियों के गठबंधन से बनी थी. उनके शपथ लेने के कुछ ही दिनों बाद, पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव उनसे मिलने आए. राव ने वाजपेयी से कहा, “सामग्री तैयार है, आप आगे बढ़ सकते हैं.” यह न्यूक्लियर बम की तैयारी का ज़िक्र था. वाजपेयी ने एक पल भी देर नहीं की. उन्होंने तुरंत डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. आर. चिदंबरम को बुलाया और उन्हें तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया. वाजपेयी अपनी पिछली 13 दिन की सरकार के अनुभव से जानते थे कि समय कीमती है.

इस मिशन का नाम ‘ऑपरेशन शक्ति’ रखा गया. सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट से बचना था. इसके लिए एक एडवांस्ड स्ट्रैटेजी बनाई गई थी. साइंटिस्ट कभी एक साथ यात्रा नहीं करते थे. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी टीम शक से बचने के लिए मिलिट्री यूनिफॉर्म पहनती थी. उन्हें कोड नेम दिए गए थे. कलाम का कोड नेम ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ था, जबकि डॉ. चिदंबरम ‘नटराज’ बन गए.

सारा कंस्ट्रक्शन का काम रात के अंधेरे में किया गया. सुबह होते ही सब कुछ ऐसे ढक दिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो. इंडियन आर्मी की 58वीं इंजीनियर रेजिमेंट ने इसमें पूरा साथ दिया. यह चूहे-बिल्ली का खेल था, जिसमें इंडिया जीत गया.

डॉ. कलाम ने सलाह दी थी कि टेस्ट के लिए बुद्ध पूर्णिमा को चुना जाए. वह दिन 11 मई, 1998 था. डॉ. कलाम ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बहुत ज़्यादा प्रेशर था, लेकिन वाजपेयी जी ने फैसला कर लिया था. जैसे ही दोपहर 3:45 बजे पहला धमाका हुआ, इंडिया ने दुनिया को बता दिया कि वह अब किसी पर डिपेंडेंट नहीं है. इस टेस्ट ने इंडिया को ‘न्यूक्लियर डिटरेंस’ दिया. इसका मतलब था कि अब कोई भी दुश्मन इंडिया की तरफ आँख उठाने से पहले दो बार सोचेगा. यह वाजपेयी का विज़न ही था जिसने इंडिया को एक कमज़ोर देश से ग्लोबल पावर बना दिया. ‘

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