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Pitru Paksha 2026: मृत्यु तिथि याद नहीं तो इस दिन करें श्राद्ध, पितृ पक्ष में इन 3 तिथियों का है सबसे खास महत्व, जानें पूरा विधान

Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किया जाता है. सामान्य नियम के अनुसार पूर्वज की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, उसी तिथि पर श्राद्ध किया जाता है. हालांकि मातृ नवमी, विशेष परिस्थितियों में श्राद्ध की तिथियां और सर्वपितृ अमावस्या का अलग महत्व माना जाता है. जानें 2026 में पितृ पक्ष की सभी तिथियां और किस दिन किस तरह के पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है.

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Published: September 26, 2026 15:47:57 IST
Last Updated: September 26, 2026 15:47:57 IST

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Pitru Paksha 2026: सनातन धर्म में पितरों यानी दिवंगत पूर्वजों को विशेष स्थान दिया गया है. हर साल आने वाला पितृ पक्ष उनके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में पितरों का तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है. सामान्य तौर पर जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है. हालांकि, इस दौरान कुछ तिथियां ऐसी भी होती हैं, जिनका विशेष महत्व माना गया है.

निधन की तिथि के अनुसार ही किया जाता है श्राद्ध

पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का सबसे प्रमुख नियम दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु तिथि से जुड़ा है. जिस तिथि को व्यक्ति का निधन हुआ था, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध और तर्पण किया जाता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी पूर्वज का निधन द्वितीया तिथि को हुआ था, तो उनका श्राद्ध पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि पर ही किया जाएगा. इसी तरह अष्टमी, दशमी या किसी अन्य तिथि पर निधन होने पर उसी तिथि को श्राद्ध करने का विधान माना जाता है. हालांकि, हर परिवार को पूर्वज की मृत्यु तिथि याद हो, यह जरूरी नहीं है. इसके अलावा कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए पितृ पक्ष में अलग तिथियों का महत्व बताया गया है.

एकादशी से अलग क्यों मानी जाती है मातृ नवमी?

पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी कहा जाता है. यह दिन परिवार की दिवंगत महिला पूर्वजों की स्मृति को समर्पित माना जाता है. माता, दादी, नानी, बहन, सास या परिवार की अन्य दिवंगत महिला सदस्यों के लिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य किया जाता है. यदि परिवार में किसी महिला सदस्य के निधन की सही तिथि याद नहीं है, तो मातृ नवमी के दिन उनके नाम से तर्पण और दान करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. इस अवसर पर ब्राह्मण या कन्या भोजन कराने की भी धार्मिक परंपरा बताई गई है. इसी वजह से पितृ पक्ष की नवमी तिथि को महिलाओं के श्राद्ध के लिए खास माना जाता है.

असमय मृत्यु या अविवाहित पूर्वजों के लिए खास तिथि

पितृ पक्ष में कुछ ऐसी तिथियां भी मानी जाती हैं, जिनका संबंध विशेष परिस्थितियों में दिवंगत हुए परिजनों से है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर परिवार में किसी सदस्य की असमय मृत्यु हुई हो या कोई व्यक्ति अविवाहित रहा हो, तो उसके लिए विशेष श्राद्ध का महत्व माना जाता है. इसके अलावा किसी परिजन के निधन को एक वर्ष पूरा होने पर भी इस प्रकार की विशेष तिथियों का महत्व बढ़ जाता है. ऐसी परिस्थितियों में परिवार के लोग तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य के माध्यम से दिवंगत परिजन का स्मरण करते हैं.

सर्वपितृ अमावस्या पर एक साथ कर सकते हैं पितरों का श्राद्ध

पितृ पक्ष की सबसे प्रमुख तिथियों में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष स्थान माना जाता है. यह उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होती है जिन्हें अपने किसी पूर्वज के निधन की सटीक तिथि मालूम नहीं है. अगर किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों का एक साथ तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है. यानी किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि याद न होने या निर्धारित तिथि पर श्राद्ध छूट जाने की स्थिति में यह तिथि परिवार के लिए महत्वपूर्ण अवसर मानी जाती है. इस दिन पितरों के निमित्त दान-पुण्य और तर्पण करने की धार्मिक परंपरा है.

क्या सिर्फ इन तीन तिथियों पर ही कर सकते हैं श्राद्ध?

ऐसा नहीं है. पितृ पक्ष में श्राद्ध के लिए प्राथमिक नियम यही माना जाता है कि जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ था, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाए. इसलिए अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई है, तो उसका श्राद्ध द्वितीया को ही किया जाना चाहिए. नवमी, सर्वपितृ अमावस्या और अन्य विशेष तिथियों का महत्व उन परिस्थितियों में बढ़ जाता है, जब मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, किसी विशेष श्रेणी के पूर्वजों का श्राद्ध करना हो या निर्धारित तिथि पर श्राद्ध न हो पाया हो. इसलिए इन तिथियों को सामान्य श्राद्ध की तिथि का विकल्प समझने के बजाय विशेष धार्मिक अवसर के तौर पर देखा जाता है.

2026 में कब-कब होगा पितृ पक्ष का श्राद्ध?

साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत पूर्णिमा श्राद्ध से हो रही है. अलग-अलग तिथियों के अनुसार श्राद्ध की तारीखें इस प्रकार हैं-

  • पूर्णिमा श्राद्ध: 26 सितंबर 2026, शनिवार
  • द्वितीया श्राद्ध: 28 सितंबर 2026, सोमवार
  • तृतीया और महाभरणी श्राद्ध: 29 सितंबर 2026, मंगलवार
  • चतुर्थी एवं पंचमी श्राद्ध: 30 सितंबर 2026, बुधवार
  • षष्ठी श्राद्ध: 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार
  • सप्तमी श्राद्ध: 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
  • अष्टमी श्राद्ध: 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
  • नवमी यानी मातृ नवमी श्राद्ध: 4 अक्टूबर 2026, रविवार
  • दशमी श्राद्ध: 5 अक्टूबर 2026, सोमवार
  • एकादशी श्राद्ध: 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार
  • द्वादशी व मघा श्राद्ध: 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
  • त्रयोदशी श्राद्ध: 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार
  • चतुर्दशी श्राद्ध: 9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
  • सर्वपितृ अमावस्या: 10 अक्टूबर 2026, शनिवार

इस तरह 2026 के पितृ पक्ष में हर तिथि का अपना अलग धार्मिक महत्व है. पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात होने पर उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध करना प्राथमिक माना जाता है, जबकि मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या जैसी तिथियां विशेष परिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

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Published: September 26, 2026 15:47:57 IST
Last Updated: September 26, 2026 15:47:57 IST

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Pitru Paksha 2026: सनातन धर्म में पितरों यानी दिवंगत पूर्वजों को विशेष स्थान दिया गया है. हर साल आने वाला पितृ पक्ष उनके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में पितरों का तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है. सामान्य तौर पर जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है. हालांकि, इस दौरान कुछ तिथियां ऐसी भी होती हैं, जिनका विशेष महत्व माना गया है.

निधन की तिथि के अनुसार ही किया जाता है श्राद्ध

पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का सबसे प्रमुख नियम दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु तिथि से जुड़ा है. जिस तिथि को व्यक्ति का निधन हुआ था, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध और तर्पण किया जाता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी पूर्वज का निधन द्वितीया तिथि को हुआ था, तो उनका श्राद्ध पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि पर ही किया जाएगा. इसी तरह अष्टमी, दशमी या किसी अन्य तिथि पर निधन होने पर उसी तिथि को श्राद्ध करने का विधान माना जाता है. हालांकि, हर परिवार को पूर्वज की मृत्यु तिथि याद हो, यह जरूरी नहीं है. इसके अलावा कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए पितृ पक्ष में अलग तिथियों का महत्व बताया गया है.

एकादशी से अलग क्यों मानी जाती है मातृ नवमी?

पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी कहा जाता है. यह दिन परिवार की दिवंगत महिला पूर्वजों की स्मृति को समर्पित माना जाता है. माता, दादी, नानी, बहन, सास या परिवार की अन्य दिवंगत महिला सदस्यों के लिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य किया जाता है. यदि परिवार में किसी महिला सदस्य के निधन की सही तिथि याद नहीं है, तो मातृ नवमी के दिन उनके नाम से तर्पण और दान करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. इस अवसर पर ब्राह्मण या कन्या भोजन कराने की भी धार्मिक परंपरा बताई गई है. इसी वजह से पितृ पक्ष की नवमी तिथि को महिलाओं के श्राद्ध के लिए खास माना जाता है.

असमय मृत्यु या अविवाहित पूर्वजों के लिए खास तिथि

पितृ पक्ष में कुछ ऐसी तिथियां भी मानी जाती हैं, जिनका संबंध विशेष परिस्थितियों में दिवंगत हुए परिजनों से है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर परिवार में किसी सदस्य की असमय मृत्यु हुई हो या कोई व्यक्ति अविवाहित रहा हो, तो उसके लिए विशेष श्राद्ध का महत्व माना जाता है. इसके अलावा किसी परिजन के निधन को एक वर्ष पूरा होने पर भी इस प्रकार की विशेष तिथियों का महत्व बढ़ जाता है. ऐसी परिस्थितियों में परिवार के लोग तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य के माध्यम से दिवंगत परिजन का स्मरण करते हैं.

सर्वपितृ अमावस्या पर एक साथ कर सकते हैं पितरों का श्राद्ध

पितृ पक्ष की सबसे प्रमुख तिथियों में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष स्थान माना जाता है. यह उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होती है जिन्हें अपने किसी पूर्वज के निधन की सटीक तिथि मालूम नहीं है. अगर किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों का एक साथ तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है. यानी किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि याद न होने या निर्धारित तिथि पर श्राद्ध छूट जाने की स्थिति में यह तिथि परिवार के लिए महत्वपूर्ण अवसर मानी जाती है. इस दिन पितरों के निमित्त दान-पुण्य और तर्पण करने की धार्मिक परंपरा है.

क्या सिर्फ इन तीन तिथियों पर ही कर सकते हैं श्राद्ध?

ऐसा नहीं है. पितृ पक्ष में श्राद्ध के लिए प्राथमिक नियम यही माना जाता है कि जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ था, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाए. इसलिए अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई है, तो उसका श्राद्ध द्वितीया को ही किया जाना चाहिए. नवमी, सर्वपितृ अमावस्या और अन्य विशेष तिथियों का महत्व उन परिस्थितियों में बढ़ जाता है, जब मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, किसी विशेष श्रेणी के पूर्वजों का श्राद्ध करना हो या निर्धारित तिथि पर श्राद्ध न हो पाया हो. इसलिए इन तिथियों को सामान्य श्राद्ध की तिथि का विकल्प समझने के बजाय विशेष धार्मिक अवसर के तौर पर देखा जाता है.

2026 में कब-कब होगा पितृ पक्ष का श्राद्ध?

साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत पूर्णिमा श्राद्ध से हो रही है. अलग-अलग तिथियों के अनुसार श्राद्ध की तारीखें इस प्रकार हैं-

  • पूर्णिमा श्राद्ध: 26 सितंबर 2026, शनिवार
  • द्वितीया श्राद्ध: 28 सितंबर 2026, सोमवार
  • तृतीया और महाभरणी श्राद्ध: 29 सितंबर 2026, मंगलवार
  • चतुर्थी एवं पंचमी श्राद्ध: 30 सितंबर 2026, बुधवार
  • षष्ठी श्राद्ध: 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार
  • सप्तमी श्राद्ध: 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
  • अष्टमी श्राद्ध: 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
  • नवमी यानी मातृ नवमी श्राद्ध: 4 अक्टूबर 2026, रविवार
  • दशमी श्राद्ध: 5 अक्टूबर 2026, सोमवार
  • एकादशी श्राद्ध: 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार
  • द्वादशी व मघा श्राद्ध: 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
  • त्रयोदशी श्राद्ध: 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार
  • चतुर्दशी श्राद्ध: 9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
  • सर्वपितृ अमावस्या: 10 अक्टूबर 2026, शनिवार

इस तरह 2026 के पितृ पक्ष में हर तिथि का अपना अलग धार्मिक महत्व है. पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात होने पर उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध करना प्राथमिक माना जाता है, जबकि मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या जैसी तिथियां विशेष परिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

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