Dhar Bhojshala-Kamal Maula Mosque Controversy: भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों में विवाद बना हुआ है. हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी यानी देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है.
भोजशाला मंदिर कमल मौला मस्जिद विवाद
Bhojshala Temple-Kamal Maula Masjid: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद एक बार फिर चर्चा में है. यहां पूजा और नमाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है. इस बार बसंत पंचमी शुक्रवार को है. साथ ही उसी दिन जुमे की नमाज भी है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने पूजा और नमाज के लिए समय तय कर दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने नमाज के लिए एक बजे से तीन बजे तक का समय रखा है. वहीं सुबह 12 बजे तक बसंत पंचमी की पूजा होगी. इसके साथ ही कोर्ट ने प्रशासन को सख्त सुरक्षा व्यवस्था के निर्देश दिए हैं.
बता दें कि भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों में विवाद बना हुआ है. हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है.
साल 2024 में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ संगठन ने एमपी हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि यह परिसर साल 1034 में बना एक मंदिर था और यहां मस्जिद का निर्माण 13वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान ‘पूर्व निर्मित हिंदू मंदिरों की प्राचीन संरचनाओं को नष्ट करके और तोड़ कर’ किया गया था.
हिंदू पक्ष का दावा है कि यहां पहले वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर था, जिसे तोड़कर मस्जिद बना दिया गया था. भोजशाला, केंद्र सरकार के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक है.
ऐसे में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की याचिका पर पुरातत्व अनुसंधान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए देश की प्रमुख एजेंसी एएसआई को परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था. आदेश के बाद जिला प्रशासन और स्थानीय पुलिस के साथ 15 सदस्यों वाली एएसआई टीम ने पूरे परिसर का सर्वेक्षण शुरू किया था.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मस्जिद कमेटी की ओर से याचिका दायर की गई थी. याचिका में एएसआई के सर्वे को रोकने की मांग की गई थी. फिर सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को एक सुनवाई के दौरान अंतरिम आदेश में कहा था कि ऐसी कोई खुदाई नहीं होनी चाहिए, जो सरंचनाओं की भौतिक प्रकृति को बदल दे. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि रिपोर्ट के नतीजे पर सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना कोई भी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए.
माना जाता है कि परमार वंश के राजा भोज ने 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन किया था. राजा भोज ने 1034 में सरस्वती सदन की स्थापना की थी. यह एक कॉलेज था, जो आगे चलकर भोजशाला हो गया है. राजा भोज के शासनकाल में ही यहां सरस्वती मां की मूर्ति स्थापित की गई थी, जिन्हें वाग्देवी भी कहा जाता है.
वहीं मुस्लिम पक्ष के लोगों का भी यह दावा रहता है कि अलाउद्दीन खिलजी के समय 1307 से ही यह हमारा धार्मिक स्थल है. किसी भी रेकॉर्ड में भोजशाला के साथ कमाल मौलाना मस्जिद है.
भोजशाला विवाद की शुरुआत पहली बार 1902 में हुई थी. उस समय के तत्कालीन शिक्षा अधीक्षक काशीराम लेले ने मस्जिद के फर्श पर संस्कृत के श्लोक देखे थे. इसी श्लोक के आधार पर उन्होंने इसे भोजशाला बताया था.
इसके बाद 1909 में धार रियासत ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया था. साथ ही यह पुरातत्व विभाग के अधीन हो गया. जब धार के महाराज ने 1935 में भोजशाला और कमाल मौलाना मस्जिद लिखा तख्ती टंगवा दी. इसी साल परिसर में मुस्लिम पक्ष को नमाज पढ़ने की अनुमति भी दी गई थी. इसी फैसले के बाद विवाद तूल पकड़ने लगा जो आज तक चल रहा है. अभी यहां नमाज और पूजा दोनों की अनुमति है.
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