IOS Discussion Program: इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज (आईओएस) ने शनिवार शाम ‘भारत और बदलती हुई बहुध्रुवीय दुनिया: चुनौतियां और संभावनाएं – भारतीय अर्थव्यवस्था के सतत विकास के लिए रोडमैप’ विषय पर एक विचार-विमर्श कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें देश के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों ने भाग लिया. विशेषज्ञों को इसलिए एकत्र किया गया था ताकि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में हो रहे दूरगामी परिवर्तनों तथा भारत के भविष्य पर उनके प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जा सके.
इस पैनल चर्चा में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. सुरजीत भल्ला, प्रो. अरुण कुमार (पूर्व प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय), प्रो. नौशाद अली आज़ाद (पूर्व डीन, सामाजिक विज्ञान संकाय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया), प्रो. अमीरुल्लाह खान (रिसर्च डायरेक्टर, सेंटर फॉर डेवलपमेंट पॉलिसी एंड प्रैक्टिस, हैदराबाद), डॉ. रोमकी मजूमदार (प्रख्यात व्यवसायिक अर्थशास्त्री) तथा डॉ. वकार अनवर (प्रसिद्ध इस्लामी अर्थशास्त्री) ने अपने विचार व्यक्त किए. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मोहम्मद अफज़ल वानी ने की, जबकि संचालन शेख निजामुद्दीन ने किया.
आईओएस के महासचिव ने क्या कहा?
अपने प्रारंभिक संबोधन में आईओएस के महासचिव मोहम्मद आलम ने कहा कि दुनिया इस समय गहरे भू-राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रही है. अपेक्षाकृत स्थिर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की पुरानी धारणाएं अब रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता, संघर्षों, व्यापारिक तनाव, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, ऊर्जा असुरक्षा और बढ़ते संरक्षणवाद जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं. इस पृष्ठभूमि में उन्होंने कहा कि एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की प्रगति ने अभूतपूर्व अवसरों के साथ-साथ गंभीर चुनौतियां भी प्रस्तुत की हैं.
नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के सामने मुख्य प्रश्न यह है कि भारत अपनी जनसंख्या शक्ति, विस्तृत बाजार, तकनीकी क्षमताओं और रणनीतिक स्थिति को सतत, समावेशी और लचीले आर्थिक विकास में कैसे परिवर्तित कर सकता है.
किन मुद्दों पर हुई चर्चा
चर्चा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि उभरती हुई बहुध्रुवीय दुनिया केवल राजनीतिक शक्ति के नए केंद्रों के उदय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक उत्पादन, व्यापार, प्रौद्योगिकी, वित्त और ऊर्जा संबंधों के मूलभूत पुनर्गठन का भी संकेत है. आर्थिक परस्पर निर्भरता को अब राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है. वक्ताओं ने व्यापक रूप से इस बात पर सहमति व्यक्त की कि भारत को अपनी घरेलू आर्थिक नींव को मजबूत करने के साथ-साथ अपनी वैश्विक साझेदारियों का विस्तार और विविधीकरण भी करना होगा.
प्रो. सुरजीत भल्ला ने इस आवश्यकता पर बल दिया कि भारत अपनी आर्थिक उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ही नहीं, बल्कि अपनी विशाल संभावनाओं और दीर्घकालिक राष्ट्रीय आकांक्षाओं के संदर्भ में भी करे. उन्होंने कहा कि भारत ने उल्लेखनीय लचीलापन प्रदर्शित किया है और वह विश्व के प्रमुख विकास केंद्रों में शामिल है. किंतु यदि देश विकसित अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है, तो विकास की गति को और अधिक तेज़ करना होगा। उन्होंने उच्च एवं सतत विकास दर, निवेश, रोजगार सृजन और उत्पादकता वृद्धि के महत्व पर बल दिया.
प्रोफेसर अरुण कुमार ने क्या कहा?
प्रो. अरुण कुमार ने भारतीय अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक पहलुओं और केवल व्यापक आर्थिक संकेतकों से आगे बढ़कर देखने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने रोजगार, क्रय शक्ति, असमानता, असंगठित क्षेत्र तथा छोटे और मध्यम उद्यमों की स्थिति को आर्थिक विकास की वास्तविक गुणवत्ता और स्थिरता के आकलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि सतत विकास की किसी भी रणनीति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास के लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंचें.
उन्होंने संकेत दिया कि आर्थिक विस्तार केवल कुछ क्षेत्रों या बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन पर आधारित नहीं हो सकता. इसके लिए व्यापक स्तर पर रोजगार सृजन, घरेलू मांग को मजबूत करना और अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को अधिक सहयोग देना आवश्यक है. प्रो. कुमार ने विकास, रोजगार और समानता के बीच घनिष्ठ संबंध को रेखांकित करते हुए सुझाव दिया कि भारत के रोडमैप में संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करने के साथ-साथ उत्पादन, निवेश, तकनीकी प्रगति और विकास प्रक्रिया में अधिकतम जनभागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
प्रो. नौशाद अली आजाद ने क्या कहा?
प्रो. नौशाद अली आज़ाद ने सामाजिक विकास, आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन के बीच व्यापक संबंधों के संदर्भ में विषय का विश्लेषण किया. उन्होंने कहा कि आर्थिक नीति को शिक्षा, मानव विकास, सामाजिक न्याय और समाज के विभिन्न वर्गों के सशक्तिकरण जैसे प्रश्नों से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
प्रो. अमीरुल्लाह खान ने भारत की भावी आर्थिक संभावनाओं में मानव विकास की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया. उन्होंने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य, रोजगार और वित्तीय समावेशन के महत्व पर बल देते हुए कहा कि इन्हीं आधारों पर एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण संभव है जो दीर्घकालिक विकास को बनाए रख सके.
डॉ. रोमकी मजूमदार ने बढ़ते वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में भारतीय उद्योग और व्यापार के समक्ष उपस्थित चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा की. उन्होंने भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, तकनीकी परिवर्तनों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित विश्व में लचीलापन, विविधीकरण और अनुकूलन क्षमता के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने आधारभूत संरचना में सुधार, निवेश वातावरण को बेहतर बनाने, तकनीकी क्षमता बढ़ाने और व्यापार करने में सुगमता के माध्यम से भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया.
इसी संदर्भ में डॉ. वकार अनवर ने चर्चा में एक महत्वपूर्ण नैतिक और वैकल्पिक आर्थिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया. उन्होंने एक सतत आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में समानता, सामाजिक उत्तरदायित्व, वित्तीय विवेक और समाज के व्यापक कल्याण जैसी मानवीय मूल्यों की भूमिका को रेखांकित किया.
आईओएस के अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद अफज़ल वानी ने भारत के समक्ष उपस्थित आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियों के साथ गंभीर और सतत बौद्धिक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यवस्था में हो रहे परिवर्तन भारत से ऐसी नीतियों की मांग करते हैं जो आर्थिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से उत्तरदायी और तेजी से बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप हों.