Madras High Court: हिंदू कपल को एक मुस्लिम बच्ची को गोद लेने के लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह जोड़ा बच्ची को गोद लेना चाहता था, लेकिन धर्म उनके रास्ते में आ रही थी. आखिरकार यह मामला मद्रास हाई कोर्ट तक पहुंचा, जहां कोर्ट ने धार्मिक विचारों से ऊपर उठकर बच्ची के कल्याण को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी. मुस्लिम बच्ची को कानूनी तौर पर गोद लेने के लिए हिंदू जोड़े का संघर्ष आखिरकार जीत में बदल गया.
दरअसल, पूरा मामला यह है कि एक हिंदू जोड़ा एक बच्ची को गोद लेना चाहता था. उनके पड़ोस में ही एक मुस्लिम महिला रहती थी, जो दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करती थी. अपने पति की मौत के बाद अपने तीन बच्चों को पालना-पोषना उस महिला के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया था. उसका तीसरा बच्चा दिसंबर 2023 में पैदा हुआ था.
मां ने खुद अपनी बच्ची को सौंप दिया
अपनी जिंदगी का सबसे मुश्किल फैसला लेते हुए मां ने पूरी मर्जी और पूरे दिल से अपनी तीसरी बेटी को उस हिंदू जोड़े को सौंपने की पेशकश की. कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, उस हिंदू जोड़े ने बच्ची के जन्म से ही उसे पाला-पोसा था. बताया जा रहा है कि जोड़े ने उसका नाम ‘श्री दानविका’ रखा. वह उनके घर में ही बड़ी हुई, उन्हें मम्मी-पापा कहकर बुलाती थी, जबकि अपनी असली मां को आंटी कहती थी. जब जोड़े ने बच्ची को कानूनी तौर पर गोद लेने के लिए निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया तो उनकी अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी घई कि वे बच्ची के लिए अजनबी थे और एक अलग धार्मिक आस्था से ताल्लुक रखते थे.
मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा मामला
इसके बाद यह मामला मद्रास हाई कोर्ट में ले जाया गया. सुनवाई के दौरान जजों ने सिर्फ दस्तावेजी सबूतों पर ही भरोसा नहीं किया. बल्कि उन्होंने सभी संबंधित पक्षों को कोर्ट में पेश होने के लिए बुलाया. जिनमें बच्ची की असली मां, उसके भाई-बहन और वह हिंदू जोड़ा शामिल थे. इसके बाद जो हुआ वह सिर्फ़ कानूनी दलीलों का लेन-देन नहीं था, बल्कि सच्चाई का एक बेहद भावुक पल था.
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कोर्ट ने की ये टिप्पणी
जजों ने अपने रिकॉर्ड में यह बात दर्ज की कि बच्ची के भाई-बहनों ने भी इस बात की पुष्टि की कि उसे सचमुच उस हिंदू जोड़े ने ही पाला-पोसा था. कोर्ट ने टिप्पणी की कि हम पूरी तरह से संतुष्ट हैं कि पति और पत्नी दोनों ही बच्ची को पूरी ईमानदारी और अपनेपन की सच्ची भावना के साथ पाल-पोस रहे हैं और बच्ची भी उन्हें ही अपने माता-पिता मानती है.
इसके अलावा, अदालत ने आगे यह भी कहा कि बच्चे की सगी मां ने इस फैसले के लिए पूरी खुशी और पूरे दिल से अपनी सहमति दी थी. एक ऐसी न्यायिक व्यवस्था में जिसकी अक्सर उसकी कठोरता के लिए आलोचना की जाती है, जजों ने एक बेहद सरल और बुनियादी सिद्धांत को अपनाया.
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कोर्ट ने सुनाया ये फैसला
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए इस बात पर जोर दिया कि गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट के तहत कोई भी व्यक्ति जो किसी नाबालिग बच्चे का गार्जियन बनना चाहता है, वह इसके लिए आवेदन कर सकता है और इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा अहमियत हमेशा उस बच्चे की भलाई को ही दी जानी चाहिए. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इसमें धर्म कोई बाधा नहीं है. आखिर में कोर्ट ने पहले के आदेश को रद्द कर दिया और औपचारिक रूप से उस हिंदू कपल को बच्चे का कानूनी रूप से अभिभावक बना दिया.