Travelling alone after marriage: शादी को अक्सर दो लोगों के एक साथ जिंदगी बिताने के रिश्ते के तौर पर देखा जाता है. यही वजह है कि हमारे समाज में पति-पत्नी के हर काम को साथ करने की उम्मीद की जाती है. शादी के बाद कहीं घूमने जाना हो, दोस्तों से मिलना हो या किसी नई हॉबी को आजमाना हो, अक्सर यह माना जाता है कि दोनों को साथ होना चाहिए. लेकिन बदलते समय के साथ कई कपल इस सोच से आगे बढ़ रहे हैं. आज ऐसे पति-पत्नी भी हैं जो एक-दूसरे से प्यार और सम्मान करते हुए अपनी-अपनी जिंदगी के लिए भी जगह रखते हैं. कोई महिला अकेले यात्रा करती है, कोई पुरुष दोस्तों के साथ छुट्टी पर जाता है तो कुछ कपल शादी के बाद भी अपनी अलग-अलग रुचियों और दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे रिश्ते में दूरी के बजाय स्वस्थ व्यक्तिगत स्वतंत्रता के तौर पर देखा जाना चाहिए.
शादी के बाद अकेले घूमने पर क्यों उठते हैं सवाल?
30 साल की सम्या गुप्ता जब भी अकेले यात्रा करने का फैसला करती हैं तो उनसे एक सवाल बार-बार पूछा जाता है- “आप अकेले क्यों जा रही हैं? आपके पति साथ क्यों नहीं आ रहे?” सम्या का कहना है कि शादी के बाद दोनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी जरूर है, लेकिन उनकी अपनी अलग पहचान और व्यक्तिगत जिंदगी भी है. दोनों के अपने दोस्त हैं, अपनी पसंद हैं और अपनी-अपनी रुचियां हैं. उनका मानना है कि एक स्वस्थ शादी में पार्टनर को एक-दूसरे के फैसलों का सम्मान करना चाहिए. उनके मुताबिक, साथ जिंदगी बिताने का मतलब यह नहीं है कि दोनों हर समय हर काम साथ ही करें.
समाज कोलगता है कि शादी के बाद सब कुछ साथ होना चाहिए?
भारतीय समाज में शादी को लंबे समय से दो लोगों के पूरी तरह एक हो जाने के रूप में देखा जाता रहा है. बचपन से ही ज्यादातर लोग अपने माता-पिता को शादी, पारिवारिक कार्यक्रम, दोस्तों से मिलना-जुलना और यहां तक कि खरीदारी जैसी चीजें भी साथ करते देखते हैं. रिश्तों की विशेषज्ञ सुवर्णा वर्दे के मुताबिक, इसी वजह से लोगों के मन में यह धारणा बन जाती है कि अगर शादी के बाद पति या पत्नी अकेले कुछ करना चाहता है तो रिश्ते में जरूर कोई समस्या है. यानी शादी से पहले अगर कोई व्यक्ति अकेले यात्रा करे तो उसे आत्मनिर्भर और घूमने-फिरने का शौकीन माना जाता है, लेकिन शादी के बाद वही काम सवाल खड़े करने लगता है.
क्या अकेले घूमना रिश्ते में दूरी का संकेत है?
विशेषज्ञों का कहना है कि जरूरी नहीं कि ऐसा हो. कई बार अपनी पसंद के काम करने के लिए थोड़ी व्यक्तिगत जगह रिश्ते को और मजबूत कर सकती है.अगर किसी रिश्ते में दोनों लोग हर काम साथ करने के लिए मजबूर महसूस करते हैं तो धीरे-धीरे उनकी अपनी पहचान कमजोर हो सकती है. व्यक्ति अपने मन की कई इच्छाओं को दबाने लगता है और यही स्थिति आगे चलकर भावनात्मक अकेलेपन का कारण बन सकती है. यानी पार्टनर के पास बैठना और उसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा होना दो अलग बातें हैं.
हर वक्त साथ रहना भी बन सकता है परेशानी की वजह
रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स के मुताबिक, लगातार साथ रहने और हर चीज एक साथ करने को हमेशा गहरी नजदीकी नहीं माना जा सकता. जब रिश्ते में व्यक्तिगत सीमाएं खत्म होने लगती हैं तो दोनों की अलग पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है. ऐसे रिश्ते में व्यक्ति को अपनी पसंद, दोस्तों, शौक और निजी समय के लिए जगह नहीं मिलती. इसका असर रिश्ते पर भी पड़ सकता है. इसके उलट अगर दोनों पार्टनर एक-दूसरे को कुछ समय अपने लिए देते हैं तो वे मानसिक रूप से तरोताजा होकर रिश्ते में लौट सकते हैं. इस तरह व्यक्तिगत स्वतंत्रता रिश्ते में नाराजगी और घुटन कम करने में मदद कर सकती है.
महिलाओं के लिए नियम क्यों ज्यादा सख्त हैं?
व्यक्तिगत आजादी को लेकर समाज का रवैया पुरुषों और महिलाओं के लिए एक जैसा नहीं है. अगर कोई पुरुष दोस्तों के साथ घूमने जाता है या कुछ समय अकेले बिताता है तो इसे अक्सर काम और परिवार की जिम्मेदारियों से मिला ब्रेक माना जाता है. लेकिन जब कोई महिला अपने पति के बिना दोस्तों के साथ घूमने या अकेले यात्रा करने का फैसला करती है तो उससे जिम्मेदार पत्नी, मां या बहू होने को लेकर सवाल किए जाने लगते हैं. रिलेशनशिप विशेषज्ञों के मुताबिक, महिलाओं से आज भी परिवार के साथ अपनी पहचान जोड़कर रखने की उम्मीद ज्यादा की जाती है. ऐसे में जब कोई महिला अपनी पसंद और जरूरतों को प्राथमिकता देती है तो उसे कई बार स्वार्थी तक कहा जाता है.