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Allahabad High Court: पति ने गुस्से में पत्नी को कहा ‘बांझ’, HC ने नहीं माना क्रूरता, जानिए पूरा मामला

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पति-पत्नी के विवाद में फैसला सुनाया है कि संतान न होने को लेकर हुए झगड़े में अगर पति अपनी पत्नी को 'बांझ' या निसंतान कह देता है, तो उसे दोषी नहीं माना जा सकता.

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Last Updated: August 15, 2026 15:22:50 IST

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Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक मामले से जुड़ा फैसला सुनाया. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पति-पत्नी के विवाद में ये फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ किया कि संतान न होने को लेकर हुए झगड़े में अगर पति अपनी पत्नी को ‘बांझ’ या निसंतान कह देता है, तो सिर्फ इस एक बात के आधार पर उसे क्रूरता का दोषी नहीं माना जा सकता.

हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि किसी महिला को इस तरह संबोधित करना संवेदनशील या सम्मानजनक व्यवहार नहीं है. हालांकि हर अपमानजनक बात अपने आप में कानूनी अपराध नहीं बन जाती. इसी आधार पर कोर्ट ने पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला लखनऊ के गाजीपुर थाने से जुड़े एक मामले का है. जानकारी के अनुसार, हिरेंद्र कुशवाहा की शादी दिसंबर 2015 में हुई थी. शादी के कई साल बाद भी दंपती के बच्चे नहीं हुए. इसी बात को लेकर दोनों के रिश्ते में तनाव बढ़ने लगा. पत्नी ने आरोप लगाया था कि बच्चे न होने की वजह से उसे लगातार ताने दिए जाते थे. उसका कहना था कि 23 नवंबर 2020 को इसी बात को लेकर घर में विवाद हुआ. इसके कारण उसके साथ मारपीट की गई और उसे कमरे में बंद कर दिया गया. महिला ने अपने ससुर और देवर पर भी गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि, शुरुआती जांच के बाद मजिस्ट्रेट ने सिर्फ पति के खिलाफ ही कार्रवाई आगे बढ़ाने का आदेश दिया. इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया और अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी.

‘बांझ’ कहना अपराध नहीं

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की एकल बेंच ने की. कोर्ट ने केस से जुड़े दस्तावेजों और आरोपों को देखने के बाद कहा कि पत्नी को ‘बांझ’ कहना निश्चित रूप से असंवेदनशील और सामाजिक तौर पर आपत्तिजनक है लेकिन केवल इस शब्द का इस्तेमाल करने से अपराध साबित नहीं होता. कोर्ट के मुताबिक, किसी व्यक्ति के खिलाफ अपमान का मामला तभी बन सकता है, जब यह भी दिखाया जाए कि आरोपी का मकसद जानबूझकर शांति भंग कराना या कोई दूसरा अपराध करवाना था. सिर्फ गुस्से में कहे गए अपमानजनक शब्द को हर स्थिति में आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता.

दहेज के आरोप पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल

मामले में दहेज प्रताड़ना के आरोप भी लगाए गए थे लेकिन कोर्ट ने पाया कि शुरुआती FIR में दहेज की मांग का कोई उल्लेख नहीं था. बाद में पुलिस को दिए गए बयान में यह आरोप जोड़ा गया. हाईकोर्ट ने कहा कि बाद में लगाए गए आरोप मूल शिकायत में मौजूद कमियों को अपने आप पूरा नहीं कर सकते. अदालत को इस मामले में लगाए गए आरोप सामान्य और पर्याप्त ठोस आधार से रहित लगे. सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पति हिरेंद्र कुशवाहा के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया.

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Last Updated: August 15, 2026 15:22:50 IST

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Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक मामले से जुड़ा फैसला सुनाया. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पति-पत्नी के विवाद में ये फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ किया कि संतान न होने को लेकर हुए झगड़े में अगर पति अपनी पत्नी को ‘बांझ’ या निसंतान कह देता है, तो सिर्फ इस एक बात के आधार पर उसे क्रूरता का दोषी नहीं माना जा सकता.

हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि किसी महिला को इस तरह संबोधित करना संवेदनशील या सम्मानजनक व्यवहार नहीं है. हालांकि हर अपमानजनक बात अपने आप में कानूनी अपराध नहीं बन जाती. इसी आधार पर कोर्ट ने पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला लखनऊ के गाजीपुर थाने से जुड़े एक मामले का है. जानकारी के अनुसार, हिरेंद्र कुशवाहा की शादी दिसंबर 2015 में हुई थी. शादी के कई साल बाद भी दंपती के बच्चे नहीं हुए. इसी बात को लेकर दोनों के रिश्ते में तनाव बढ़ने लगा. पत्नी ने आरोप लगाया था कि बच्चे न होने की वजह से उसे लगातार ताने दिए जाते थे. उसका कहना था कि 23 नवंबर 2020 को इसी बात को लेकर घर में विवाद हुआ. इसके कारण उसके साथ मारपीट की गई और उसे कमरे में बंद कर दिया गया. महिला ने अपने ससुर और देवर पर भी गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि, शुरुआती जांच के बाद मजिस्ट्रेट ने सिर्फ पति के खिलाफ ही कार्रवाई आगे बढ़ाने का आदेश दिया. इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया और अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी.

‘बांझ’ कहना अपराध नहीं

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की एकल बेंच ने की. कोर्ट ने केस से जुड़े दस्तावेजों और आरोपों को देखने के बाद कहा कि पत्नी को ‘बांझ’ कहना निश्चित रूप से असंवेदनशील और सामाजिक तौर पर आपत्तिजनक है लेकिन केवल इस शब्द का इस्तेमाल करने से अपराध साबित नहीं होता. कोर्ट के मुताबिक, किसी व्यक्ति के खिलाफ अपमान का मामला तभी बन सकता है, जब यह भी दिखाया जाए कि आरोपी का मकसद जानबूझकर शांति भंग कराना या कोई दूसरा अपराध करवाना था. सिर्फ गुस्से में कहे गए अपमानजनक शब्द को हर स्थिति में आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता.

दहेज के आरोप पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल

मामले में दहेज प्रताड़ना के आरोप भी लगाए गए थे लेकिन कोर्ट ने पाया कि शुरुआती FIR में दहेज की मांग का कोई उल्लेख नहीं था. बाद में पुलिस को दिए गए बयान में यह आरोप जोड़ा गया. हाईकोर्ट ने कहा कि बाद में लगाए गए आरोप मूल शिकायत में मौजूद कमियों को अपने आप पूरा नहीं कर सकते. अदालत को इस मामले में लगाए गए आरोप सामान्य और पर्याप्त ठोस आधार से रहित लगे. सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पति हिरेंद्र कुशवाहा के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया.

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