हमारे देश में सोने (Gold) से सिर्फ लगाव नहीं है, बल्कि यह हमारी भावनाओं और परंपराओं से जुड़ा है. शादी-ब्याह हो, कोई बड़ा त्योहार हो या फिर मुश्किल वक्त के लिए सेविंग्स, भारतीय परिवारों में सोना सबसे ऊपर रहता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी प्यार के चक्कर में आज भारत के घरों और मंदिरों के लॉकरों में इतना सोना जमा हो चुका है, जिसकी कीमत अरबों-खरबों में है. एक अनुमान के मुताबिक, भारतीय घरों और मंदिरों के पास करीब 30,000 से 32,000 टन सोना पड़ा है. इसकी कीमत लगभग $3.8 ट्रिलियन (लाखों करोड़ रुपये) है. इसीलिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक खास अपील की है. ‘बाहर से नया सोना खरीदने के बजाय, हमारे पास जो पहले से मौजूद है, उसी को इस्तेमाल में लाएं.’
क्या है गोल्ड रीसाइक्लिंग और सरकार क्यों दे रही है इस पर जोर?
सरल शब्दों में कहें तो गोल्ड रीसाइक्लिंग का मतलब है. पुरानी ज्वेलरी, टूटे-फूटे गहने या सिक्कों को पिघलाकर फिर से 24-कैरेट शुद्ध सोना बनाना और उसे बाजार में वापस लाना.
सरकार ऐसा इसलिए चाहती है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना विदेशों से आयात (Import) करता है. साल 2025-26 में ही भारत ने सोना खरीदने के लिए लगभग $72.4 बिलियन (अरबों रुपये) खर्च कर दिए. जब हम बाहर से सोना खरीदते हैं, तो देश का पैसा बाहर जाता है जिससे ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) बढ़ता है. अगर हम घर में रखे सोने को ही रीसायकल करना शुरू कर दें, तो हर एक ग्राम रीसायकल किया हुआ सोना देश का इम्पोर्ट बिल कम करेगा.
एक छोटा सा बदलाव, बड़ा असर
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर देश के लोग हर साल अपने पास रखे सोने का सिर्फ 1% हिस्सा भी रीसायकल करने लगें, तो भारत का सोने का इम्पोर्ट करीब 25 से 30 फीसदी तक कम हो सकता है. यह देश की आत्मनिर्भरता के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा.
लॉकरों में क्यों कैद है सोना?
गहने पुराने हो जाएं या आउट-ऑफ-फैशन, भारतीय परिवार उन्हें बेचने या बदलने से कतराते हैं. इसके पीछे सांस्कृतिक जुड़ाव और सुरक्षा की भावना है। लेकिन अब वक्त बदल रहा है. सोने की रिकॉर्ड तोड़ कीमतों और ज्वेलर्स द्वारा दिए जा रहे पारदर्शी एक्सचेंज ऑफर्स की वजह से अब लोग पुराने गहनों को बदलकर नए डिजाइन लेने या उन्हें कैश कराने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं.